दतिया, बांकीपुर और मांजलपुर तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के परिणाम सामने आ चुके हैं. बिहार, मप्र और गुजरात की तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव को लेकर 30 जुलाई को मतदान हुआ था. तीन राज्यों की विधानसभा सीटों पर मुकाबला काफी काफी दिलचस्प रहा. मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने जीत दर्ज की है. यहां से बीजेपी के उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को छह हजार से अधिक वोटों से हराया है.
जिन तीनों विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए, वे बीजेपी शासित राज्यों के हैं। बिहार की पटना की बांकीपुर सीट पर बीजेपी का ही कब्जा था, लेकिन यहां उसे करारी हार मिली है। मध्य प्रदेश की दतिया सीट अभी कांग्रेस के पास ही थी और उसने अपनी सीट बरकरार रखी है, लेकिन यहां के मतदाताओं ने फिर भी भाजपा को एक संदेश देने की कोशिश की है। वहीं गुजरात की मांजलपुर सीट हमेशा से बीजेपी का गढ़ रहा है, यह गढ़ अभी भी मजबूती से कायम है, लेकिन किले में दरारें भी दिखने लगी हैं, जिसे बहुत जल्द पाटने की नौबत आ सकती है।
वहीं, बिहार की बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर ने बड़ी जीत दर्ज की है. उन्होंने करीब 19 हजार से अधिक वोटों से भाजपा प्रत्याशी नीरज सिन्हा को हराया है. उधर, गुजरात की मांजलपुर सीट पर सीधी टक्कर देखने को मिली. बीजेपी प्रत्याशी सतीशभाई पटेल ने भारी जीत हासिल की है. सतीश भाई ने गुजरात कांग्रेस के उपाध्यक्ष भीखाभाई रबारी को वोटों से हराया.
तीनों सीट पर कम हुई वोटिंग
मध्य प्रदेश की दतिया, बिहार की बांकीपुर और गुजरात की मांजलपुर सीट पर 30 जुलाई को मतदान हुआ था. मतदान प्रतिशत पर नजर डालें तो मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर करीब 70 फीसदी वोटिंग हुई. वहीं, बिहार की बांकीपुर सीट पर 34.30 फीसदी और गुजरात की मांजलपुर सीट पर 37.50 फीसदी से अधिक मतदान दर्ज किया गया.
पहले बांकीपुर की बात ……….
पटना के बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव को जनसुराज के प्रशांत किशोर ने 19324 वोटों से जीत लिया है। पीके को 64117 (49.23%) वोट मिले। दूसरे नंबर पर रहे भाजपा के नीरज कुमार को 44794 (34.4%) और तीसरे नंबर पर रहीं राजद की रेखा गुप्ता को 14263 (10.95%) वोट मिले।
भाजपा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट हार गई। 30 साल से अभेद रहा किला ढह गया। प्रशांत पहली बार चुनाव लड़े और विधायक बने हैं। उनकी पार्टी को विधानसभा की पहली सीट मिली है।
बांकीपुर में भाजपा को इतनी बड़ी हार क्यों मिली? इस रिजल्ट का सम्राट सरकार और बिहार की राजनीति पर क्या असर होगा?
क्या भरत तिवारी एनकाउंटर और नीट छात्रा हत्याकांड का गुस्सा सामने आया?
क्या छात्र आंदोलन और पुलिस लाठीचार्ज का असर दिखा?
बांकीपुर चुनाव ऐसे वक्त हुआ जब दिल्ली और पटना में पेपर लीक को लेकर छात्रों ने आंदोलन किया। धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा।
- 22 से 25 जुलाई तक पटना समेत दूसरे जिलों में हुए विरोध प्रदर्शन में पुलिस ने 694 छात्रों को हिरासत में लिया, 335 को जेल भेजा। बाद में सरकार ने छात्रों पर दर्ज FIR वापस लिए और जेल से रिहा किया।
- आंदोलन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने जिस तरह लाठी चलाई उससे युवाओं में बीजेपी के प्रति नाराजगी उपजी। उन्होंने बदलाव के लिए जनसुराज को चुना।
- बांकीपुर में मतदाताओं की कुल संख्या 3,79,616 है। 53,419 वोटर 18 से 29 साल के हैं। निर्वाचन विभाग के अनुसार 1,30,208 वोट डाले गए।
- वोट डालने घर से निकले लोगों में युवाओं की संख्या अधिक थी। युवा वोटर भले कुल मतदाताओं के 14% हिस्सा थे, लेकिन कुल 34.30% वोटिंग में इनकी हिस्सेदारी अधिक थी।
बांकीपुर जीतने के लिए पीके ने क्या रणनीति अपनाई?
