राजनीतिक सक्रियता सीखनी हो तो बेहतर अध्ययन केंद्र हो सकता है. बिहार के अलावा देश का शायद ही कोई सूबा होगा, जहां राजनीतिक सक्रियता इतनी दिखती हो. 365 दिन बिहार में राजनीतिक सरगर्मी रहती है. यह स्थिति आजादी के आंदोलन से लेकर अब तक बनी हुई है. बिहार से शुरू हुए 1974 के देशव्यापी जेपी मूवमेंट को भी आजादी की दूसरी लड़ाई माना गया. 1990 में लालू यादव ने सत्ता संभालते ही मुस्लिम-यादव की करीब 30-31 प्रतिशत आबादी को एम-वाय समीकरण बना कर उनमें राजनीति सक्रियता का संचार किया, तो अगड़ी-पिछड़ी जातियों को अगड़े-पिछड़े जमात में में बांट कर लालू ने जो कमाल किया, उसका उन्हें जबरदस्त राजनीतिक लाभ मिला. 15 साल तक लालू और उनकी पत्नी ने बिहार पर राज किया. लालू-राबड़ी ने शासकीय विफलताओं की वजह से जब से नीतीश कुमार के हाथ सत्ता गंवाई, बिहार में राजनीतिक चर्चा का विषय बदल गया. ‘अपहरण उद्योग’ की जगह सुशासन और भ्रष्टाचार के स्थान पर विकास की बात होने लगी. यह स्थिति 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों तक बनी रही, लेकिन नीतीश ने जब से भाजपा से अलग होकर इधर-उधर की आवाजाही शुरू की, तब से कई तरह की चर्चाएं चलती रहती हैं. इन सबके के केंद्र में नीतीश ही होते हैं. नीतीश को लेकर फिर चर्चा शुरू हो गई है.
नीतीश फिर बने चर्चा का केंद्र
नीतीश कुमार को लेकर इस बार अजीब बहस छिड़ी हुई है. विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि वे अब पहले जैसे नहीं रहे. न उम्र बची और न उनका दिमाग ही पहले जैसा काम कर रहा है. उनकी यह स्थिति भांप कर भाजपा ने उन्हें हाईजैक कर लिया है. विपक्ष के पास इसके तर्क भी हैं. पहला तर्क कि नीतीश भाजपा के साथ क्यों हैं? सीएम के रूप में अब तक गृह विभाग अपने से अलग नहीं करने वाले नीतीश ने इसे भाजपा की बात मान कर सम्राट चौधरी को क्यों दिया? नीतीश का दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहने का विपक्षी तर्क है कि उन्होंने राबड़ी देवी को लड़की कहा. जनसंख्या नियंत्रण पर भरे सदन में उन्होंने महिला-पुरुष के संबंधों पर जो टिप्पणी की, वैसा संतुलित दिमाग का आदमी कर ही नहीं सकता. नीतीश अगर राज्यसभा जा रहे हैं तो यह भाजपा की साज़िश है. विपक्ष इतने आरोपों के बाद भी नीतीश कुमार से ‘खेल’ का ख्याली पुलाव पकाने में पीछे नहीं है. 2015 और 2022 में लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव ने नीतीश के जिस खेल का लाभ लिया है, उसका लोभ अब भी बरकरार है.
