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ईरान ने बदल दिए जंग के नियम, भारत के लिए क्या है सीख ?

UB India News by UB India News
March 12, 2026
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर
0
ईरान ने बदल दिए जंग के नियम, भारत के लिए क्या है सीख ?

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पश्चिम एशिया का युद्ध अब सिर्फ स्थानीय संघर्ष नहीं रहा. यह आधुनिक युद्ध की किताब में एक नया अध्याय लिख रहा है. ईरान और उसके सहयोगियों ने जिस तरह सस्ते ड्रोन स्वार्म्स, हाइपरसोनिक मिसाइलें और असीमित रणनीतियों से उन्नत अमेरिकी-इजरायली हथियारों को चुनौती दी है, उसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है. F-35 और F-22 जैसे स्टेल्थ जेट, थाड और पैट्रियट जैसे महंगे मिसाइल शील्ड्स… ये सब अब तक अजेय माने जाते थे, लेकिन इस युद्ध ने दिखाया कि महंगे हथियार अकेले जीत नहीं दिलाते. सस्ते, बड़ी संख्या वाले और स्मार्ट तरीके से इस्तेमाल किए गए सिस्टम नियम बदल सकते हैं. ऐसे में इस जंग से भारत को भी काफी कुछ सीखने का मौका मिला है.

स्टेल्थ और महंगे फाइटर जेट्स की सीमाएं उजागर
F-35 लाइटनिंग II और F-22 रैप्टर जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ विमान भारी रक्षा वाले इलाकों में घुसकर मिशन पूरा कर रहे हैं, लेकिन इनकी लागत और रखरखाव इतना ऊंचा है कि बड़े पैमाने पर तैनाती मुश्किल हो जाती है. युद्ध में देखा गया कि स्टेल्थ भी हमेशा काम नहीं करता. कई बार सेंसर नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से इनकी पहचान हो जाती है.  युद्ध बताता है कि स्टेल्थ पर अंधाधुंध भरोसा न करें. सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स और संख्या में बढ़त ज्यादा मायने रखती है.
ड्रोन स्वार्म्स: सस्ता लेकिन घातक हथियार
ईरान के शाहेद-136 जैसे कम लागत वाले वन-वे अटैक ड्रोन्स ने दिखाया कि सैकड़ों-हजारों की संख्या में हमला करने से सबसे उन्नत एयर डिफेंस भी ओवरलोड हो सकता है. MQ-9 रीपर जैसे महंगे ड्रोन अच्छे हैं, लेकिन संख्या में कम है. भारत ने MQ-9B का ऑर्डर दिया है, लेकिन इस युद्ध का सबक यह है कि हमें सस्ते, स्वदेशी ड्रोन और लॉइटरिंग मुनिशन (जैसे हैरोप) की बड़ी संख्या चाहिए. ड्रोन स्वार्म्स से दुश्मन की रक्षा प्रणाली को पहले ही थका देना नई रणनीति है. भारत को स्वदेशी ड्रोन उत्पादन को तेज करना होगा, ताकि संख्या और लागत में संतुलन बने.
भारत के पास एस-400 और राफेल जैसे उन्नत हथियार हैं.
मिसाइल शील्ड्स की महंगी हकीकत
थाड, पैट्रियट, आयरन डोम, डेविड्स स्लिंग- ये सब महंगे इंटरसेप्टर हैं. एक मिसाइल रोकने में लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, जबकि हमलावर सस्ते ड्रोन या मिसाइल इस्तेमाल कर सकता है. ईरान ने दिखाया कि असीमित हमले से इन सिस्टम्स को ‘कबाड़’ जैसा बनाया जा सकता है. भारत के पास S-400, आकाश-एनजी, प्रिथ्वी एयर डिफेंस और ABD जैसे लेयर्ड सिस्टम हैं. ये मजबूत हैं. लेकिन सबक यह है कि लेजर-आधारित डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स (जैसे इजरायल का आयरन बीम) पर फोकस बढ़ाएं. DRDO का सूर्या कार्यक्रम इसी दिशा में है. महंगे मिसाइल इंटरसेप्टर के बजाय सस्ते, हाई-वॉल्यूम डिफेंस सॉल्यूशन जरूरी हैं.
नौसेना और सबमरीन में बड़ा गैप
अमेरिकी कैरियर्स बड़े अभियान चला रहे हैं, लेकिन भारत के विक्रमादित्य और विक्रांत स्की-जंप की क्षमता सीमित है. असली चिंता न्यूक्लियर अटैक सबमरीन्स (SSN) की है. अमेरिकी वर्जीनिया-क्लास सबमरीन छिपकर ऑपरेशन कर रही हैं. भारत के पास फिलहाल स्वदेशी SSN नहीं है. लीज वाली पनडुब्बियां ट्रेनिंग के लिए हैं, लेकिन युद्ध में यह कमी घातक साबित हो सकती है.
सबसे बड़ा सबक- एकीकरण और असीमित रणनीति
ईरान ने दिखाया कि महंगे हथियार ‘कबाड़’ तब बन जाते हैं, जब उन्हें सही रणनीति से इस्तेमाल न किया जाए. आधुनिक युद्ध में व्यक्तिगत प्लेटफॉर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका एकीकरण. सेंसर, कमांड, ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का एक साथ काम करना बहुत अहम हो गया है. भारत के पास ब्रह्मोस (सुपरसोनिक), रुद्रम, अग्नि सीरीज जैसी मिसाइलों की ताकत है. लेकिन ड्रोन बेड़ा, SSN, AEW&C और स्टेल्थ में गैप भरना होगा. यह युद्ध भारत के लिए एक आईना है. अगर सबक नहीं सीखे तो महंगे हथियार भी कबाड़ साबित हो सकते हैं.
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