प्रशांत किशोर ने घर-घर जाने और ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलकर वोट मांगने की रणनीति पर काम किया। इसके लिए पदयात्रा की। 30 दिन में हर दिन 5 चाय पर चर्चा और 2 जनसभा की।
- राजद से अधिक बीजेपी को टारगेट पर लिया। सम्राट चौधरी पर खूब हल्ला बोला। जनता से बार-बार कहते रहे कि अपने बच्चों के लिए वोट करिए, सरकार को बदलने के लिए वोट कीजिए। यह नरेटिव गढ़ने में लगे रहे कि उनकी जीत होगी तो बीजेपी बिहार में मुख्यमंत्री बदल देगी।
- प्रशांत ने अपनी जनसभाओं में लोगों को समझाया कि भाजपा ने आपको ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ ले लिया है। ‘राइट पीपल, राइट थिंकिंग’ (सही लोग, सही सोच) का विचार शेयर किया। व्यवस्था में बदलाव के लिए वोट करने की अपील की।
- पारंपरिक जातिगत नारों के बजाय ड्रेनेज/जलजमाव की समस्या, ट्रैफिक प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर, हायर एजुकेशन और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे उठाए।
क्या जातिवादी मॉडल का अंत हो गया?
बिहार की राजनीति दशकों से जाति आधारित समीकरणों (यादव, कुर्मी, राजपूत, भूमिहार, मुस्लिम, EBC, दलित आदि) पर टिकी है। प्रशांत किशोर लगातार जाति से ऊपर और ‘विकास-गवर्नेंस’ की बात करते रहे हैं।
- बांकीपुर जैसी शहरी सीट पर उन्होंने जीत दर्ज कर जातिवादी समीकरणों के सहारे राजनीति करने वालों को मैसेज दे दिया है कि वोटर अब सिर्फ जाति नहीं, बल्कि उम्मीदवार की छवि, मुद्दे (रोजगार, पलायन, शिक्षा, प्रशासन) और नया विकल्प देखकर वोट दे रहे हैं।
- हालांकि, सिर्फ इस जीत से जातिवादी राजनीति का अंत नहीं होगा। लेकिन राज्यभर में चर्चा जरूर तेज होगी। मीडिया, बुद्धिजीवी और युवा वर्ग में गवर्नेंस, पारदर्शिता, नौकरशाही सुधार और मेरिट पर ज्यादा बात होगी।
- अन्य दल भी मजबूर होंगे कि वे सिर्फ जाति समीकरण न गिनाएं, बल्कि ठोस वादे और ट्रैक रिकॉर्ड दिखाएं। प्रशांत विधानसभा में अकेले विधायक के रूप में भी गवर्नेंस संबंधी मुद्दे उठाकर दबाव बनाए रख सकते हैं।
क्या सम्राट चौधरी की मुश्किलें बढ़ेंगी?
बांकीपुर भाजपा का पारंपरिक किला रहा है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन का परिवार 1995 से यहां से जीतता रहा है।
- प्रशांत किशोर की जीत से तय हो गया कि भाजपा का शहरी, मिडिल क्लास और अपर कास्ट का मजबूत आधार हिल गया है।
- इसका असर यह होगा कि अब राज्यभर में विकल्प नहीं होने और लालू राज के लौटने के डर से भाजपा को वोट दे रहे लोगों को विकल्प मिल जाएगा। इसका सीधा असर भाजपा के कोर वोटरों पर पड़ेगा।
- भाजपा का अभी भी सबसे मजबूत आधार वोट बैंक जनरल कास्ट है, जो कांग्रेस से खिसक कर उसके पास पहुंचा है। अगर यह वोट बैंक बांकीपुर की तरह राज्य के अलग-अलग हिस्सों में भाजपा से खिसका तो बिहार में उसकी स्थिति कांग्रेस वाली हो सकती है।
- प्रशांत किशोर खुद कह चुके हैं- ‘यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है, सम्राट चौधरी के खिलाफ भी जनमत टेस्ट है। क्योंकि नीतीश कुमार के नाम पर वोट लेकर भाजपा ने अपना आदमी सेट किया है। यहां अगर भाजपा हारी तो इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देगी।’
- प्रशांत किशोर की जीत का सीधा असर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पड़ेगा। प्रशांत लोगों के बीच जाकर इस बात को दोहराएंगे कि जनता सम्राट चौधरी को पसंद नहीं करती। भाजपा ने धोखा देकर नीतीश कुमार से कुर्सी हड़पी है। नैरेटिव सेट करेंगे कि सम्राट चौधरी ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे।
क्या RJD-JDU की राजनीतिक हैसियत घटेगी?