नीतीश कुमार को लेकर इस बार अजीब बहस छिड़ी हुई है. विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि वे अब पहले जैसे नहीं रहे. न उम्र बची और न उनका दिमाग ही पहले जैसा काम कर रहा है. उनकी यह स्थिति भांप कर भाजपा ने उन्हें हाईजैक कर लिया है. विपक्ष के पास इसके तर्क भी हैं. पहला तर्क कि नीतीश भाजपा के साथ क्यों हैं? सीएम के रूप में अब तक गृह विभाग अपने से अलग नहीं करने वाले नीतीश ने इसे भाजपा की बात मान कर सम्राट चौधरी को क्यों दिया? नीतीश का दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहने का विपक्षी तर्क है कि उन्होंने राबड़ी देवी को लड़की कहा. जनसंख्या नियंत्रण पर भरे सदन में उन्होंने महिला-पुरुष के संबंधों पर जो टिप्पणी की, वैसा संतुलित दिमाग का आदमी कर ही नहीं सकता. नीतीश अगर राज्यसभा जा रहे हैं तो यह भाजपा की साज़िश है. विपक्ष इतने आरोपों के बाद भी नीतीश कुमार से ‘खेल’ का ख्याली पुलाव पकाने में पीछे नहीं है. 2015 और 2022 में लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव ने नीतीश के जिस खेल का लाभ लिया है, उसका लोभ अब भी बरकरार है.
चर्चा की वजह राज्यसभा चुनाव
अपने लंबे संसदीय जीवन में नीतीश कुमार लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं. उन्होंने चौथे विधायी सदन राज्यसभा जाने की स्वयं इच्छा जताई. नामांकन दाखिल किया और जीत भी दर्ज कर ली. वे विधान परिषद के सदस्य के नाते सीएम हैं. राज्यसभा जाने पर उन्हें विधान परिषद की सदस्यता छोड़नी पड़ेगी. उनके पास एक और विकल्प है. उन्हें निर्वाचन के 14 दिनों के अंदर विधान परिषद से इस्तीफा देना पड़ेगा. वे 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. उन्हें 30 मार्च तक किसी एक सदन से इस्तीफा देना पड़ेगा. अगर वे विधान परिषद से इस्तीफा 30 तक नहीं देते हैं तो उनकी राज्यसभा की सदस्यता स्वत: समाप्त हो जाएगी. इसी बात को लेकर बिहार ही नहीं, बल्कि देश भर में नीतीश कुमार की चर्चा हो रही है.
अपने लंबे संसदीय जीवन में नीतीश कुमार लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं. उन्होंने चौथे विधायी सदन राज्यसभा जाने की स्वयं इच्छा जताई. नामांकन दाखिल किया और जीत भी दर्ज कर ली. वे विधान परिषद के सदस्य के नाते सीएम हैं. राज्यसभा जाने पर उन्हें विधान परिषद की सदस्यता छोड़नी पड़ेगी. उनके पास एक और विकल्प है. उन्हें निर्वाचन के 14 दिनों के अंदर विधान परिषद से इस्तीफा देना पड़ेगा. वे 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. उन्हें 30 मार्च तक किसी एक सदन से इस्तीफा देना पड़ेगा. अगर वे विधान परिषद से इस्तीफा 30 तक नहीं देते हैं तो उनकी राज्यसभा की सदस्यता स्वत: समाप्त हो जाएगी. इसी बात को लेकर बिहार ही नहीं, बल्कि देश भर में नीतीश कुमार की चर्चा हो रही है.
नीतीश पर संदेह की वह क्या?
नीतीश कुमार का अतीत (पहली बार भाजपा से अलग होने के बाद) ऐसा रहा कि कोई उनकी बात पर अब भरोसा करने से पहले सौ बार सोचता है. अव्वल तो वे क्या सोचते हैं, यह किसी को तब तक पता नहीं चलता, जब तक परिणाम न दिख जाए. राजद के साथ सटे तो भाजपा को कोसा और राजद से अलग हुए तो उसकी भी जुबानी मार-कुटाई की. मुफ्त बिजली के घोर विरोधी के रूप में सदन में बयान देने वाले नीतीश ने 2025 में 125 यूनिट बिजली फ़्री कर दी. मरते दम साथ न जाने की कसम खाकर भी आखिरकार भाजपा से ही सटे. भाजपा ने भी हमेशा नीतीश का सम्मान ही किया है. 2020 में 80 विधायकों के बावजूद भाजपा ने 43 वाले नीतीश कुमार को सहर्ष सीएम बनाया. 2025 में भी भाजपा ने उनके सम्मान का ख्याल रखा. 89 सीटें मिलने के बावजूद 85 विधायकों वाले नीतीश को सीएम पद पर फिर बिठाया. 2014 में 2 संसदीय सीटों पर सिमटे जेडीयू को भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 17 सीटों की बराबरी का सम्मान दिया. नीतीश 2024 से ही कह रहे हैं कि अब वे भाजपा को छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे. फिर भी उन पर शक उनके अतीत के ‘खेल’ की वजह से हो रहा है.
