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मोदी मंत्रिमंडल में बिहार के दो इन एक आउट की यह उपेक्षा है या फिर सबक ……..

UB India News by UB India News
July 8, 2021
in खास खबर, पटना, बिहार, ब्लॉग
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मोदी मंत्रिमंडल में बिहार के दो इन एक आउट की यह उपेक्षा है या फिर सबक ……..
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नरेंद्र मोदी की सरकार ने बुधवार को कैबिनेट में फेरबदल करते हुए 36 नए चेहरों को शामिल किया. इनमें से बिहार से केवल दो चेहरे जगह पाने में कायमाब रहे. बिहार से मंत्रिमंडल में जगह पाने वाले एक आरसीपी सिंह हैं, जो इन दिनों जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष भी हैं और अपनी पार्टी में नीतीश कुमार के बाद सबसे प्रभावशाली नेता भी हैं. वहीं दूसरे नेता लोक जनशक्ति पार्टी में अपने भतीजे से बग़ावत करके अलग गुट बनाने वाले पशुपति कुमार पारस हैं, जो ख़ुद को लोक जनशक्ति पार्टी का वास्तविक अध्यक्ष बता रहे हैं.

बिहार के बीजेपी यूनिट से किसी नेता को इस बार के बदलाव में जगह नहीं मिली, इतना ही नहीं बिहार से आने वाले बीजेपी के क़द्दावर नेता रविशंकर प्रसाद की कैबिनेट से छुट्टी भी हो गई है. लेकिन इन सबसे ज़्यादा चर्चा बिहार बीजेपी की पहचान माने जाने वाले नेता सुशील कुमार मोदी का मंत्रिमंडल में जगह नहीं बना पाना है. सुशील कुमार मोदी वर्षों तक बीजेपी के कोटा से बिहार के उप-मुख्यमंत्री रहे हैं.

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इस लिहाज़ से देखा जाए तो बिहार से भले ही दो मंत्रियों को जगह मिली है लेकिन इसके कई राजनीति मायने निकाले जा रहे हैं.

पहले बात करत हैं जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष आरसीपी सिंह की. आरसीपी सिंह 2019 में मोदी सरकार में मंत्री बनते-बनते रह गए थे. तब माना गया था कि नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में केवल एक चेहरे को जगह दिए जाने से संतुष्ट नहीं थे. पार्टी उस वक़्त नीतीश कुमार के बेहद ख़ास माने जाने वाले राजीव रंजन उर्फ़ लल्लन सिंह को भी मंत्री बनवाना चाहती थी.

दो साल बाद भी एक ही मंत्री
दो साल बाद भी ठीक वैसी ही स्थिति है. मोदी सरकार ने इस बार भी जनता दल यूनाइटेड के केवल एक सदस्य को मंत्री बनाया लेकिन नीतीश कुमार इस बार मान गए. आरसीपी सिंह के अलावा इस बार जेडीयू के कई नेताओं के नाम चल रहे थे. लल्लन सिंह अगर मंत्री बनाए जाते तो जनता दल यूनाइटेड में अंसतोष काफ़ी ज़्यादा बढ़ता. पार्टी के सामने अपने अति पिछड़े नेताओं को मनाने की चुनौती बढ़ जाती. इसलिए लगता है कि नीतीश कुमार ने बड़ी चालाकी से उस संकट को टाल दिया है. एक दौर में आरसीपी सिंह नीतीश कुमार के सचिव हुआ करते थे और लल्लन सिंह क़रीबी नेता. लेकिन आरसीपी सिंह ने समय के साथ जनता दल यूनाइटेड में अपनी स्थिति लगातार मज़बूत की है. आरसीपी सिंह वैसे भी नीतीश कुमार के सचिव रहे हैं और उनके स्वजातीय भी हैं, इसका भी ध्यान रखना चाहिए. नीतीश कुमार ने अपने शासन के दौरान अपनी जाति के लोगों को कितना बढ़ाया है, इसका भी आकलन होना चाहिए.