प्रशांत किशोर की जीत नीतीश कुमार/निशांत कुमार और तेजस्वी यादव, दोनों के लिए बड़ा झटका है। दोनों की राजनीति पर इसका आगे बड़ा असर पड़ेगा। इसे ऐसे समझिए…
JDU: ‘सुशासन ब्रांड’ और EBC खिसक सकता है
- नीतीश कुमार अब पहले वाली स्थिति में नहीं हैं। JDU पहले से ही सत्ता के लिए गठबंधन पर निर्भर है। अगर भाजपा कमजोर होगी तो इसका असर JDU पर भी पड़ेगा। पार्टी का एक धड़ा RJD से ज्यादा BJP के साथ कंफर्टेबल रहता है।
- प्रशांत के उभार से JDU के कुछ असंतुष्ट नेता आकर्षित हो सकते हैं। पार्टी के अंदर भगदड़ मच सकती है। यह निशांत कुमार के लिए चुनौती भरा होगा।
- नीतीश कुमार का मुख्य राजनीतिक आधार सुशासन और अति-पिछड़ा (EBC) वोट बैंक रहा है। JDU का वोट बैंक न तो चरम RJD विरोधी है और न ही पूरी तरह बीजेपी के साथ। वह विकल्प की तलाश में जनसुराज की तरफ झुक सकता है।
- बांकीपुर में प्रशांत किशोर ने JDU के वोट बैंक में सेंध लगाकर इसे साबित कर दिया है। पार्टी का EBC वोट बैंक प्रशांत किशोर की तरफ खिसक गया है।
RJD: तेजस्वी का M यानी मुस्लिम बिखर सकता है
- प्रशांत किशोर की इस जीत से तेजस्वी यादव की पार्टी को भी चुनौती मिलेगी। युवा और सत्ता परिवर्तन के इच्छुक वोटर, जो कभी RJD की ओर झुकते थे, अब जनसुराज की ओर देख सकते हैं।
- RJD को सबसे बड़ा झटका मुस्लिम वोटरों को लेकर लग सकता है। यह समाज BJP को रोकने के लिए प्रशांत किशोर की तरफ शिफ्ट हो सकता है। बांकीपुर में ऐसा दिखा भी है।
- अगर ऐसा होगा तो तेजस्वी का MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण पूरी तरह बिखर जाएगा और पार्टी बेहद कमजोर हो जाएगी। राज्य में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी 17.7% है।
- दुजरा, सब्जीबाग और आसपास के मुस्लिम बहुल बूथों पर RJD की अच्छी पकड़ थी, लेकिन इस बार यहां प्रशांत किशोर मजबूत होकर उभरे। तेजस्वी की पार्टी की जमानत जब्त हो गई।
- बांकीपुर के किनारे वाले इलाके जो राजेंद्र नगर या कंकड़बाग की बस्तियों से सटे हैं, जहां यादव, केवट/मल्लाह और दलित समाज के लोग अधिक हैं, वहां RJD कड़ा मुकाबला करती थी या बढ़त बनाती थी, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ।
क्या NDA और महागठबंधन में अंदरूनी संतुलन बिगड़ेगा?
