कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के धरना व प्रदर्शन के दौरान छात्रों के खिलाफ हुई हिंसा के बाद युवा वर्ग बेहद आहत है और ऐसे में राहुल गांधी की अगुआई में कांग्रेस के पास खुद को आगे बढ़ाने का एक अच्छा अवसर भी है। मगर सवाल यही है कि हर बार अच्छे अवसरों को गंवाने वाली कांग्रेस क्या इस बार सरकार के खिलाफ बने माहौल को अपने पक्ष में भुना पाएगी?
दरअसल, यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि इस पूरे मसले पर राहुल गांधी ने धैर्य के साथ और एक सोची-समझी रणनीति के तहत काम किया है। कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन तो करीब एक महीने से चल रहा है, लेकिन राहुल ने इससे दूरी बनाए रखी। कुछ लोग सवाल भी उठाते रहे कि आखिर सरकार विरोधी इस आंदोलन में राहुल खुद क्यों नहीं जा रहे? राहुल की सोच यह थी कि अगर वह सीजेपी के प्रदर्शन में चले गए, तो एक तो इसका पूरा फायदा उस संगठन को मिल जाएगा और दूसरा यह कि कांग्रेस स्वयं भी पेपर लीक के मुद्दे पर लगातार विरोध दर्ज करा रही है, जिससे उसका अपना प्रतिरोध कमजोर पड़ सकता था। इसके अलावा, एक आशंका यह भी थी कि इसमें राहुल के कूदते ही भाजपा या उसके समर्थक इस पूरे मुद्दे की दिशा ही मोड़ने का प्रयास करते।
अब देखने वाली बात यह है कि कांग्रेस इस पूरे मसले को कितने प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाती है। देश का युवा पूरे हालात पर नजर बनाए हुए है। लेकिन, कांग्रेस के सामने बड़ी व्यावहारिक चुनौती यह है कि अधिकांश यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में या तो भाजपा समर्थित छात्र संगठनों का दबदबा है या वामपंथी छात्र संघों का। कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई का प्रभाव अब वैसा नहीं रहा, जैसा कभी हुआ करता था। ऐसे में, केवल राहुल गांधी के व्यक्तिगत राजनीतिक उभार के बलबूते पार्टी इस मसले का कितना सियासी फायदा उठा पाएगी, उसी से उसकी सफलता तय होगी।
देश की राजनीति आज ऐसे मुकाम पर आ खड़ी है, जहां कांग्रेस को अन्य विपक्षी दलों को या तो साथ लेकर चलना है या उन्हें सही ढंग से साधना है। छात्रों के इस आंदोलन को आम आदमी पार्टी (आप) लगातार समर्थन दे रही है और वह सिर्फ भाजपा सरकार से ही नहीं, बल्कि कांग्रेस से भी टकरा रही है। वजह स्पष्ट है-पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव। वहां आम आदमी पार्टी का मुख्य मुकाबला कांग्रेस से ही है। उसे लग रहा है कि इस मुद्दे पर अगर कांग्रेस ने बढ़त बना ली, तो उसे पंजाब चुनाव में बड़ा नुकसान हो सकता है। आम आदमी पार्टी का आखिरी गढ़ पंजाब ही है, जिसे वह किसी भी कीमत पर बचाना चाहती है।
दूसरी ओर, राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के साथ अपनी बॉन्डिंग को और मजबूत कर सकते हैं, जहां अगले साल की शुरुआत में बेहद महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का अच्छा प्रभाव है। वहां उनका एक मजबूत जनाधार भी है और उन्हें बड़े तबकों का समर्थन मिलता आया है। मंगलवार को प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने के दौरान अखिलेश यादव भी राहुल के साथ मौजूद थे और उन्होंने भी गिरफ्तारी दी। यह दोनों नेताओं के बीच बेहतर सियासी तालमेल का सबूत है, जिसे उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक बनाए रखना होगा। इसके अलावा, देशभर में दलितों या पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाले जितने भी सामाजिक संगठन हैं, राहुल गांधी उनका साथ ले सकते हैं। यह सामाजिक न्याय को लेकर राहुल की लड़ाई के अनुकूल भी रहेगा और राजनीतिक रूप से फायदेमंद भी।
हालांकि, इस पूरे माहौल में राहुल गांधी को अपनी चुनावी चालें बेहद सावधानी से चलनी होंगी। सबसे करीबी परीक्षा पंजाब में होने जा रही है। अगर कांग्रेस वहां चुनाव हार जाती है और दूसरे या तीसरे स्थान पर खिसकती है, तो इससे उसकी भारी किरकिरी होगी। यह स्थिति ‘एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे हटने’ जैसी होगी, क्योंकि हमारे देश के लोकतंत्र में हर बात हार-जीत पर ही निर्भर करती है। इसी तरह, अगर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की अगुआई में भाजपा दोबारा चुनाव जीत जाती है, तो पूरा विपक्ष हाशिये पर पहुंच जाएगा। इसके विपरीत, अगर पंजाब में कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में अखिलेश की अगुआई वाला गठबंधन जीत दर्ज करता है या अच्छी टक्कर देता है, तो सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि पूरे देश के विपक्ष को एक नई संजीवनी मिल जाएगी। इस तरह, छात्र आंदोलन के बहाने ही सही, यह कांग्रेस के लिए खुद को पुनर्जीवित करने का एक बेहतरीन मौका भी है।
यहां अन्ना आंदोलन और सीजेपी के इस आंदोलन के बीच के फर्क को भी समझना होगा। अन्ना आंदोलन मुख्य रूप से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केंद्रित था, जिसमें पूरे भ्रष्ट सिस्टम को बदलने का आग्रह था और लोकपाल की नियुक्ति उसका मुख्य समाधान थी। इसके विपरीत, सीजेपी का यह आंदोलन एक बयान या टिप्पणी से उपजा विरोध है, जो अब शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया है। अगर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा पहले ही हो जाता, तो शायद यह आंदोलन इतना आगे बढ़ता ही नहीं। लेकिन, सरकार ने जब यह छोटी-सी मांग भी नहीं मानी, तो यह युवाओं के भीतर सरकार के प्रति अविश्वास के बड़े आंदोलन में बदल गया। इसमें सोनम वांगचुक की एंट्री ने सरकार के खिलाफ बने अविश्वास को एक नैतिक धार दे दी है। सरकार के प्रति बने इसी अविश्वास के माहौल पर कांग्रेस को अपनी भावी राजनीति तय करनी है।
प्रधानमंत्री आवास के बाहर राहुल गांधी के धरने के बाद कई लोग राहुल और कांग्रेस पर छात्र आंदोलन को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा रहे हैं। यहां कांग्रेस को ऐसे आरोपों से घबराने या विचलित होने के बजाय पुरजोर तरीके से यह स्पष्ट करना होगा कि लोकतंत्र में अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए राजनीति एक मान्यता प्राप्त और वैध जरिया है, जिसका इस्तेमाल करने का अधिकार सभी को है। और, एक जिम्मेदार विपक्षी दल होने के नाते यह अधिकार एक कदम आगे बढ़कर लोकतांत्रिक कर्तव्य भी बन जाता है।