आरसीपी सिंह के अलावा जनता दल यूनाइटेड से जिन लोगों के नामों की चर्चा चल रही थी उनमें लल्लन सिंह, कर्पूरी ठाकुर के बेटे और राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर और संतोष कुशवाहा के नाम शामिल थे. लेकिन मंत्री केवल आरसीपी सिंह बने. पार्टी के एक प्रवक्ता ने एक दिन पहले बताया था कि अब तक केवल अध्यक्ष जी का नाम ही कंफ़र्म है. एक तरह से आरसीपी सिंह ने यह ज़ाहिर कर दिया है कि नीतीश कुमार की पार्टी पर अब उनका ही दबदबा है. हालांकि पार्टी से जुड़े कुछ लोगों की मानें तो लल्लन सिंह एक बार फिर उपेक्षा किए जाने से नाराज़ हैं.

पारस को मंत्रालय, चिराग के पास क्या है विकल्प
पशुपति कुमार पारस को मोदी कैबिनेट में जगह मिलना बिहार की राजनीति के लिहाज़ से ज़्यादा अहम बात साबित होने वाली है. इससे साफ़ है कि बीजेपी ने नीतीश कुमार की ज़िद पूरी की है. नीतीश कुमार किसी भी क़ीमत पर एनडीए में चिराग पासवान को नहीं देखना चाहते थे और पारस को मंत्री बनाए जाने से स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी ने नीतीश कुमार की बात मान ली है. पशुपति पारस परिवार और पार्टी में फूट की वजह के तौर पर चिराग पासवान के सहयोगी सौरभ पांडेय का नाम लेते रहे हैं. अब ये साफ़ हो गया है कि चाचा ने पार्टी क्यों तोड़ी थी. उन्होंने आरोप भले मुझ पर लगाए हों लेकिन आज जनता देख रही है कि मंत्री बनने के लालच में उन्होंने पार्टी तोड़ी है.”

पार्टी के प्रवक्ता अमर आज़ाद के मुताबिक़, “इससे साफ़ हो गया है कि बीजेपी ने हमलोगों को धोखा दिया है और हमारी पार्टी संघर्ष करने को तैयार है. ऐसे में साफ़ है कि नीतीश कुमार का विरोध करते-करते अब चिराग पासवान के सामने बीजेपी से भी अलग रास्ता करने की मजबूरी है.”

भारतीय जनता पार्टी के बिहार यूनिट के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं, “बिहार चुनाव के दौरान भी हमारी पार्टी का नीतीश कुमार जी की पार्टी के साथ गठबंधन था. चिराग पासवान हमलोगों के ख़िलाफ़ चुनाव लड़े. राजनीति में सामूहिक फ़ैसलों की अहमियत ज़्यादा होती है, वे इसे समझ नहीं पाए. वे व्यक्तिगत संबंधों और भावुक अपील के आधार पर राजनीति में आगे बढ़ना चाहते थे. उन्हें अभी परिपक्वता सीखनी होगी. वैसे भी यह उनकी पार्टी और परिवार का आंतरिक मामला है, इससे बीजेपी का कोई लेना देना नहीं है.”

हालांकि पशुपति कुमार पारस के मंत्री बनाए जाने से ख़ुद को मोदी का हनुमान कहते आए चिराग पासवान के लिए ‘राम’ से उम्मीदों का भरोसा ख़त्म हो चुका है, उन्हें अब बिहार की राजनीति में अपना रास्ता नए सिरे से तलाशना होगा.

वहीं पशुपति कुमार पारस की कोशिश मंत्री पद का लाभ उठाते हुए पार्टी के समर्थकों को ज़्यादा से ज़्यादा अपनी ओर आकर्षित करके पार्टी पर अपना दबदबा मज़बूत करने की होगी.

