अन्न की दृष्टि से देश के जितनी भी कमी वाले इलाके हैं, उनमें बिहार सबसे अहम प्रतीत होता है। बिहार को गम्भीर अन्न-संकट का सामना करना पड़ रहा है। उत्तरी बिहार में किसानों, विशेषकर खेतिहर मजदूरों की दयनीय अवस्था हो गई है।
उत्तरी बिहार के कुछ अभाव ग्रस्त इलाकों का दौरा करके एक ब्रिटिश समाचार-पत्र का संवाददाता लौटा है। उसका कहना है कि पर्याप्त पोषण के अभाव में लोग बीमार पड़ कर मरने लगे है। देहातों में तो लोग दो-दो तीन-तीन दिन के भीतर एक-दो मुट्ठी भर अन्न अथवा दाल खाकर जिन्दगी बसर कर रहे हैं। बिहार के चार अलग-अलग प्रदेशों से भूख के कारण करीब-करीब 43 मौतें होने के समाचार प्राप्त हुए हैं। बिहार के इस गम्भीर खाद्य संकट पर देश में सर्वत्र आमतौर पर चिन्ता अनुभव जायेगी। भारत के प्रधानमंत्री ने तो देश की जनता को यह खुला आश्वासन दिया है कि उनकी सरकार किसी को भी अन्न के अभाव में भूखों नहीं मरने देगी। यदि त्याग की आवश्यकता होगी, तो सभी समान रूप से त्याग करेंगे और देश में जितना भी अनाज होगा, उसे समान रूप से बांट कर खायेंगे। बिहार के अन्न संकट के दो कारण तो सर्वविदित हैं। एक तो यह कि पिछले वर्ष बिहार में बाढ़ का प्रकोप रहा। दूसरे, समय पर वर्षा नहीं हुई और सूखा पड़ गया, जिससे शीतकालीन फसलें कुण्ठित हो गयीं।
किन्तु ब्रिटिश पत्र के संवाददाता ने लिखा है कि बिहार में जो अन्न सुलभ है, उसका भी यथोचित वितरण नहीं हो पा रहा है। यदि वह त्रुटि है, तो बिहार सरकार इसको तो अवश्य ही दुरुस्त कर सकती है और प्राप्त अन्न के वितरण की समुचित व्यवस्था कर सकती है। आशा है वितरण की व्यवस्था के अभाव में किसी के भूखों मरने की नौबत नहीं आने दी जायेगी। भारत के खाद्य मंत्री श्री मुन्शी ने भारतीय संसद में इस बात से इन्कार किया है कि बिहार में भूख के कारण कोई मौत हुई है। उन्होंने कहा कि जिन तीन आदमियों के भूख के कारण मरने की बात कही जाती है, उनमें से एक तो तीन महीने पहले बुखार से मरा और दूसरे की तपेदिक से मृत्यु हुई, ऐसा प्रतीत होता है कि भूख के कारण जितनी मौतें होने के समाचार प्राप्त हुए हैं, उन सब की जांच अभी नहीं हो पायी है और श्री मुन्शी का खण्डन सिर्फ एक रिपोर्ट से ही संबंधित है।