नीतीश कुमार का अतीत (पहली बार भाजपा से अलग होने के बाद) ऐसा रहा कि कोई उनकी बात पर अब भरोसा करने से पहले सौ बार सोचता है. अव्वल तो वे क्या सोचते हैं, यह किसी को तब तक पता नहीं चलता, जब तक परिणाम न दिख जाए. राजद के साथ सटे तो भाजपा को कोसा और राजद से अलग हुए तो उसकी भी जुबानी मार-कुटाई की. मुफ्त बिजली के घोर विरोधी के रूप में सदन में बयान देने वाले नीतीश ने 2025 में 125 यूनिट बिजली फ़्री कर दी. मरते दम साथ न जाने की कसम खाकर भी आखिरकार भाजपा से ही सटे. भाजपा ने भी हमेशा नीतीश का सम्मान ही किया है. 2020 में 80 विधायकों के बावजूद भाजपा ने 43 वाले नीतीश कुमार को सहर्ष सीएम बनाया. 2025 में भी भाजपा ने उनके सम्मान का ख्याल रखा. 89 सीटें मिलने के बावजूद 85 विधायकों वाले नीतीश को सीएम पद पर फिर बिठाया. 2014 में 2 संसदीय सीटों पर सिमटे जेडीयू को भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 17 सीटों की बराबरी का सम्मान दिया. नीतीश 2024 से ही कह रहे हैं कि अब वे भाजपा को छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे. फिर भी उन पर शक उनके अतीत के ‘खेल’ की वजह से हो रहा है.
CM की कुर्सी और बिहार का मोह
नीतीश कुमार 2005 से लगातार बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं. यह देश का सबसे लंबा सीएम कार्यकाल है. केंद्र की राजनीति में रेलमंत्री रह चुके नीतीश ने 2005 में सीएम बनने से पहले कहा था– मैं बिहार का विकास करना चाहता हूं, दिल्ली नहीं. उन्होंने सड़कें, पुल, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, महिला सशक्तिकरण और कानून-व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में जो काम किया, वह आज भी बिहार के लोग याद करते हैं. ‘सुशासन’ का नारा उन्होंने ही दिया. 20 साल में बिहार की सड़कें कच्ची से पक्की हुईं, बिजली की उपलब्धता बढ़ी, अपराध दर घटी. लेकिन, सबसे बड़ी बात रही बिहार के प्रति उनका मोह. उन्होंने कई बार कहा- ‘मेरा शरीर दिल्ली में हो सकता है, लेकिन दिल हमेशा बिहार में रहता है.’ इसी मोह की वजह से वे बार-बार गठबंधन बदलते रहे, लेकिन सीएम की कुर्सी कभी नहीं छोड़ी. अब जब वे राज्यसभा जा रहे हैं, तो सवाल उठ रहा है कि क्या यह बिहार के मोह का अंत है या सिर्फ़ नई राह? यह भी कि क्या नीतीश आसानी से सीएम की कुर्सी छोड़ देंगे?