बीते 35 सालों में बिहार में कोई पार्टी अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है। उसे दूसरे दलों से गठबंधन करना ही पड़ा है। फिलहाल राज्य में दो गठबंधन है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और महागठबंधन।
- NDA में 5 पार्टियां हैं-BJP, JDU, LJP(R), HAM, RLM।
- महागठबंधन में 7 पार्टियां हैं-RJD, कांग्रेस, माले, CPI, CPI(M), IIP, VIP।
प्रशांत किशोर की बांकीपुर में जीत का दोनों गठबंधनों के अंदरूनी समीकरणों पर असर पड़ सकता है। महागठबंधन में तो इसकी शुरुआत भी हो गई है। कांग्रेस और RJD एक-दूसरे पर हमलावर है। कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने कहा- ‘बिहार में महागठबंधन को ठीक से चलाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी RJD के कंधों पर है, लेकिन बांकीपुर उपचुनाव में तेजस्वी यादव ने बाकी साथी दलों को साथ लेने की जरूरत नहीं समझी।’‘आखिर तेजस्वी ने इस चुनाव में सहयोगियों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? तेजस्वी यादव गठबंधन को लेकर बिल्कुल भी ईमानदार नहीं हैं। वह अपना खुद का राजनीतिक समीकरण बचाने में भी नाकाम रहे हैं।’कांग्रेस के इस बयान पर RJD ने पलटवार किया है। RJD प्रवक्ता एजाज अहमद ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। प्रशांत की जीत से तीसरी ताकत की संभावना मजबूत होगी। NDA के अंदर के दलों का नजरिया भी अगले चुनाव तक बदल सकता है।
क्या एक सीट पर उपचुनाव से पीके को फायदा हुआ?
विधानसभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर का सामना भाजपा, राजद और जदयू जैसी पुरानी पार्टियों से हुआ, जिसके कार्यकर्ता गांव-गांव में हैं। इन पार्टियों के पास जनसुराज की तुलना में ज्यादा संसाधन हैं। एक सीट पर उपचुनाव होने से प्रशांत किशोर को फायदा मिला। उन्होंने अपने सारे कार्यकर्ता और संसाधन लगा दिए। उन्हें पहले की तरह पूरे बिहार पर फोकस करने की जरूरत नहीं थी।बांकीपुर के शहरी क्षेत्र होने का भी लाभ पीके को मिला। वह कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिल पाए।
दतिया में बीजेपी क्यों हारी………
मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव का नतीजा सिर्फ़ एक सीट का फै़सला नहीं माना जा रहा है बल्कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में यह बीजेपी की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी.दूसरी तरफ़ कांग्रेस भी ऐसा चुनाव लड़ रही थी, जहां प्रचार ख़त्म होने से एक दिन पहले ही उसे अपने पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित करना पड़ा.इसके बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हरा दिया.यह वही सीट थी जो कांग्रेस विधायक रहे राजेंद्र भारती की बैंक धोखाधड़ी के एक मामले में दोषसिद्धि के बाद विधानसभा सदस्यता ख़त्म होने से ख़ाली हुई थी. चुनाव प्रचार के आख़िरी दिनों में कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए थे. कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने राजेंद्र भारती पर बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगाया. दूसरी तरफ़ राजेंद्र भारती ने दावा किया कि घनश्याम सिंह के संबंध बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से हैं.
बीजेपी भी नहीं थी आसान स्थिति में
बीजेपी ने दतिया से छह बार विधायक और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया था. उनकी जगह पहली बार चुनाव लड़ रहे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा गया. हालांकि इन सबके बावजूद कांग्रेस तीसरे राउंड से बढ़त बनाने में सफल रही. एक समय उसकी बढ़त 12 हज़ार वोट से भी ज़्यादा पहुंच गई. हालांकि आख़िरी दो राउंड में यह अंतर काफ़ी कम हुआ, लेकिन कांग्रेस ने सीट आख़िरकार जीत ली. यह लगातार दूसरी बार है जब दतिया विधानसभा सीट पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है. 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को हराया था और अब उपचुनाव में भी बीजेपी यह सीट वापस नहीं जीत पाई. दिलचस्प यह है कि दतिया में हुआ उपचुनाव सरकार बदलने वाला नहीं था. विधानसभा में बीजेपी के बहुमत पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. इसके बावजूद दोनों दलों ने इस सीट पर पूरी ताकत झोंक दी. मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, मंत्रियों और संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव प्रचार किया. बीजेपी ने इसे अपनी संगठनात्मक ताकत की परीक्षा की तरह लड़ा. दूसरी तरफ कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ बीजेपी की अंदरूनी कलह को भी चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की.
क्या नरोत्तम मिश्रा सबसे बड़ा फ़ैक्टर थे?
