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प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी नीतियों और नेतृत्व क्षमता से भारत को सकारात्मक रूप से बदला है…

UB India News by UB India News
June 20, 2026
in केंद्रीय राजनीती, खास खबर, ब्लॉग
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नागरिक देवो भव:  , 21वीं सदी में दुनिया तेजी से बदल रही भारत भी उसी गति से आगे बढ़ रहा है…………………

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किसी राजनेता का आकलन उसकी नीतियों एवं नेतृत्व क्षमता से होता है और उसकी सबसे बड़ी परीक्षा संकट के समय में ही होती है। प्रधानमंत्री मोदी इन सभी कसौटियों पर खरे उतरने वाले नेता हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य के लिए प्रगति के नए मापदंड स्थापित करने के बाद पिछले 12 वर्षों से प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने निर्णायक फैसलों से भारत को सकारात्मक रूप से बदल दिया है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनके साथ कार्य करने का अवसर मिला। उन्होंने जनधन बैंक खातों से जहां वंचित वर्ग को बैंकिंग सुविधाओं से जोड़कर वित्तीय समावेशन को व्यापक स्वरूप दिया तो यूपीआइ के माध्यम से आनलाइन भुगतान की ऐसी क्रांति की जिसने न केवल देश, बल्कि दुनिया को अभिभूत किया।

कोविड जैसी जिस महामारी से पूरा विश्व घुटनों पर आ गया, उस दौरान भी उन्होंने अपने नेतृत्व से देश को बखूबी संभाला। इस दौरान राष्ट्रीय लाकडाउन जैसे कड़े फैसले जरूर लिए गए, लेकिन उसने देश को विनाश से बचा लिया। उस दौरान जान हापकिंस और प्रिंस्टन जैसे संस्थानों का अनुमान था कि कोविड के चरम के दौरान भारत में औसतन रोजाना दस हजार मौतें होंगी। तब पीएम मोदी ने मानवीय आपदा को रोकने के लिए राजनीतिक पीड़ा सहने का संकल्प दिखाया और यह उनके अनुकरणीय नेतृत्व की एक उम्दा मिसाल रही।

कोविड के उस विनाशकारी दौर को याद कीजिए जब इटली और स्पेन जैसे विकसित देशों में रोगियों का अस्पतालों के बाहर उपचार हो रहा था। उस दौर में भी अपेक्षाकृत कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के बावजूद भारत उस संकट से निपटने में कहीं अधिक सफल रहा। उसी दौरान स्वदेशी वैक्सीन बनाने का साहस किया, क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों से वैक्सीन खरीदने के लिए उनकी मनमानी शर्तें माननी पड़ रही थीं। अगर भारत ने अपनी वैक्सीन नहीं बनाई होती तो कोई अन्य देश हमें वैक्सीन नहीं देता और लाखों लोग अनिश्चितकाल तक टीके से वंचित रहते। स्वदेशी वैक्सीन केवल कोविड के विरुद्ध वैक्सीन नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी एक प्रभावी टीका सिद्ध हुई, जिससे स्थिति सामान्य होने और विकास गतिविधियों को शीघ्रता से पटरी पर लाने में बड़ी सहायता मिली।

पीएम मोदी के नेतृत्व का एक प्रशंसनीय पहलू उनकी मैक्रोइकोनमिक नीति है। जब उन्नत अर्थव्यवस्थाओं ने मांग-पक्ष प्रोत्साहन पर ही जोर दिया, तो भारत ने आपूर्ति-पक्ष और मांग-पक्ष उपायों का संतुलित संयोजन चुना, जिसमें बुनियादी ढांचे पर मजबूत जोर दिया गया। इस विकल्प की बुद्धिमानी कोविड के बाद के आर्थिक आंकड़ों में स्पष्ट रूप से नजर आती है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं को अपने ऐतिहासिक औसत से दो से चार गुना अधिक मुद्रास्फीति दर का सामना करना पड़ा, जबकि भारत की महंगाई दर अपने ही ऐतिहासिक एवं परंपरागत औसत से नीचे रही।

