बिहार से ही इंदिरा गांधी के विरोध में आंदोलन शुरू हुआ था, जिससे उनकी सत्ता का अंत हुआ। अब बिहार से ही राहुल गांधी के खिलाफ विरोध की सबसे बुलंद आवाज देश भर में गूंजी है। इतिहास गवाह है कि बिहार से निकली हुई विरोध की आवाज कभी बेअसर नहीं होती। कहीं ऐसा न हो जाए कि मोहब्बत की दुकान से मोहब्बत रुखसत हो जाए और सिर्फ खाली दुकान बची रहे। कांग्रेस से मोहब्बत करने वाले आखिर क्यों उसका साथ छोड़ रहे? हकीकत में मोहब्बत की दुकान हो भी नहीं सकती क्योंकि ये तो दिलों का मामला है। मोहब्बत कोई तिजारत नहीं कि दुकान पर मिले। अब तो दुकान के मालिक-मुख्तार (राहुल गांधी) पर ही ये आरोप लगा है कि उनमें न तो काबिलियत है और न जिगरा है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ शकील अहमद खानदानी कांग्रेसी रहे हैं। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि पहले तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और अब राहुल गांधी को डरपोक नेता बता रहे हैं।
दादा 1937 में विधायक, पिता और पुत्र 5-5 बार विधायक
क्या कांग्रेस में वही रह सकता है जो राहुल गांधी और सोनिया गांधी की जी-हजूरी करे? क्या स्वतंत्र राय रखने वाले कांग्रेस में नहीं टिक सकते? डॉ शकील अहमद की तीन पीढ़ियों ने कांग्रेस की सेवा की। उनके दादा अहमद गफूर 1937 में कांग्रेस से बिहार असेम्बली के चुने गये थे। पिता शकूर अहमद 1952 से 1977 के बीच कांग्रेस से पांच बार विधायक रहे। 1985 के बाद खुद शकील अहमद पांच बार कांग्रेस के विधायक रहे। सांसद और केन्द्रीय मंत्री भी रहे। लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी। ऐसे समर्पित कांग्रेसी परिवार के सदस्य शकील अहमद ने अगर राहुल गांधी पर बुजदिली की आरोप लगाया है तो इसे जरूर कुछ सच्चाई होगी।
राहुल गांधी को चुनावी मुद्दों की समझ नहीं!
राहुल गांधी को अगर कोई आईना दिखाये तो वे हुलिया ठीक करने की बजाय आईना तोड़ने पर ही अमादा हो जाते हैं। शकील अहमद ने जब पार्टी छोड़ी थी तब कहा था कि पार्टी की नीतियों को प्रति आज भी मेरी अटूट श्रद्धा है लेकिन संगठन के शीर्ष पर में बैठे कुछ व्यक्तियों से मतभेद है। यानी उनकी नाखुशी राहुल गांधी से है। कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी को चुनावी मुद्दों की समझ नहीं है। बिहार में उन्होंने वोटर अधिकार यात्रा के जरिये SIR को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए 17 दिनों तक घनघोर मेहनत की। वोट चोर, गद्दी छोड़ का नारा लगा कर माहौल बनाने की कोशिश की। लेकिन सारी मेहनत इसलिए बेकार चली गयी क्योंकि जनता की नजर में ये कोई मुद्दा ही नहीं था। SIR के खिलाफ एक भी शिकायत नहीं मिली।
राहुल गांधी की कमियों पर फिर बहस शुरू
शकील अहमद के बयान के बाद राहुल गांधी की कमियों पर एक बार फिर बहस तेज हो गयी है। आरोप है कि राहुल गांधी ने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर दिया है। जब चुनावी हार के बाद उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। साफ दिल से उन्हें संगठन के लिए काम करना चाहिए था। पार्टी की कमान परिवार से बाहर किसी काबिल नेता को सौंपनी चाहिए थी। लेकिन राहुल गांधी सुपर बॉस की भावना से मुक्त नहीं हो सके। परिवार से बाहर के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को अध्यक्ष बनाया तो जरूर लेकिन सारी शक्तियां अपने हाथ में रखीं। खरगे तो बस नाम के अध्यक्ष हैं, सारे फैसले राहुल गांधी लेते हैं। खानापूर्ति के लिए दस्तखत खरगे का होता है।
अब तो बिहार के जिला स्तर पर भी राहुल गांधी का विरोध
राहुल गांधी के खिलाफ बिहार से निकली यह बुलंद आवाज दूर तलक गूंजेगी। अब तो जिला स्तर पर भी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की अक्षमता पर सवाल उठाने लगे हैं। फिलवक्त बिहार कांग्रेस के नेता ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के तहत जिलों में चौपाल लगा रहे हैं। मंगलवार को दरभंगा में चौपाल सजी थी। इस दौरान स्थानीय नेता राम नारायण ने राहुल गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा कि जब तक बिहार में टिकट की खरीद-फरोख्त बंद नहीं होगी, तब कांग्रेस यहां आगे नहीं बढ़ेगी। स्थानीय नेताओं ने बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाने लगाये।







