केरलम के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ आज से इस पर सुनवाई कर रही है। वकील इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या यह मामला सबरीमाला केस की समीक्षा पर सुनवाई का है, या फिर यह केवल रेफर किए गए 7 सवालों के जवाब देने तक ही सीमित रहेगा।
केंद्र ने सुनवाई से पहले अपने लिखित जवाब में कहा…
सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक इसलिए है, क्योंकि भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, यानी उन्होंने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। इसका महिलाओं की शुद्धता या उनकी स्थिति से कोई संबंध नहीं है। यदि महिलाओं को प्रवेश दिया जाता है, तो वहां की पारंपरिक पूजा-पद्धति बदल जाएगी। इससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक विविधता पर असर पड़ सकता है।
दरअसल, धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव के मुद्दे पर जारी इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला के अलावा मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला का खतना और दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने का अधिकार मिले या नहीं, कोर्ट इस पर भी फैसला करेगा।
सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े ये सवाल पिछले 26 साल से देश की अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट में आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।
9 जजों की बेंच के सामने सुनवाई के 5 मुद्दे
1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। अब बड़ी बेंच तय करेगी कि हाईकोर्ट का फैसला सही था या नहीं। मंदिर के पुजारी समेत कुछ संस्थाओं ने 10 से 50 साल की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत देने के फैसले का रिव्यू करने के लिए मंदिर के पुजारी समेत कुछ संस्थाओं ने याचिका लगाई है।
2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना के मुद्दे पर 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?
3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है?
4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी की। उन्हें पारसी धर्मस्थलों में प्रवेश से रोका जाने लगा। उन्होंने इसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार को लेकर याचिका लगाई। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है?
5. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?
लाइव अपडेट्स
- कोर्ट को सीमित दखल देना चाहिएहर धार्मिक प्रथा में कोर्ट का हस्तक्षेप सही नहीं।
- आवश्यक धार्मिक प्रथा (ERP) का सम्मानअगर कोई प्रथा धर्म का मूल हिस्सा है, तो उसे बचाया जाना चाहिए।
- सभी धर्मों पर समान सिद्धांत लागू होंसिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि सभी धर्मों के मामलों पर समान दृष्टिकोण जरूरी है।
- संतुलन जरूरीमौलिक अधिकार (Equality) और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाया जाए।
जस्टिस नागरत्ना: सबरीमाला के ममाले में ‘अनुच्छेद 17’ को किस तरह से दलील के तौर पर पेश किया जा सकता है, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने तीन दिन तक तो उसे ‘अछूत’ माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई ‘अछूतपन’ न रह जाए।
SG मेहता: मैं यहां ‘मासिक धर्म’ या मेन्स्ट्रुएशन के मुद्दे पर बात नहीं कर रहा हूं।
जस्टिस नागरत्ना : एक महिला होने के नाते मैं फिर यही कहूंगी कि ‘अनुच्छेद 17’ सिर्फ तीन दिनों के लिए लागू नहीं हो सकता और चौथे दिन अचानक उसका प्रभाव खत्म नहीं हो सकता।
SG मेहता: मैं सबरीमाला का बचाव अपने ही एक अलग अंदाज में करूंगा, यहां बात सिर्फ ‘चार दिनों’ की नहीं है, बल्कि यह एक विशिष्ट ‘आयु-वर्ग’ से जुड़ा मामला है। भगवान अय्यप्पा के मंदिर पूरी दुनिया में महिलाओं के सभी वर्गों के लिए खुले हुए हैं, सिवाय एक विशेष मंदिर के, जिसका मामला अपने आप में बिल्कुल अनोखा है। दिल्ली में भगवान अय्यप्पा के तीन मंदिर हैं, जो सभी के लिए खुले हैं।
SG मेहता: हमें हर संप्रदाय की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए, हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से जुड़ी नहीं होती। अगर मैं किसी मजार या गुरुद्वारे जाता हूं और मुझे अपना सिर ढकना पड़ता है, तो मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी गरिमा, अधिकार या पसंद मुझसे छीन ली गई है।
SG मेहता: जब हम गुरुद्वारे या अजमेर शरीफ जाते हैं, तो हम अपना सिर ढकते हैं। अब एक नया न्यायशास्त्र विकसित हुआ है। हिंदुओं के सभी वर्गों का मतलब है कि कोई जाति-आधारित भेदभाव नहीं होगा।
जस्टिस बागची: सवाल है यही तो है कि क्या धार्मिक संप्रदाय का प्रबंधन अनुच्छेद 25 (हर किसी के अंतरात्मा के अधिकार) पर भारी पड़ता है?
