बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उप चुनाव में बीजेपी ने अपना कैंडिडेट बदल दिया है। आनन-फानन में नए उम्मीदवार का नाम घोषित किया गया है।
अभिषेक सिन्हा का नाम इसलिए वापस लिया गया कि उनके पिता रविंद्र सिन्हा का नाम चारा घोटाले से जुड़ा पाया गया। उनके पिता पर लालू यादव के साथ चारा घोटाले में 50 हजार रुपए जुर्माना लगा था। इस बात की चर्चा छिड़ने लगी थी कि नितिन नवीन ने चारा घोटाला के आरोपी के बेटे को टिकट दिलवाया है।
इससे पहले कि प्रशांत किशोर और राजद इस मसले को मुद्दा बनाते, अभिषेक सिन्हा ने अपना नामांकन वापस ले लिया। चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार, अभिषेक सिन्हा की मार्कशीट में गड़बड़ी पाई गई है। इस कारण से उनका नामांकन कैंसिल भी हो सकता था। बीजेपी ने इस फजीहत से बचने के लिए नामांकन वापस कराया है।
अभिषेक ने अचानक नामांकन क्यों वापस लिया, क्या तर्क दिया। विपक्ष इसे कैसे मुद्दा बना रहा था।
अभिषेक सिन्हा के नामांकन वापस लेने की 3 बड़ी वजह
1. पिता को चारा घोटाले में जुर्माना
अभिषेक सिन्हा के पिता रविंद्र प्रसाद सिन्हा मेसर्स मगध केमिकल्स कॉर्पोरेशन नाम की कंपनी में मैनेजर थे। यह कंपनी चारा घोटाला में शामिल थी। रविंद्र प्रसाद पर अधिकारियों के साथ मिलकर फर्जी बिलों के जरिए सरकारी खजाने से पैसा निकालने का आरोप था।
डोरंडा ट्रेजरी केस में अवैध निकासी को लेकर लालू यादव समेत 99 अभियुक्तों पर सीबीआई कोर्ट ने फैसला सुनाया था। लालू समेत 75 आरोपी दोषी करार दिए गए थे। इनमें रविन्द्र प्रसाद भी शामिल थे। उनपर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगा था।
2- नामांकन में दी गलत जानकारी, हो सकता था रद्द
सूत्रों के अनुसार, अभिषेक ने नामांकन में गलत जानकारी दी थी। उन्होंने पढ़ाई से जुड़ी जानकारियां भी छिपाई थी। इस गलती की वजह से उनका नॉमिनेशन रद्द हो सकता था। ऐसे में भाजपा ने जोखिम नहीं लेने का फैसला किया।
बता दें कि अभिषेक ने नॉमिनेशन में खुद को 10वीं पास बताया था, लेकिन उनकी मार्कशीट में कुछ गड़बड़ियां पाई गई हैं। इसके साथ ही अभिषेक ने अपने कारोबार से जुड़े मामले को भी छिपाया है।
3- राजद के नेता और प्रशांत किशोर बनाने वाले थे मुद्दा
अभिषेक सिन्हा को लेकर राजद के नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले थे। इसमें उनकी पढ़ाई, नामांकन में की गई गलती और उनके पिता के चारा घोटाला से जुड़े मुद्दे को उठाया जाना था। वहीं, जन सुराज ने नेता भी इन मुद्दों पर भाजपा को घेरने वाले थे।
प्रशांत किशोर ने कहा, ‘मैंने पहले ही कहा था कि जन बल के आगे कोई बल नहीं है। अभी तक आपने देखा था कि बीजेपी के डर से दूसरी पार्टियों के उम्मीदवार भागते थे। ये दूसरी पार्टी के उम्मीदवारों को CBI, ED का डर दिखाकर, किसी को खरीदकर, किसी का नामांकन रद्द कराकर उम्मीदवार बदलवाते थे। आज ऊपर वाले ने इनके साथ ही इंसाफ कर दिया। पहली ही लड़ाई में इनका उम्मीदवार भाग गया।’
कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने अभिषेक सिन्हा की नामांकन वापसी पर कहा, ‘उन्होंने बताया कि पारिवारिक कारणों से नाम वापस ले रहे हैं। क्या बचकाना बहाना है। परिवार के लोगों को तो खुशियों का खजाना मिल गया था। कम से कम बहाने वाली स्क्रिप्ट तो अच्छी लिखवाते।’
आरजेडी के प्रदेश प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने कहा, बांकीपुर उपचुनाव में मुकाबला दिलचस्प हो गया है। बीजेपी ने अपना उम्मीदवार वापस ले लिया है। कार्यकर्ता निराश हो गए हैं। बीजेपी को हार को सामना करना पड़ेगा।
अभिषेक सिन्हा ने नामांकन वापस लेने की क्या वजह बताई?
अभिषेक सिन्हा ने नाम वापस लेते हुए कहा, ‘पारिवारिक कारणों की वजह से मैं चुनाव लड़ने में असमर्थ हूं। चुनाव नहीं लड़ने का लेटर प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को सौंपा है।’ अभिषेक ने प्रदेश अध्यक्ष को सौंपे लेटर में लिखा- मुझे BJP ने बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव में NDA प्रत्याशी बनाया, उसके लिए केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व के प्रति आभार प्रकट करता हूं ।
विनम्रता के साथ आपको आग्रह करना चाहता हूं कि मैं पारिवारिक कारण से विधानसभा उप चुनाव लड़ने में असमर्थ हूं। मैं कार्यकर्ता के नाते निष्ठा पूर्वक सेवा देता रहूंगा।
चारा घोटाले में क्या थी रविन्द्र प्रसाद की भूमिका?
