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राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 भविष्य के भारत की शिक्षा का ‘विजन डाक्यूमेंट’ है

UB India News by UB India News
July 29, 2021
in Lokshbha2024, केंद्रीय राजनीती, खास खबर, ब्लॉग, शिक्षा
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 भविष्य के भारत की शिक्षा का ‘विजन डाक्यूमेंट’ है
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति–२०२० भविष्य के भारत की शिक्षा का ‘विजन डाक्यूमेंट’ है जो कल्याणकारी राज्य की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। इस नीति की प्रशंसा और आलोचना के बीच इतना तो तय है कि इसमें शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समसामयिक समस्याओं को संज्ञान में लेते हुए इनके समाधान का रास्ता खोजा गया है। शिक्षा नीति की स्वीकृति के एक वर्ष पूर्ण होने पर इसमें सुझाए गए नवाचारों की प्रकृति और उनके क्रियान्वयन की चुनौतियों पर विचार करने की जरूरत है। शिक्षा नीति में दो तरह के नवाचार सुझाए गए हैं। पहले वर्ग में उन नवाचारों को रख सकते हैं‚ जो पूरी तरह से नई व्यवस्था और प्रक्रिया की परिकल्पना करते हैं। विद्यालय स्तर पर बिना बस्ते के दस दिन आना‚ संसाधनों की साझेदारी के लिए स्कूलों का क्लस्टर बनाना‚ उच्च शिक्षा के स्तर पर शोध और शिक्षण विश्वविद्यालय‚ मल्टीपल एंंट्री–एक्जिट‚ मिश्रित विधि (ब्लेंडेड लनिग) का प्रयोग आदि। नवाचारों के क्रियान्वयन की सबसे बड़ी समस्या वर्तमान सांगठनिक संरचनाओं और प्रक्रियाओं को अपेक्षित बदलावों के अनुकूल तैयार करना है। पूर्व की नीतियों के अनुभव बताते हैं कि इस तरह की तैयारी के अभाव में कई बार ऐसे नवाचार केवल नीतियों तक सीमित रह जाते हैं। कॉमन स्कूल सिस्टम और नेबरहुड स्कूल ऐसे ही दो उदाहरण हैं‚ जो केवल कोठारी आयोग की रिपोर्ट में ही दिखते हैं। ध्यान रखना होगा कि इस नीति के साथ इस तरह की कोई ‘दुर्घटना’ न हो। दूसरे वर्ग में वे नवाचार आते हैं‚ जो चलन में हैं‚ और जिनकी प्रभावशीलता में वृद्धि के लिए कुछ महत्वपूर्ण बदलाव और अनुकूलन करने हैं जैसे–विद्यालयों को बाल साहित्य से समृद्ध करना‚ स्कूल स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा के घटकों को शामिल करना‚ कला‚ शिल्प एवं खेलों का एकीकरण करना‚ अंतरअनुशानात्मक चिंतन पर बल और अधिगम निष्पत्ति (लनिग आउटकम) आधारित पाठ्यचर्या का विकास आदि। इस तरह के नवाचारों की आवृत्ति पहले तरह के नवाचारों की अपेक्षा अधिक है। इन नवाचारों की अधिक आवृत्ति शैक्षिक सुधारों की प्रभावशीलता और परिणामों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। उदाहरण के लिए १९८६ की शिक्षा नीति के बाद से ही शिक्षार्थी केंद्रित पद्धतियों पर बल देने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है। इससे जुड़े सुझावों की भरमार हर दस्तावेज में है।