भारत कोविड के बावजूद लगभग आठ प्रतिशत की दमदार आर्थिक वृद्धि और मजबूत आर्थिक स्थायित्व के साथ उभरा। इस परिदृश्य की 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट से तुलना तस्वीर को और स्पष्ट करती है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के मांग प्रोत्साहन वाले दांव के चलते 18 महीने तक दोहरे अंकों की मासिक मुद्रास्फीति दर दर्ज हुई, वह भी तब जब वैश्विक वित्तीय संकट आपूर्ति-पक्ष का झटका नहीं था, जो कोविड के झटके के विपरीत है। अगर भारत ने कोविड के दौरान उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की नकल की होती, तो हम 20 प्रतिशत से अधिक मुद्रास्फीति दर कई साल के लिए झेल रहे होते। मोदी जी के सही विकल्प पर अमल करने के संकल्प ने भारत को उस दुर्दशा से बचाया।

2019 के बजट के बाद जब आर्थिक सर्वेक्षण में शामिल विचारों पर प्रस्तुति के लिए मुझे 7, लोक कल्याण मार्ग बुलाया गया तो मेरा अनुमान था कि वहां अन्य मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी भी होंगे। वहां पहुंचकर मैं आश्चर्य में पड़ गया कि सिर्फ प्रधानमंत्री अकेले हैं। सरकारी सेवा में रहने के दौरान मैंने बारीकियों को समझने के उनके इस रवैये में कभी बदलाव नहीं देखा। मैंने जीवन में जितने भी बड़े स्तरों पर कार्य किया, उनमें प्रधानमंत्री को सबसे अधिक सहज पाया। वह सामने वाले को इतना सहज कर देते हैं कि उसके लिए अपनी बात रखना बहुत आसान हो जाता है।

पहली बैठक में ही उन्होंने ‘आप इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोलते हैं?’ जैसी टिप्पणी से मेरा हौसला बढ़ाया। वर्ष 2019 के बजट के दिन जब उन्होंने मुझे कैबिनेट से परिचित कराया तो कहा भी कि “नाम पर मत जाइए, फर्राटेदार हिंदी बोलते हैं।” किसी भी बास का आत्मीयता से परिपूर्ण ऐसा आचरण उनके साथ काम करने वाले को बेहतर से बेहतर करने के लिए ही प्रेरित करेगा। यह उनकी सहजता ही थी, जिसने मुझे अपने कार्यकाल के अंत में उन्हें यह कहने का साहस दिया: ‘सर, आप आर्थिक सुधार नहीं करेंगे तो देश के लिए तरक्की की बस छूट जाएगी।’

मैं आइएएस, आइपीएस या आइआरएस अधिकारियों के परिवार या पृष्ठभूमि से नहीं आता। उन्होंने किसी अनुशंसा या पृष्ठभूमि के बजाय केवल मेरी प्रतिभा के आधार पर मुझे नियुक्त किया, जो दर्शाता है कि उनके लिए नैतिकता एवं योग्यता कितनी मायने रखती है। यह इस बात का संकेत था कि वे ऐसे भारत के निर्माण में जुटे हैं, जहां परिवार नहीं, बल्कि प्रतिभा और परिश्रम ही तय करते हैं कि कोई व्यक्ति कहां तक जा सकता है। मैंने पहली बार उन्हें जनवरी 2018 में नीति आयोग की बजट मीटिंग में देखा था। मैं आखिरी पंक्ति बैठा था और मुझे बैंकिंग सुधार पर बोलने के लिए तीन मिनट दिए गए।

बोलने के बाद, मैं खिड़की की ओर देखकर सोच-विचार में पड़ गया। जैसे ही मैं उस ओर पलटा, जहां वह बैठे थे, मैंने पाया कि वह मेरी नजरें मिलने का इंतजार कर रहे थे। जब हमारी नजरें मिलीं, तो उन्होंने अनुमोदन में सिर हिलाया और मुस्कुराए। मैंने तुरंत अपनी पत्नी और भाई को संदेश भेजा: ‘पीएम ने हामी भरी!’ मुझे नहीं पता था कि यह एक विशेषाधिकार की शुरुआत थी, जिसके लिए मैं जीवनपर्यंत उनका आभारी रहूंगा या एक ऐसे नेता के साथ करीब से काम करने का अवसर, जिनकी भारत के इतिहास पर अमिट छाप होगी।

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