दतिया उपचुनाव की चर्चा नरोत्तम मिश्रा का नाम लिए बिना पूरी नहीं हो सकती. करीब तीन दशक तक दतिया की राजनीति में प्रभाव रखने वाले नरोत्तम मिश्रा को इस बार बीजेपी ने टिकट नहीं दिया. उनकी जगह पहली बार चुनाव लड़ रहे आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया. टिकट की घोषणा के बाद विरोध प्रदर्शन हुए, कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफ़ा दिया और चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा का भावुक होना भी चर्चा का विषय बना.हालांकि बाद में उन्होंने कार्यकर्ताओं से शांत रहने की अपील की और पार्टी उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार भी किया.इसके बावजूद पूरे चुनाव के दौरान यह सवाल बना रहा कि क्या वर्षों से नरोत्तम मिश्रा के साथ काम करने वाला संगठन उतनी सहजता से नए उम्मीदवार के साथ खड़ा हो पाएगा. “नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना, उसके बाद मंच पर उनका भावुक होना और फिर कार्यकर्ताओं के बीच दिखी नाराज़गी इस नतीजे के पीछे सबसे साफ कारण दिखता है.” चुनाव के दौरान यह भी साफ़ दिखा कि स्थानीय स्तर पर बीजेपी का संगठन पूरी तरह एकजुट नहीं दिखाई दिया. वैसे पूरी कहानी सिर्फ़ नरोत्तम मिश्रा तक सीमित नहीं है.
क्या स्थानीय मुद्दे बीजेपी पर भारी पड़े?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर दतिया के नतीजे को सिर्फ़ नरोत्तम मिश्रा के टिकट कटने तक सीमित कर दिया जाए तो चुनाव की पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी. पूरे प्रदेश की तरह दतिया के ग्रामीण इलाकों में भी खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे लगातार चर्चा में रहे. खाद, बीज, डीज़ल की कीमतें और किसानों की परेशानियां चुनाव के दौरान लगातार लोगों के बीच चर्चा का विषय थीं. भोपाल में किसानों के आंदोलन, दिल्ली में हुए आंदोलन, अयोध्या चढ़ावा चोरी विवाद और हाल के स्टूडेंट आंदोलनों जैसे मुद्दों ने भी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में भूमिका निभाई. कुछ का मानना है की दतिया के लोगों के लिए यह ऐसा चुनाव था जिसकी उन्होंने कुछ महीने पहले तक कल्पना भी नहीं की थी. “राजेंद्र भारती की सदस्यता ख़त्म होने के बाद अचानक उपचुनाव की नौबत आई. ऐसे में मतदाताओं के एक वर्ग में यह भावना भी थी कि उन पर एक तरह से ज़बरदस्ती का चुनाव आ गया है.अचानक हुए उपचुनाव का असर मतदाताओं के मनोविज्ञान पर भी पड़ा. बीजेपी ने चुनावी प्रबंधन पर काफी भरोसा किया, लेकिन सिर्फ प्रबंधन से चुनाव नहीं जीते जाते.पार्टी ने बाहर से उम्मीदवार लाकर चुनाव लड़ाया. लेकिन स्थानीय स्तर पर उसका अपेक्षित असर नहीं दिखा. चुनाव सिर्फ प्रबंधन से नहीं जीते जाते. स्थानीय संगठन और मतदाताओं का भरोसा भी उतना ही अहम होता है.
दतिया उपचुनाव की एक दिलचस्प बात यह रही कि कांग्रेस भी पूरी तरह एकजुट नहीं थी.चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में पूर्व विधायक राजेंद्र भारती और कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह के बीच आरोप-प्रत्यारोप खुलकर सामने आए. मतगणना से एक दिन पहले कांग्रेस ने राजेंद्र भारती को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित भी कर दिया. इसके बावजूद कांग्रेस सीट बचाने में सफल रही.
नतीजों के बाद बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर संयमित प्रतिक्रिया दी लेकिन साथ ही वॉर्निंग भी दी है.मध्य प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि पार्टी मतदाताओं के जनादेश को विनम्रता के साथ स्वीकार करती है. लेकिन उन्होंने आगे कहा, “परिणामों की समीक्षा की जाएगी और समीक्षा में अगर किसी स्तर पर अनुशासनहीनता या कोई कमी सामने आती है तो उसके अनुसार कार्रवाई होगी.उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी ने पूरी ताकत से चुनाव लड़ा, लेकिन कुछ परिस्थितियों की वजह से पार्टी यह सीट अपने पक्ष में नहीं ला सकी.
