दिल्ली के जंतर-मंतर पर करीब महीने भर से चल रहा काक्रोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन अब राष्ट्रव्यापी विस्तार ले रहा है. महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल से लेकर तकरीबन आधा दर्जन राज्यों में इसकी झलक दिखने लगी है. यह सच है कि छात्रों का यह आंदोलन 1974 के जेपी मूवमेंट के बाद दूसरा बड़ा छात्र आंदोलन बनने की ओर अग्रसर है, पर दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है. तब की इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने छात्र आंदोलन को कुचल दिया था, लाठी-डंडे और गोली के बाद रही-सही कसर इमरजेंसी लगा कर उन्होंने पूरी की थी. लेकिन इस बार नरेंद्र मोदी की सरकार ने बातचीत का सिलसिला शुरू किया है. नतीजे क्या होंगे, यह जल्द ही पता चलने की उम्मीद की जा सकती है.
1974 का छात्र आंदोलन
गुजरात में छात्रों ने सबसे पहले हॉस्टल के खाने की गुणवत्ता, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर आंदोलन शुरू किया. धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में यह फैल गया. इसे बिहार के छात्रों ने मुकाम तक पहुंचाया. चूंकि तब छात्रों का कोई एक नेता नहीं था, जो आंदोलन का नेतृत्व कर सके. इसके लिए बिहार के छात्रों ने समाजवादी पृष्ठभूमि के नेता और सक्रिय राजनीति से दूरी बना चुके जय प्रकाश नारायण से संपर्क साधा. शुरुआती ना-नुकुर के बाद जेपी इसके लिए तैयार हो गए. 1974 में बिहार में छात्रों का आंदोलन जेपी के आते ही जनांदोलन में बदल गया. पहले से महंगाई और भ्रष्टाचार से तबाह लोग भी छात्रों के सवाल पर आंदोलन का हिस्सा बनने लगे. जेपी ने आंदोलन को राष्ट्रव्यापी बना दिया. तब ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं. केंद्र की इंदिरा सरकार के लिए छात्रों का आंदोलन मुसीबत बन गया था.
इमरजेंसी से दबाया
इस बीच चुनावी गड़बड़ियों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला इंदिरा गांधी के खिलाफ आ गया. पहले से ही तिलमिलाई इंदिरा गांधी की झल्लाहट और बढ़ गई. उन पर इस्तीफे का दबाव बढ़ने लगा. इन सबका निदान उन्होंने इमरजेंसी लगाने में दिखा. अपने कुछ दरबारी सहयोगियों की सलाह पर उन्होंने इमरजेंसी लगा दी. छात्रों से लेकर विरोधी दलों के नेताओं को सरकार के निर्देश पर पुलिस ने जेलों में ठूंस दिया. लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, चौधरी चरण सिंह, सुशील कुमार मोदी, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान जैसे बिहार समेत देश भर के तब के छात्र नेताओं को भी जेल जाना पड़ा था. राजनीतिक दलों ने सत्ता बदले बगैर इमरजेंसी के नारकीय हालात से मुक्ति मिलने की उम्मीद छोड़ दी थी. आखिरकार संसदीय राजनीति के जरिए सत्ता परिवर्तन की योजना बनी. तत्कालीन जनसंघ और समाजवादी विचारधारा वाली पार्टियों ने अपनी पहचान मिटा कर जनता पार्टी बना ली. चुनाव हुए तो जनाक्रोश के आगे इंदिरा गांधी टिक नहीं पाईं.