नीतीश कुमार 2005 से लगातार बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं. यह देश का सबसे लंबा सीएम कार्यकाल है. केंद्र की राजनीति में रेलमंत्री रह चुके नीतीश ने 2005 में सीएम बनने से पहले कहा था– मैं बिहार का विकास करना चाहता हूं, दिल्ली नहीं. उन्होंने सड़कें, पुल, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, महिला सशक्तिकरण और कानून-व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में जो काम किया, वह आज भी बिहार के लोग याद करते हैं. ‘सुशासन’ का नारा उन्होंने ही दिया. 20 साल में बिहार की सड़कें कच्ची से पक्की हुईं, बिजली की उपलब्धता बढ़ी, अपराध दर घटी. लेकिन, सबसे बड़ी बात रही बिहार के प्रति उनका मोह. उन्होंने कई बार कहा- ‘मेरा शरीर दिल्ली में हो सकता है, लेकिन दिल हमेशा बिहार में रहता है.’ इसी मोह की वजह से वे बार-बार गठबंधन बदलते रहे, लेकिन सीएम की कुर्सी कभी नहीं छोड़ी. अब जब वे राज्यसभा जा रहे हैं, तो सवाल उठ रहा है कि क्या यह बिहार के मोह का अंत है या सिर्फ़ नई राह? यह भी कि क्या नीतीश आसानी से सीएम की कुर्सी छोड़ देंगे?
नीतीश को देना ही होगा इस्तीफा
राज्यसभा चुनाव जीतने के बाद नीतीश कुमार के सामने सीमित विकल्प हैं. वे अभी विधान परिषद के सदस्य हैं. राज्यसभा (RS) चुनाव में जीतने के बाद (16 मार्च 2026 को निर्वाचित हुए), उन्हें विधान परिषद से इस्तीफा देना होगा. नियम के मुताबिक उन्हें 30 मार्च 2026 तक उन्हें किसी एक सदन का चयन करना होगा. विधान परिषद से इस्तीफा देते ही वे राज्य विधानमंडल के सदस्य नहीं रहेंगे. विधान परिषदसे इस्तीफा नहीं देने पर राज्यसभा की उनकी सदस्यता स्वतः माप्त हो जाएगी. वास्तविकता यह है कि नीतीश कुमार ने खुद घोषणा की है कि वे सीएम पद छोड़ कर राज्यसभा जाएंगे. वे चाहें तो राज्यसभा का सदस्य रहते हुए बिहार का सीएम 6 महीने तक बने रह सकते हैं. पर, यह उनकी नैतिकता के खिलाफ होगा. अब नीतीश को तय करना है कि वे एमएलसी बन कर बिहार का सीएम बने रहना चाहेंगे या बिहार का मोह त्याग कर राज्यसभा जाएंगे. उनके मन की बात का थाह उनके करीबी भी नहीं लगा पाते.
राज्यसभा चुनाव जीतने के बाद नीतीश कुमार के सामने सीमित विकल्प हैं. वे अभी विधान परिषद के सदस्य हैं. राज्यसभा (RS) चुनाव में जीतने के बाद (16 मार्च 2026 को निर्वाचित हुए), उन्हें विधान परिषद से इस्तीफा देना होगा. नियम के मुताबिक उन्हें 30 मार्च 2026 तक उन्हें किसी एक सदन का चयन करना होगा. विधान परिषद से इस्तीफा देते ही वे राज्य विधानमंडल के सदस्य नहीं रहेंगे. विधान परिषदसे इस्तीफा नहीं देने पर राज्यसभा की उनकी सदस्यता स्वतः माप्त हो जाएगी. वास्तविकता यह है कि नीतीश कुमार ने खुद घोषणा की है कि वे सीएम पद छोड़ कर राज्यसभा जाएंगे. वे चाहें तो राज्यसभा का सदस्य रहते हुए बिहार का सीएम 6 महीने तक बने रह सकते हैं. पर, यह उनकी नैतिकता के खिलाफ होगा. अब नीतीश को तय करना है कि वे एमएलसी बन कर बिहार का सीएम बने रहना चाहेंगे या बिहार का मोह त्याग कर राज्यसभा जाएंगे. उनके मन की बात का थाह उनके करीबी भी नहीं लगा पाते.