चर्चा तो यह भी है की दतिया चुनाव के नतीजे चिंता की वजह हैं. प्रदेश में पार्टी अभी आंतरिक रूप से एक नहीं है. मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद वाली बात जनता के बीच पहुंची है. इस चुनाव में पार्टी उस तरह से एकजुट होकर लड़ाई नहीं लड़ पाई जिसके लिए हम जाने जाते हैं. लेकिन बीजेपी में हम सब एक हैं. इस नतीजे पर मंथन करने के बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी. दतिया उपचुनाव का असर सिर्फ़ एक विधानसभा सीट तक सीमित रहेगा या नहीं, यह आने वाले समय में साफ़ होगा. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मोहन यादव के नेतृत्व की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी.
क्या दतिया में कांग्रेस की जीत स्थानीय समीकरणों का नतीजा है या यह प्रदेश की राजनीति में बदलते माहौल का संकेत भी देती है? इन सवालों के जवाब अभी पूरी तरह साफ़ नहीं हैं. लेकिन इतना ज़रूर है कि दतिया का उपचुनाव सिर्फ़ कांग्रेस की एक सीट बचाने या बीजेपी की एक सीट हारने की कहानी नहीं रहा.
मांजलपुर में BJP का दबदबा बरकरार
गुजरात के वडोदरा जिले की मांजलपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी ने शानदार जीत दर्ज की है। भाजपा उम्मीदवार सतीश पटेल ने अपने प्रतिद्वंद्वी भीखाभाई रबारी को 30630 वोटों के बड़े अंतर से हराकर पार्टी का सीट पर कब्जा बरकरार रखा है। इस जीत को भाजपा के लिए बड़ी राजनीतिक सफलता माना जा रहा है, जबकि विपक्ष को इस सीट पर करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।
सीनियर भाजपा विधायक और गुजरात के पूर्व मंत्री योगेश पटेल के निधन के बाद 30 जुलाई को इस सीट पर वोटिंग हुई थी। मंजालपुर सीट पर वोटिंग शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई थी। यहां 37.50 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2022 के गुजरात विधानसभा चुनावों में दर्ज 60.15 प्रतिशत की तुलना में काफी कम है।
चुनाव आयोग के अनुसार, मांजलपुर सीट में कुल 2,19,494 मतदाता वोटिंग के पात्र थे, जिनमें 1,634 दिव्यांग व्यक्ति, 85 साल और उससे अधिक आयु के 1,406 मतदाता और 12 शतायु व्यक्ति शामिल थे। मतदान के दिन से पहले, 90 वरिष्ठ नागरिकों सहित 107 मतदाताओं ने चुनाव आयोग की घर बैठे मतदान सुविधा के माध्यम से अपना वोट डाला था।
- गुजरात की मांजलपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज करके अपनी सियासी नाक बचा लेने में जरूर सफलता हासिल की है।
- 2008 में परिसीमन के बाद वडोदरा जिले में यह सीट बनी और पहली बार 2012 में हुए चुनाव से लेकर 2026 के उपचुनाव तक में बीजेपी यहां कभी नहीं हारी और बड़ी जीत दर्ज करती रही।
- मांजलपुर सीट का बीजेपी के लिए अहमियत इसी से समझा जा सकता है कि यह वडोदरा लोकसभा के अंदर आती है, जहां से 2014 में वाराणसी के अलावा पीएम मोदी ने अपना पहला संसदीय चुनाव जीता था।
- लेकिन, अगर 2022 के विधानसभा चुनाव और मौजूदा उपचुनाव के परिणामों की तुलना करें तो अभी बीजेपी प्रत्याशी को 67% से ज्यादा वोट जरूर मिले हैं, लेकिन 2022 के 75.85% वोट शेयर से इसमें काफी गिरावट आ चुकी है।
- गुजरात में 2027 के आखिर में विधानसभा चुनाव हैं और मांजलपुर के वोटरों ने बीजेपी को अभी से संभल जाने का संदेश दे दिया।
कुल मिलाकर तीनों विधानसभा उपचुनावों के नतीजों के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फैक्टर बीजेपी के जनाधार को तभी जीत में बदल सकता है, जब स्थानीय स्तर पर भी मतदाताओं का पार्टी पर भरोसा कायम रहे। वोटर अब आंख मूंदकर किसी भी प्रत्याशी को पीएम मोदी के नाम पर वोट देने से पहले विकल्प की ओर भी विचार करने लगे हैं।