CJP के भी वैसे ही मुद्दे
काक्रोच जनता पार्टी की नींव भले आभासी अंदाज में पड़ी, लेकिन इसके नामकरण और आंदोलन के मुद्दे छात्रों और युवाओं को ध्यान में रख कर चुने गए. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने डिग्री लेकर घूमने वाले युवाओं को काक्रोच कह दिया. पहले से ही कई नामों पर विचार कर रहे अभिजीत दीपके और उनके साथियों ने युवाओं को भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए काक्रोच जनता पार्टी नाम रखना मुनासिब समझा. सोशल मीडिया के बढ़ते वर्चस्व का फायदा सीजेपी ने उठाया और देखते-देखते करोड़ों में इसके फालोवर्स बन गए. इसी बीच NEET परीक्षा में पेपर लीक की घटना हो गई. सीजेपी ने सिर्फ एक मुद्दे पर आंदोलन का ऐलान कर दिया. बेतहाशा बढ़ती आबादी वाले देश में बेरोजगारी का मुद्दा तो शाश्वत है. यह हालत आज से 50 साल पहले भी थी और आज भी उसी अनुपात में बरकरार है. इसलिए सीजेपी के मुद्दों में यह भी शामिल हो गया.
BJP से आंदोलन की छूट
1974 और 2026 के छात्र आंदोलन में एक और बड़ा फर्क है. तब इंदिरा गांधी ने छात्रों के आंदोलन को कुचलने का कुचक्र चलाया. अकेले बिहार में ही दर्जन भर से ज्यादा छात्रों की मौत हुई. 18 मार्च 1974 को पटना में विधानसभा घेराव के दौरान पुलिस से झड़प में कई छात्रों की मौत हो गई. फिर गया में छात्रों पर फायरिंग हुई और कई छात्र वहां भी शहीद हुए. इस बार सीजेपी के आंदोलन को आरंभ से ही किसी ने नहीं रोका. उन्हें धरना-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर का मैदान मुहैया कराया गया. 3 हफ्ते से अधिक दिनों तक चला सीजेपी का आंदोलन 20 जुलाई को तब उग्र हो गया, जब संसद मार्च के दौरान बैरिकेडिंग तोड़ने का प्रयास करने वाले युवाओं को रोकने के लिए पुलिस ने एहतियाती कदम उठाए. इसमें कुछ छात्र घायल भी हुए हैं. छात्रों ने भी करीब 150 पुलिस वालों को गंभीर चोटें पहुंचाई हैं.
सरकार बातचीत को राजी
छात्रों की मांग NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी रोकने की है. बाद में अन्य मुद्दे भी शामिल किए गए हैं. सरकार ने आंदोलनकारी छात्रों से बातचीत भी शुरू कर दी है. यह अलग बात है कि अभी तक बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला है. इधर छात्रों की मांग के समर्थन में अनशन कर रहे सोनम वांगचुक सरकार की पहल से संतुष्ट दिखते हैं. सरकार की पहल पर उन्होंने न सिर्फ अपना अनशन खत्म कर दिया, बल्कि छात्रों से अहिंसक आंदोलन की अपील भी की है. उन्होंने परीक्षाओं में गड़बड़ियां रोकने के लिए सरकार से सख्त रुख अपनाने की शर्त रखी है. यह भी कि अब तक छात्रों से जो गड़बड़ियां हुई हैं, उसके लिए उन्हें दंडित न किया जाए. उनकी बात सरकार ने मान ली है और वांगचुक ने इस आधार पर अपना अनशन भी तोड़ दिया है.
प्रधान के इस्तीफे पर अड़े
सोनम वांगचुक सरकार के आश्वासन से संतुष्ट हैं. सरकार ने भी आनन-फानन कैबिनेट में पेपर लीक जैसे अपराध के लिए सख्त सजा का प्रस्ताव पास कर दिया है. इसके बावजूद सीजेपी के संस्थापकों में अभिजीत दीपके को लगता है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से ही इस समस्या का हल निकल सकता है. वे लगातार सोशल मीडिया पर संदेश दे रहे हैं कि प्रधान के इस्तीफे तक छात्रों का अंदोलन जारी रहेगा. यह उनकी जिद है. किसी भी निर्वाचित सरकार की दिक्कत यह हो सकती कि वह किसी के डिक्टेशन पर काम करने लगे तो कोई भी दबाव डाल कर उसके फैसले बदलवा सकता है. लगभग सभी राज्यों में इस तरह की गड़बड़ियां सामने आ रही हैं. झारखंड इसका ताजा उदाहरण है. अगर ऐसा होने लगे तो रोज मुख्यमंत्री और मंत्री बदलने पड़ेंगे.







