बिहार विधानमंडल का आगामी मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक चलेगा। इस संबंध में औपचारिक अधिसूचना रविवार को जारी कर दी गई। पांच दिनों तक चलने वाला यह सत्र राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले 21 वर्षों में पहली बार ऐसा होगा जब विधानसभा की कार्यवाही में नीतीश कुमार मौजूद नहीं रहेंगे।
20 जुलाई को शुरू होगा विधानसभा का मानसून सत्र
अष्टादश बिहार विधानसभा के तृतीय सत्र के औपबंधिक कार्यक्रम के अनुसार, 20 जुलाई को सत्र के पहले दिन नवनिर्वाचित सदस्यों का शपथ या प्रतिज्ञान ग्रहण कराया जाएगा, यदि आवश्यक हुआ। साथ ही, विधानमंडल के अवकाश काल में राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेशों की प्रमाणीकृत प्रतियां सदन के पटल पर रखी जाएंगी।
बिहार विधानमंडल में नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर
1977 और 1980 – शुरुआती असफलताएं
- छात्र आंदोलन और Jayaprakash Narayan के आंदोलन से निकले नीतीश कुमार ने पहली बार 1977 में हरनौत विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए।
- 1980 में भी हरनौत से चुनाव लड़ा, पर दूसरी बार भी पराजय मिली।
1985 – पहली बार विधायक बने
- 1985 में हरनौत विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक निर्वाचित हुए।
- बिहार विधानसभा में उनकी पहचान एक अध्ययनशील और तथ्यपरक समाजवादी नेता के रूप में बनने लगी।
- विधानसभा की विभिन्न समितियों में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।
1989–2005 – राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता
- 1989 में लोकसभा के लिए चुने गए और इसके बाद कई बार सांसद बने।
- इस दौरान केंद्र सरकार में रेल, कृषि और सड़क परिवहन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली।
- मार्च 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत सिद्ध न कर पाने के कारण केवल सात दिन में इस्तीफा देना पड़ा।
2005 – बिहार की राजनीति में निर्णायक मोड़
- नवंबर 2005 में विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बने।
- यहीं से बिहार की राजनीति में “सुशासन” मॉडल की शुरुआत मानी जाती है।
- सड़क, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण, साइकिल योजना और अन्य जनकल्याणकारी कार्यक्रमों ने उनकी अलग पहचान बनाई।
2010 – ऐतिहासिक जनादेश
- 2010 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को तीन-चौथाई बहुमत मिला।
- यह उनकी राजनीतिक लोकप्रियता का सबसे बड़ा शिखर माना जाता है।
2013–2024 – गठबंधन राजनीति का केंद्र
नीतीश कुमार के विधानमंडलीय सफर की सबसे बड़ी विशेषता गठबंधन बदलने की राजनीति रही।
- 2013 में भाजपा से अलग हुए।
- 2015 में महागठबंधन बनाकर चुनाव जीता।
- 2017 में फिर भाजपा के साथ सरकार बनाई।
- 2022 में दोबारा भाजपा छोड़कर महागठबंधन में लौटे।
- 2024 में पुनः एनडीए के साथ सरकार बनाई।
विधान परिषद की सदस्यता
- 2006 से वे बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे।
- मुख्यमंत्री रहते हुए अधिकांश समय उन्होंने विधान परिषद के सदस्य के रूप में सदन का प्रतिनिधित्व किया।
- 2012, 2018 और 2024 में भी वे पुनः विधान परिषद के लिए निर्वाचित हुए।
राजनीतिक उपलब्धियां
- पहली जीत: 1985 (हरनौत से विधायक)
- मुख्यमंत्री पद: 2000 (7 दिन), फिर 2005 से लगातार विभिन्न कार्यकालों में
- बिहार के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले मुख्यमंत्रियों में शामिल।
- बिहार विधानसभा और विधान परिषद—दोनों सदनों का लंबा अनुभव।
- गठबंधन राजनीति के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में गिने जाते हैं।
संक्षेप में
नीतीश कुमार का विधानमंडलीय सफर 1985 में एक विधायक के रूप में शुरू हुआ, फिर वे राष्ट्रीय राजनीति में गए, और 2005 के बाद बिहार की राजनीति के केंद्रीय चेहरे बन गए। विधानसभा और विधान परिषद दोनों सदनों में उनकी सक्रिय उपस्थिति, अनेक बार मुख्यमंत्री पद की शपथ तथा बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच सत्ता में बने रहने की क्षमता ने उन्हें बिहार की राजनीति का सबसे प्रभावशाली नेताओं में स्थापित किया।