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वैसे दिलचस्प यह भी है कि जनता दल यूनाइटेड इस बदलाव में केवल एक मंत्री पर तैयार हुई है और क़यास ये लगाया जा रहा है कि अगर आने वाले दिनों में पशुपति कुमार पारस का गुट जनता दल यूनाइटेड में विलय करता है तो भी पारस जनता दल यूनाइटेड के कोटे से मंत्री बने रहें.

रविशंकर का इस्तीफ़ा
इन दो मंत्रियों को कैबिनेट में जगह ज़रूर मिली लेकिन भारतीय जनता पार्टी के एक क़द्दावर नेता रविशंकर प्रसाद को मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ गया. इसकी वजह बताते हुए मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “यह भी कहा जा रहा है कि ट्विटर के साथ विवाद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार की छवि को नुक़सान पहुँचाया और इसकी क़ीमत रविशंकर प्रसाद को चुकानी पड़ी. लेकिन एक वास्तविकता यह है कि बीजेपी का नेतृत्व यह जान चुका था कि रविशंकर प्रसाद को मंत्री बनाए रखने से पार्टी को बिहार में कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है या अब तक नहीं हुआ है.”

बिहार बीजेपी के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं, “देखिए पार्टी और सरकार में इस तरह की अदला-बदली होती रहती है, अब हमारे वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का फ़ायदा पार्टी और संगठन को मिलेगा. नए लोगों को शासन के तौर तरीक़े सीखने का लाभ मिलेगा.”

रविशंकर प्रसाद के हटाए जाने के कारणों की चर्चा करते हुए मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “रविशंकर प्रसाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपने रिश्ते को उस तरह नहीं रख पाए जैसे उनके पिता ठाकुर प्रसाद का था. ये बात भी उनके फ़ेवर में नहीं रही होगी.  रविशंकर प्रसाद को लेकर एक और बात आम लोगों ने भी दोहरायी कि वे ख़ुद को पटना संसदीय सीट तक सीमित रख रहे थे और आम कार्यकर्ताओं का उन तक पहुँच पाना मुश्किल ही था.

रविशंकर प्रसाद के अलावा इस बदलाव में सबसे ज़्यादा सुशील कुमार मोदी की उपेक्षा ने चौंकाया. हालांकि इसकी झलक बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद से ही दिखने लगी थी जब नीतीश कुमार और सुशील मोदी की जोड़ी टूट गई थी. 15 साल तक बिहार में सीएम और डिप्टी सीएम की इस जोड़ी को बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की रज़ामंदी के बिना तोड़ना मुमकिन नहीं था. हालांकि बाद में सुशील कुमार मोदी राज्यसभा में आए तो उनके लिए उम्मीदें ख़त्म नहीं हुई थीं.

सुशील मोदी राजनीति में तो हैं लेकिन अब ये माना जा सकता है कि बिहार की राजनीति में उनका दौर बीत चुका है. दरअसल नीतीश कुमार की नज़दीकी ने उनका सारा खेल बिगाड़ दिया है. बिहार बीजेपी के लोगों का आरोप रहा है कि उन्होंने पार्टी का, संगठन का विकास नहीं करके इसे नीतीश कुमार की जेब में कर दिया था. लग रहा है कि ऐसी शिकायतों को गंभीरता से लिया गया है.”

सुशील मोदी अपने लालू विरोध और नीतीश कुमार से नज़दीकी की वजह से जाने जाते हैं लेकिन उनकी एक ख़ासियत यह भी है कि वे आंकड़े और तथ्यों का इस्तेमाल विपक्षियों की आलोचना करने में नियमित करते हैं. लेकिन ऐसा लग रहा है कि बीजेपी सुशील मोदी की स्टाइल वाली राजनीति से आगे निकलना चाहती है.

