महाराष्ट्र की राजनीति में उठापटक ना हो तो काहे का महाराष्ट्र. यहां की राजनीति में सियासी तापमान एक बार फिर अचानक बढ़ गया है. महाविकास अघाड़ी जिसे भाजपा के खिलाफ मजबूत विपक्षी मोर्चा माना जाता था अब अपने ही अंदर खींचतान से जूझता नजर आ रहा है. राजनीति में गठबंधन बनाना जितना आसान दिखता है उसे लंबे समय तक संभालना उतना ही मुश्किल होता है. खासकर तब जब हर दल अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में लगा हो. इस बार विवाद की वजह बना है एक सरप्राइज फैसला. इस फैसले ने कांग्रेस और शिवसेना (UBT) के रिश्तों में खटास ला दी है. यह सिर्फ एक उम्मीदवार के चयन का मामला नहीं है, बल्कि नेतृत्व, विश्वास और तालमेल की परीक्षा भी है. सवाल यह है कि क्या यह टकराव आगे चलकर बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत देगा या फिर यह महज एक अस्थायी विवाद साबित होगा. दरअसल उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (UBT) ने एमएलसी चुनाव के लिए अंबादास दानवे को उम्मीदवार घोषित कर दिया है. यह फैसला उस वक्त आया जब कयास लगाए जा रहे थे कि खुद उद्धव ठाकरे गठबंधन के साझा उम्मीदवार होंगे. आदित्य ठाकरे ने अचानक इस नाम का ऐलान कर सबको चौंका दिया. दूसरी तरफ कांग्रेस पहले ही साफ कर चुकी थी कि वह सिर्फ उद्धव ठाकरे को ही समर्थन देगी. ऐसे में यह सरप्राइज दांव कांग्रेस को नागवार गुजरा और गठबंधन के भीतर नया विवाद खड़ा हो गया.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार एमएलसी चुनाव से ठीक पहले जिस तरह के घटनाक्रम सामने आए हैं, उसने महाविकास अघाड़ी के भीतर मतभेदों को खुलकर उजागर कर दिया है. शिवसेना (UBT) का यह फैसला संकेत देता है कि पार्टी अब अपने राजनीतिक फैसले स्वतंत्र रूप से लेने के मूड में है. अंबादास दानवे को उम्मीदवार बनाना एक ऐसा कदम माना जा रहा है, जो पार्टी के भीतर नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने और संगठन को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है. दूसरी ओर कांग्रेस इस फैसले से असहज नजर आ रही है. पार्टी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि अगर उद्धव ठाकरे उम्मीदवार नहीं होंगे, तो वह अपना अलग उम्मीदवार उतार सकती है. इससे गठबंधन के भीतर टकराव और बढ़ने की आशंका है.

उद्धव ठाकरे का यह कदम राजनीतिक गलियारों में सरप्राइज मूव के तौर पर देखा जा रहा है. (फाइल फोटो)
कांग्रेस की नाराजगी क्यों?
- कांग्रेस की नाराजगी की जड़ सिर्फ एक उम्मीदवार का चयन नहीं है बल्कि गठबंधन की कार्यशैली को लेकर गहरी असहमति है. पार्टी का मानना है कि महाविकास अघाड़ी (MVA) जैसे गठबंधन में हर बड़ा फैसला आपसी सहमति से होना चाहिए, ताकि सभी सहयोगी दलों को बराबरी का सम्मान मिले. लेकिन शिवसेना (UBT) की ओर से अंबादास दानवे के नाम का अचानक ऐलान कांग्रेस को एकतरफा कदम लगा. कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि इस तरह के फैसले गठबंधन की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं और संदेश जाता है कि अंदरूनी संवाद सही तरीके से नहीं हो रहा.
- दूसरी ओर कांग्रेस यह भी मानती है कि अगर उद्धव ठाकरे को उम्मीदवार बनाया जाता तो वह एक सर्वमान्य चेहरा साबित हो सकते थे. उनकी पहचान सिर्फ एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि गठबंधन के साझा नेतृत्व का प्रतीक भी है. ऐसे में दानवे के नाम पर सहमति न बनाकर सीधे घोषणा कर देना कांग्रेस के लिए ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ का संकेत बन गया है. पार्टी के कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि इस फैसले से यह सवाल उठता है कि क्या गठबंधन में छोटे-बड़े दलों की राय को बराबर महत्व दिया जा रहा है या नहीं.
एनसीपी (SP) की भूमिका बनेगी निर्णायक
- इस पूरे सियासी घटनाक्रम में अब सबसे अहम नजर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) यानी NCP (SP) पर टिक गई है. मौजूदा हालात में यह दल ‘किंगमेकर’ की स्थिति में नजर आ रहा है. अगर एनसीपी (SP) खुलकर शिवसेना (UBT) के साथ खड़ी होती है तो कांग्रेस की स्थिति कमजोर पड़ सकती है और वह गठबंधन के भीतर अलग-थलग दिख सकती है. वहीं अगर एनसीपी कांग्रेस के पक्ष में जाती है तो यह शिवसेना (UBT) के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है.
- राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शरद पवार का रुख इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा. पवार हमेशा संतुलन की राजनीति के लिए जाने जाते हैं, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि वह किस तरह इस टकराव को संभालते हैं. अगर उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका निभाई, तो MVA को टूटने से बचाया जा सकता है. लेकिन अगर उन्होंने किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन किया तो गठबंधन के भीतर दरार और गहरी हो सकती है.
उद्धव का सरप्राइज दांव या जोखिम?
- उद्धव ठाकरे का यह कदम राजनीतिक गलियारों में सरप्राइज मूव के तौर पर देखा जा रहा है. कई जानकार इसे एक सोची-समझी रणनीति मानते हैं, जिसके जरिए वह यह दिखाना चाहते हैं कि उनकी पार्टी गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने में सक्षम है. अंबादास दानवे जैसे अनुभवी नेता को आगे करके वह संगठन के भीतर नए नेतृत्व को भी प्रमोट करने का संदेश दे रहे हैं.
- हालांकि इस दांव में जोखिम भी कम नहीं है. गठबंधन की राजनीति में तालमेल सबसे बड़ा हथियार होता है और अगर सहयोगी दल खुद को नजरअंदाज महसूस करें तो इसका सीधा असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है. खासकर ऐसे समय में जब विपक्षी एकता को मजबूत करने की जरूरत है, इस तरह के फैसले विरोधियों को हमला करने का मौका भी दे सकते हैं.