चारा घोटाले में नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ निजी सप्लायरों और उनसे जुड़े लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई थी। इन्हीं नामों में रविन्द्र प्रसाद भी शामिल हैं। रविन्द्र पटना स्थित एम/एस मगध केमिकल कॉर्पोरेशन के मैनेजर थे और उन्हें चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में दोषी ठहराया गया था।
दस्तावेज के अनुसार, चारा घोटाले के दौरान पशुपालन विभाग से फर्जी बिलों के जरिए सरकारी पैसे निकाले गए। इस पूरे तंत्र में विभागीय अधिकारियों, ट्रेजरी कर्मचारियों और निजी सप्लायरों की मिलीभगत थी। रविन्द्र का नाम उन निजी सप्लायरों की कैटेगरी में दर्ज है, जिन पर बिना असल में सप्लाई किए फर्जी बिलों के माध्यम से पैसे लेने का आरोप सिद्ध हुआ।
रविन्द्र प्रसाद उन 75 आरोपियों में शामिल थे, जिन्हें पशुपालन विभाग से जुड़े मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने दोषी ठहराया। कोर्ट ने 3 साल जेल और 50 हजार रुपए जुर्माना की सजा सुनाई थी।
चारा घोटाला में अभिषेक की मां चंचला सिन्हा को मिली थी 3 साल जेल की सजा
अभिषेक सिन्हा की मां चंचला सिन्हा को चारा घोटाला से जुड़े जिस केस में सजा मिली थी उसे 28.8.1996 को दर्ज किया गया था। आरोप था कि चाईबासा के जिला पशुपालन कार्यालय और जिला ट्रेजरी कार्यालय के आरोपी सरकारी कर्मचारियों ने आरोपी सप्लायरों के साथ मिलकर साजिश रची।
वित्त वर्ष 1992-93 के दौरान धोखाधड़ी से लगभग 37.62 करोड़ रुपए निकाले। पैसे फर्जी अलॉटमेंट लेटर, सप्लाई ऑर्डर और बिलों के आधार पर निकाले गए। CBI ने जांच के बाद 12.12.2001 को स्पेशल कोर्ट में लालू यादव, डॉ. जगन्नाथ मिश्रा और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। 25 अप्रैल 2005 को आरोप तय किए गए।
ट्रायल कोर्ट ने 50 आरोपियों को दोषी पाया और सजा सुनाई। कोर्ट ने छह आरोपियों को बरी कर दिया। ट्रायल के दौरान 14 आरोपियों की मौत हो गई। इस केस में लालू यादव व जगन्नाथ मिश्रा को 5 साल जेल और 10 लाख रुपए जुर्माना की सजा मिली थी। चंचला सिन्हा को 3 साल जेल और 80 हजार रुपए जुर्माना की सजा मिली थी।
चारा घोटाला के डोरंडा कोषागार मामले में चंचला सिन्हा हुईं थी बरी
चंचला सिन्हा रांची के डोरंडा स्थित कोषागार से 36.59 करोड़ की अवैध निकासी मामले में भी आरोपी थीं। इस केस में 125 लोगों को आरोपी बनाया गया था। आरोप था कि 1990-91 और 1994-95 में फर्जी अलॉटमेंट लेटर के आधार पर सरकारी खजाने से अवैध निकासी की गई।
रांची स्थित सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने अगस्त 2023 में आरोपियों में से 90 को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। चंचला सिन्हा समेत 35 को बरी कर दिया था।
क्या है चारा घोटाला?
चारा घोटाले की शुरुआत छोटे-छोटे मामलों से हुई। इसके बाद यह 55 से ज्यादा मामलों तक जा पहुंचा। हालांकि, बाद में कई केस को मिलाकर एक साथ करने से इसकी संख्या काफी कम हो गई।
- यह मामला बिहार विभाजन से पहले 1992 से 1995 तक राज्य के सरकारी खजाने से गलत ढंग से 950 करोड़ रुपए निकालने का है।
- इस दौरान पशुपालन विभाग के अफसरों ने नेताओं की मदद से नकली बिल के जरिए चारा, दवा और कृत्रिम गर्भाधान उपकरण के नाम पर सरकारी खजाने से ये पैसे निकाले।
- इनमें से 6 मामलों में लालू यादव को आरोपी बनाया गया था। साथ ही बिहार के विभाजन के बाद इनमें से 5 मामले झारखंड में ट्रांसफर कर दिए गए थे।
- 1979 में जब राम सुंदर दास बिहार के CM थे तभी से पशुपालन विभाग में इस तरह की हेरा-फेरी कर पैसे निकालने के अपुष्ट आरोप लगने लगे थे।
- 1992 में तत्कालीन विजिलेंस इंस्पेक्टर बिधू भूषण द्विवेदी ने पहली बार लालू और उनके पूर्ववर्ती जगन्नाथ मिश्रा के चारा घोटाले में शामिल होने की पहली रिपोर्ट डायरेक्टर जनरल जी नारायण को सौंपी थी।
- दिसंबर 1995 में कैग की रिपोर्ट आने के बाद चारा घोटाले की बात लोगों के सामने आई। लालू कुछ महीने पहले ही बिहार के दूसरी बार CM बने थे। उनके पास उस दौरान पशुपालन विभाग था। लालू ने ही कैग की रिपोर्ट भी पेश की थी।
- कैग की रिपोर्ट में कहा गया था कि पशुपालन विभाग से लालू के कार्यकाल के दौरान बिलों की धोखाधड़ी के जरिए सरकारी खजाने से लगभग 950 करोड़ रुपये निकाले गए।