इसके बाद भी वर्ष २०२१ में इसके लिए हम पुनः चितिंत हैं। इस स्थिति में हमें नवाचार की प्रकृति की बजाय उन व्यवस्थागत बाधाओं के बारे में सोचने की आवश्यकता है‚ जो क्रियान्वयन की प्रभावशीलता को कम कर सकती हैं। इसे उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं। एनसीईआरटी को पाठ्यचर्या संबंधित रूपरेखाओं की तैयारी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इनके बिना पाठ्यचर्या‚ शिक्षण‚ परीक्षा और मूल्यांकन से संबंधित बदलाव संभव नहीं हैं। एनसीईआरटी निश्चित रूप से इस क्षेत्र में कोई प्रभावशाली योजना बना रही होगी लेकिन इस योजना में हो रहे विलंब के कारण विद्यालय स्तर पर शिक्षण संस्कृति में बदलाव संबंधित सभी नवाचार शिथिल हैं। इस कार्य में जितना विलंब होगा शिक्षा नीति की क्रियान्वयन गति उतनी धीमी होती जाएगी। अंततः यह नीति की प्रभावशीलता को कम कर देगी। ॥ सुझाए गए नवाचार वृहद् पैमाने पर बदलाव की परिकल्पना करते हैं। शिक्षा नीति की इस विशेषता की व्याख्या करते समय हमें सावधान रहने की आवश्यकता है कि ये नवाचार एक समान और एकरूप नहीं हो सकते। बड़े पैमाने पर फैक्ट्री मॉडल में नवाचार का प्रसार किया जाता है‚ तो उनमें नयेपन का तत्व कम हो जाता है‚ यांत्रिकता बढ़ती जाती है। हम त्रि–भाषा सूत्र‚ सामाजिक उत्पादक कार्य द्वारा शिक्षा‚ सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के क्रियान्वयन में देख सकते हैं‚ जहां एक समान मॉडल को पूरे देश में लागू करने के कारण स्थानीयता‚ संदर्भबद्धता और संस्कृतिनिष्ठता की उपेक्षा हुई और नवाचार के स्थान पर यांत्रिकता सर्वोपरि हो गई। इसे ध्यान में रखते हुए हमें छोटे पैमाने के प्रयोगों को प्रोत्साहित करना होगा। उन्हें बेहतर अभ्यास के मॉडल के रूप में विकसित और प्रचारित करना होगा। इस स्थिति में प्रयोगों को हूबहू दोहराने की आदत के स्थान पर शिक्षा के हितधारकों को स्वयं नवाचार डिजाइन करने की अभिप्रेरणा भी मिलेगी॥। नवाचारों के क्रियान्वयन के दौरान आदर्श अर्थ और व्यावहारिक प्रयोग में अंतर पैदा हो जाता है। उदाहरण के लिए खेल आधारित शिक्षण में खेल‚ विषयवस्तु सिखाने का माध्यम होता है‚ लेकिन प्राथमिक शालाओं में देखें तो खेल में विषयवस्तु की उपेक्षा हो जाती है। आने वाले समय में जब हम दक्षता आधारित पाठ्यक्रम‚ मल्टीपल इंट्री–एक्जिट जैसे सुधारों की ओर बढ़ेंगे तो हमें ध्यान रखना होगा कि इन नवाचारों की मूल मंशा ही व्यवहार में उतरे। इसी तरह संसाधनों के इष्टतम उपयोग के साथ न्यूनतम व्यवधान के लिए हमें प्रत्येक नवाचार के लिए प्राथमिकता सूची का निर्धारण भी करना होगा। उदाहरण के लिए शिक्षा में सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग से संबंधित सुधारों में सर्वाधिक जोर शिक्षण शास्त्र पर दिया जा रहा है जबकि इस नवाचार के प्रभावी होने के लिए पहली प्राथमिकता संसाधनों की उपलब्धता है।
ऐसे ही विश्वविद्यालय स्तर पर ब्लेंडेड लनिग (मिश्रित अधिगम) को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस क्षेत्र में हमारी प्राथमिकता भारतीय भाषाओं में गुणवत्ता आधारित सामग्रियों को तैयार करने और शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की है। नवाचार की विशेषता होती है कि वे किसी के बताने और निगरानी करने से साकार नहीं होते‚ बल्कि इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर आंतरिक अभिप्रेरणा और सामुदायिक स्तर पर सामूहिक सहयोग की आवश्यकता होती है। हमारा संदर्भ‚ परिवेश और संस्थागत सहयोग इनके अनुकूल होना चाहिए। भारत की शिक्षा के संदर्भ में देखें तो गांधी‚ टैगोर और मालवीय के प्रयोग इसके उदाहरण हैं। ये प्रयोग केवल व्यक्ति विशेष के प्रयास से सफल नहीं हुए थे। व्यक्ति विशेष के द्वारा दिए गए सृजनात्मक विचार को समुदाय ने समझा‚ सराहा और अपनाया। परिणामस्वरूप शिक्षा का स्वचालित तंत्र खड़ा हुआ। इन प्रयोगों का निहितार्थ यह भी है कि हितधारकों की भागीदारी के बिना नवाचार रचनात्मक विचार बनकर रह जाता है। ध्यान रखना होगा कि शिक्षा नीति संबंधित नवाचारों के प्रति हितधारक केवल जागरूक न हों‚ बल्कि उन्हें अपनाए भी। कोरोना कालीन समस्याओं के बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति–२०२० का क्रियान्वयन और भी प्रासंगिक हो जाता है। आने वाले समय में हमें शिक्षा नीति के क्रियान्वयन द्वारा कोरानाजन्य चुनौतियों का समाधान भी खोजना होगा।

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