SG मेहता: मेरा तर्क यह नहीं है। अनुच्छेद 26(b) अपने आप में कंप्लीट नहीं है, इसे अनुच्छेद 25 के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। अनुच्छेद 25 और 26, अनुच्छेद 14 और 15 से कंट्रोल होंग। मैं इसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं कर रहा हूं।
एक मत यह है कि अनुच्छेद 26 पर कोई रोक नहीं है, लेकिन मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कोई एक अनुच्छेद अपने आप में एक अलग इकाई हो सकता है। कुछ तर्क ऐसे भी हैं जिनके अनुसार अनुच्छेद 26(b) को अनुच्छेद 25(2)(b) के साथ मिलाकर नहीं पढ़ा जा सकता, और इसके तहत कोई सामाजिक सुधार नहीं किया जा सकता।
SG मेहता: सबरीमाला एक देवता के गुण से जुड़ा विषय है, इसकी न्यायिक जांच कैसे की जा सकती है?
SG मेहता की बेंच को दलील
SG मेहता ने कहा- संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान ‘अनुच्छेद 25(2)(b)’ में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।
सबरीमाला मामले में एक राय यह थी कि ‘अनुच्छेद 17’ महिलाओं पर भी लागू होता है कि आप उनके साथ ‘अछूतों’ जैसा बर्ताव कर रहे हैं, मुझे इस पर कड़ी आपत्ति है।
भारत उतना ‘पितृसत्तात्मक’ या ‘लैंगिक रूढ़ियों’ से ग्रस्त समाज नहीं है, जितना कि पश्चिमी दुनिया इसे समझती है।
SG मेहता: महोदय, सबसे पहले यह तय करना होगा कि ‘धार्मिक प्रथा’ किसे कहते हैं। उसके बाद यह तय करना होगा कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ किसे कहते हैं।
जस्टिस बागची: आस्था पर राय और मानी गई आस्था में अंतर होता है। किसी की कोई विशेष आस्था हो सकती है, लेकिन उस संप्रदाय में राय का अस्तित्व है या नहीं, यह स्वयं आस्था की जांच से अलग है।
जस्टिस बागची: आस्था कहती है कि यह मेरी आस्था है और अनुयायी इसका पालन करते हैं। धार्मिक नेता ने जो कहा वही विश्वास न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसके तहत उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, लेकिन क्या वह विश्वास वास्तव में मौजूद है, यह निर्णय धार्मिक नेता को करना है।
यह एक अनूठा मामला है, जिसे मौलिक कर्तव्यों के संदर्भ में समझा जा सकता है। ऐसा कोई विश्वास हो सकता है जिसे वैज्ञानिक सोच शायद न सुलझा पाए, लेकिन यह शायद सवाल न हो; बल्कि सवाल यह हो सकता है कि क्या किसी धार्मिक संप्रदाय के सदस्यों के बीच ऐसा विश्वास वास्तव में मौजूद था।
SG मेहता: लेकिन यह नहीं कि क्या यह एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। महोदय, अगर आपको लगता है कि कोई चीज अवैज्ञानिक है, तो उसका समाधान विधायिका के पास है। लेकिन अगर इस मामले की गहराई में जाना है, तो उसका समाधान एक ‘दीवानी मुकदमा’ है, जहां दोनों पक्ष सबूत और विशेषज्ञ गवाह पेश कर सकते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि हलफनामे में ऐसी कोई भी बात न हो जिससे यह साबित हो सके कि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।
जस्टिस बागची: आपकी दलील इस बात पर आधारित नहीं है कि यह मामला अदालत के अधिकार में आता है या नहीं।
SG मेहता: यह मामला अदालत के विचारणीय क्षेत्र में भी आता है, और ज़्यादातर मामलों में, यह भी तय करता है कि किस मंच पर इसकी सुनवाई होनी चाहिए। कुछ धर्मों में कुछ लोग यह दावा करते हैं कि ‘नरबलि’ देने का अधिकार एक पुरानी प्रथा रही है और यह एक अनिवार्य हिस्सा है लेकिन इसके समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया जाता। अगर ऐसे कुछ उदाहरण सामने आते हैं जो सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य या नैतिकता को नुकसान पहुंचाते हैं, तो इस बात की जांच की जरूरत नहीं है कि वह कोई ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ है या नहीं।
केरलम के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ आज से इस पर सुनवाई कर रही है। वकील इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या यह मामला सबरीमाला केस की समीक्षा पर सुनवाई का है, या फिर यह केवल रेफर किए गए 7 सवालों के जवाब देने तक ही सीमित रहेगा।
केंद्र ने सुनवाई से पहले अपने लिखित जवाब में कहा…
सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक इसलिए है, क्योंकि भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, यानी उन्होंने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। इसका महिलाओं की शुद्धता या उनकी स्थिति से कोई संबंध नहीं है। यदि महिलाओं को प्रवेश दिया जाता है, तो वहां की पारंपरिक पूजा-पद्धति बदल जाएगी। इससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक विविधता पर असर पड़ सकता है।
दरअसल, धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव के मुद्दे पर जारी इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला के अलावा मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला का खतना और दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने का अधिकार मिले या नहीं, कोर्ट इस पर भी फैसला करेगा।
सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े ये सवाल पिछले 26 साल से देश की अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट में आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।
9 जजों की बेंच के सामने सुनवाई के 5 मुद्दे
1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। अब बड़ी बेंच तय करेगी कि हाईकोर्ट का फैसला सही था या नहीं। मंदिर के पुजारी समेत कुछ संस्थाओं ने 10 से 50 साल की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत देने के फैसले का रिव्यू करने के लिए मंदिर के पुजारी समेत कुछ संस्थाओं ने याचिका लगाई है।
2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना के मुद्दे पर 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?
3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है?
4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी की। उन्हें पारसी धर्मस्थलों में प्रवेश से रोका जाने लगा। उन्होंने इसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार को लेकर याचिका लगाई। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है?
5. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?
लाइव अपडेट्स
- कोर्ट को सीमित दखल देना चाहिएहर धार्मिक प्रथा में कोर्ट का हस्तक्षेप सही नहीं।
- आवश्यक धार्मिक प्रथा (ERP) का सम्मानअगर कोई प्रथा धर्म का मूल हिस्सा है, तो उसे बचाया जाना चाहिए।
- सभी धर्मों पर समान सिद्धांत लागू होंसिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि सभी धर्मों के मामलों पर समान दृष्टिकोण जरूरी है।
- संतुलन जरूरीमौलिक अधिकार (Equality) और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाया जाए।
जस्टिस नागरत्ना: सबरीमाला के ममाले में ‘अनुच्छेद 17’ को किस तरह से दलील के तौर पर पेश किया जा सकता है, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने तीन दिन तक तो उसे ‘अछूत’ माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई ‘अछूतपन’ न रह जाए।
SG मेहता: मैं यहां ‘मासिक धर्म’ या मेन्स्ट्रुएशन के मुद्दे पर बात नहीं कर रहा हूं।
जस्टिस नागरत्ना : एक महिला होने के नाते मैं फिर यही कहूंगी कि ‘अनुच्छेद 17’ सिर्फ तीन दिनों के लिए लागू नहीं हो सकता और चौथे दिन अचानक उसका प्रभाव खत्म नहीं हो सकता।
SG मेहता: मैं सबरीमाला का बचाव अपने ही एक अलग अंदाज में करूंगा, यहां बात सिर्फ ‘चार दिनों’ की नहीं है, बल्कि यह एक विशिष्ट ‘आयु-वर्ग’ से जुड़ा मामला है। भगवान अय्यप्पा के मंदिर पूरी दुनिया में महिलाओं के सभी वर्गों के लिए खुले हुए हैं, सिवाय एक विशेष मंदिर के, जिसका मामला अपने आप में बिल्कुल अनोखा है। दिल्ली में भगवान अय्यप्पा के तीन मंदिर हैं, जो सभी के लिए खुले हैं।
SG मेहता: हमें हर संप्रदाय की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए, हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से जुड़ी नहीं होती। अगर मैं किसी मजार या गुरुद्वारे जाता हूं और मुझे अपना सिर ढकना पड़ता है, तो मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी गरिमा, अधिकार या पसंद मुझसे छीन ली गई है।
SG मेहता: जब हम गुरुद्वारे या अजमेर शरीफ जाते हैं, तो हम अपना सिर ढकते हैं। अब एक नया न्यायशास्त्र विकसित हुआ है। हिंदुओं के सभी वर्गों का मतलब है कि कोई जाति-आधारित भेदभाव नहीं होगा।
जस्टिस बागची: सवाल है यही तो है कि क्या धार्मिक संप्रदाय का प्रबंधन अनुच्छेद 25 (हर किसी के अंतरात्मा के अधिकार) पर भारी पड़ता है?