 

निखिल आनंद इस मसले पर कहते हैं, “हमारी पार्टी अनुभवी लोगों के साथ साथ युवाओं को मौक़ा देना जानती है. मौजूदा मंत्रालय की औसत उम्र कितनी कम है और नए लोगों का मौक़ा मिला है. अनुभवी लोगों के अनुभव का फ़ायदा पार्टी और संगठन को मज़बूत करने कि लिए किया जाएगा.”

वैसे अगर बिहार की राजनीति के लिहाज़ सुशील मोदी को बिहार से हटाना और मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने को क्या माना जाए, इसके जवाब में मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “सुशील मोदी को पटना से बाहर दिल्ली में डंप कर दिया गया है. उनको दिल्ली ले भी इसलिए जाया गया ताकि वे नीतीश कुमार से दूर दिखें.

एक तरह से बीजेपी नीतीश कुमार की शर्तों को मान भी रही है और दूसरी तरफ़ अपनी पार्टी में नीतीश कुमार के पैरोकार रहे लोगों को किनारे भी कर रही है, ऐसे में ये माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी में मौजूदा निर्णायक मंडली के लोगों ने यह मान लिया है कि बिहार में बीते दो दशक के दौरान पार्टी जिस तेज़ी से आगे बढ़ सकती थी, वह नहीं हुआ है. ऐसे में नीतीश कुमार के साथ-साथ लंबे समय तक सत्ता के साझेदारों पर पार्टी अंकुश लगा रही है.

यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी इस तरह से नीतीश कुमार से पर्याप्त दूरी बरतते हुए ख़ुद की ताक़त को राज्य में बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है. इसको इस रूप में भी देखा जा सकता है कि क्या बीजेपी अपने कोर वोट बैंक के अलावा दूसरे वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है.

बिहार बीजेपी के प्रवक्ता और भारतीय जनता पार्टी के ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री निखिल आनंद कहते हैं, “ये बात केवल बिहार की नहीं है. पूरे मंत्रिमंडल के विस्तार को आप देखेंगे तो यह स्पष्ट होगा कि मोदी सरकार के सोशल आउटलुक में चेंज दिखेगा. 12 दलित, आठ आदिवासी और 27 ओबीसी मंत्री. आम लोगों की इतनी भागीदारी इससे पहले कभी किसी मंत्रिमंडल में नहीं हुई थी.”

वैसे तो बिहार से मोदी मंत्रिमंडल में दो ही चेहरे शामिल किए गए हैं लेकिन एक तीसरा चेहरा भी जिन्हें बिहार बीजेपी में सबसे प्रभावशाली माना जा सकता है. पार्टी के अब तक महासचिव रहे भूपेंद्र यादव को राजस्थान का माना जा रहा हो लेकिन पिछले कई सालों से उनका कार्यक्षेत्र बिहार रहा है. 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की एकतरफ़ा कामयाबी और 2020 विधानसभा चुनावों में नीतीश सरकार की वापसी के पीछे उनकी रणनीति को अहम माना गया था.

बात करे भूपेन्द्र यादव की तो निश्चित तौर पर बिहार बीजेपी से जुड़े तमाम फ़ैसलों में भूपेंद्र यादव की अहम भूमिका रही है. वे अमित शाह के भी बेहद क़रीबी हैं और उनके लिए फ़ैसलों से बीजेपी बिहार में मज़बूत हुई है.”

बिहार की राजनीति पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों के मुताबिक़, भूपेंद्र यादव बिहार में सोशल इंजीनियरिंग के बहाने ऐसा राजनीतिक नेतृत्व खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं जहां से पार्टी अपने दम पर सरकार बना सके और चुनाव जीत सके, उसे नीतीश कुमार जैसे सहयोगियों की ज़रूरत नहीं हो.

इस बारे में निखिल आनंद कहते हैं, “बीजेपी अपने सहयोगी पार्टियों और उनके नेताओं का पूरा सम्मान करना जानती है. जहां तक पार्टी के विस्तार की बात है तो वह तो हर पार्टी करना चाहती है और लोकतंत्र में करती भी है.”

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