SG मेहता: मेरा तर्क यह नहीं है। अनुच्छेद 26(b) अपने आप में कंप्लीट नहीं है, इसे अनुच्छेद 25 के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। अनुच्छेद 25 और 26, अनुच्छेद 14 और 15 से कंट्रोल होंग। मैं इसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं कर रहा हूं।
एक मत यह है कि अनुच्छेद 26 पर कोई रोक नहीं है, लेकिन मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कोई एक अनुच्छेद अपने आप में एक अलग इकाई हो सकता है। कुछ तर्क ऐसे भी हैं जिनके अनुसार अनुच्छेद 26(b) को अनुच्छेद 25(2)(b) के साथ मिलाकर नहीं पढ़ा जा सकता, और इसके तहत कोई सामाजिक सुधार नहीं किया जा सकता।
SG मेहता: सबरीमाला एक देवता के गुण से जुड़ा विषय है, इसकी न्यायिक जांच कैसे की जा सकती है?
SG मेहता की बेंच को दलील
SG मेहता ने कहा- संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान ‘अनुच्छेद 25(2)(b)’ में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।
सबरीमाला मामले में एक राय यह थी कि ‘अनुच्छेद 17’ महिलाओं पर भी लागू होता है कि आप उनके साथ ‘अछूतों’ जैसा बर्ताव कर रहे हैं, मुझे इस पर कड़ी आपत्ति है।
भारत उतना ‘पितृसत्तात्मक’ या ‘लैंगिक रूढ़ियों’ से ग्रस्त समाज नहीं है, जितना कि पश्चिमी दुनिया इसे समझती है।
SG मेहता: महोदय, सबसे पहले यह तय करना होगा कि ‘धार्मिक प्रथा’ किसे कहते हैं। उसके बाद यह तय करना होगा कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ किसे कहते हैं।
जस्टिस बागची: आस्था पर राय और मानी गई आस्था में अंतर होता है। किसी की कोई विशेष आस्था हो सकती है, लेकिन उस संप्रदाय में राय का अस्तित्व है या नहीं, यह स्वयं आस्था की जांच से अलग है।
जस्टिस बागची: आस्था कहती है कि यह मेरी आस्था है और अनुयायी इसका पालन करते हैं। धार्मिक नेता ने जो कहा वही विश्वास न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसके तहत उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, लेकिन क्या वह विश्वास वास्तव में मौजूद है, यह निर्णय धार्मिक नेता को करना है।
यह एक अनूठा मामला है, जिसे मौलिक कर्तव्यों के संदर्भ में समझा जा सकता है। ऐसा कोई विश्वास हो सकता है जिसे वैज्ञानिक सोच शायद न सुलझा पाए, लेकिन यह शायद सवाल न हो; बल्कि सवाल यह हो सकता है कि क्या किसी धार्मिक संप्रदाय के सदस्यों के बीच ऐसा विश्वास वास्तव में मौजूद था।
SG मेहता: लेकिन यह नहीं कि क्या यह एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। महोदय, अगर आपको लगता है कि कोई चीज अवैज्ञानिक है, तो उसका समाधान विधायिका के पास है। लेकिन अगर इस मामले की गहराई में जाना है, तो उसका समाधान एक ‘दीवानी मुकदमा’ है, जहां दोनों पक्ष सबूत और विशेषज्ञ गवाह पेश कर सकते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि हलफनामे में ऐसी कोई भी बात न हो जिससे यह साबित हो सके कि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।
जस्टिस बागची: आपकी दलील इस बात पर आधारित नहीं है कि यह मामला अदालत के अधिकार में आता है या नहीं।
SG मेहता: यह मामला अदालत के विचारणीय क्षेत्र में भी आता है, और ज़्यादातर मामलों में, यह भी तय करता है कि किस मंच पर इसकी सुनवाई होनी चाहिए। कुछ धर्मों में कुछ लोग यह दावा करते हैं कि ‘नरबलि’ देने का अधिकार एक पुरानी प्रथा रही है और यह एक अनिवार्य हिस्सा है लेकिन इसके समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया जाता। अगर ऐसे कुछ उदाहरण सामने आते हैं जो सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य या नैतिकता को नुकसान पहुंचाते हैं, तो इस बात की जांच की जरूरत नहीं है कि वह कोई ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ है या नहीं।







