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महिला सशक्तीकरण कोई क्षेत्रीय प्रतियोगिता नहीं बल्कि राष्ट्रीय लक्ष्य है …………………….

UB India News by UB India News
January 16, 2026
in खास खबर, ब्लॉग, महिला युग
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महिला सशक्तीकरण कोई क्षेत्रीय प्रतियोगिता नहीं बल्कि राष्ट्रीय लक्ष्य है  …………………….
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अपने विवादित बयानों के लिए चर्चित वरिष्ठ द्रमुक सांसद दयानिधि मारन ने तमिलनाडु में इसी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर भारतीय महिलाओं पर जो टिप्पणी की है, वह घोर निंदनीय और अस्वीकार्य तो है ही, इसने राज्य की राजनीति में एक बार फिर उत्तर-दक्षिण की खाई को गहरा कर दिया है। उल्लेखनीय है कि चेन्नई के एक सरकारी महिला कॉलेज में विद्यार्थियों को लैपटॉप बांटने के कार्यक्रम के दौरान उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन की मौजूदगी में मारन ने कहा कि तमिलनाडु में महिलाओं से पढ़ने के लिए, जबकि उत्तर भारत में महिलाओं को घर पर रहने, खाना बनाने और बच्चे पैदा करने के लिए कहा जाता है। दक्षिण भारतीय राजनीति में इस तरह के विवाद नए नहीं हैं। द्रमुक नेता अक्सर उत्तर-दक्षिण के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक अंतर को उभारकर राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश करते रहे हैं। पर इस बार उनके नेता का बयान न सिर्फ अशोभनीय है, बल्कि द्रमुक के सहयोगी माने जाने वाले हिंदी भाषी राज्यों के प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए भी असहज करने वाला है। देश में महिलाओं की स्थिति राज्य-दर-राज्य अलग-अलग है, लेकिन इसे उत्तर बनाम दक्षिण के सांचे में ढालना न केवल गलत है, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिहाज से हानिकारक भी। शिक्षा व महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में तमिलनाडु की उपलब्धियां निस्संदेह सराहनीय हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे राज्यों की महिलाएं घरेलू गुलाम हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, महिला सशक्तीकरण के मामले में उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्य कई दक्षिण भारतीय राज्यों से आगे हैं। देश की राजनीति में नेताओं द्वारा महिलाओं पर अपमानजनक टिप्पणी का यह कोई पहला मामला नहीं है। एक तरफ वे बेटी बचाओ की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे बयान देकर आखिर क्या संदेश देते हैं? राजनीति में शब्दों की कीमत होती है और राजनेताओं को यह समझना चाहिए कि उनके बयान समाज की दिशा तय करते हैं। महिला सशक्तीकरण कोई क्षेत्रीय प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय लक्ष्य है, जिसे हासिल करने के लिए सभी राज्यों को एक-दूसरे से सीखने की जरूरत है। अगर दयानिधि मारन वाकई महिला सशक्तीकरण के पक्षधर हैं, तो उन्हें अपने शब्दों पर पुनर्विचार कर अविलंब माफी मांगनी चाहिए। अन्यथा, ऐसे बयान राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल होते रहेंगे और महिलाओं के असल मुद्दे पीछे छूटते रहेंगे।

 

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डीएमके सांसद दयानिधि मारन के उत्तर भारत और तमिलनाडु की महिलाओं को लेकर दिए गए बयान ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। उनके बयान पर भाजपा ने कड़ी आपत्ति जताई है, जबकि डीएमके ने इसे महिला सशक्तिकरण से जुड़ा संदेश बताया है।
चेन्नई सेंट्रल से चार बार सांसद रह चुके दयानिधि मारन ने क्वैद-ए-मिल्लत गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वूमन में छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि तमिलनाडु में लड़कियों को पढ़ाई और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है, जबकि उत्तर भारत में महिलाओं से घर में रहने, रसोई संभालने और बच्चे पैदा करने की उम्मीद की जाती है।

उन्होंने आगे कहा कि तमिलनाडु एक द्रविड़ राज्य है, जहां महिलाओं की प्रगति को राज्य की प्रगति माना जाता है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि, सीएन अन्नादुरई और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का जिक्र करते हुए कहा कि यही वजह है कि वैश्विक कंपनियां चेन्नई आती हैं, क्योंकि यहां की महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर हैं। इस कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने भी छात्रों को संबोधित किया और ‘उलगम उंगल काईयिल’ योजना के तहत छात्राओं को लैपटॉप वितरित किए।
भाजपा का पलटवार 
मारन के बयान पर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी। तमिलनाडु बीजेपी प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने कहा कि यह बयान उत्तर भारत के लोगों का अपमान है। वहीं भाजपा नेता अनिला सिंह ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि भारत में शक्ति की पूजा होती है और महिलाओं को उत्तर-दक्षिण में बांटना विभाजनकारी राजनीति है। अनिला सिंह ने कहा मारन भूल गए हैं कि वह भारत में रहते हैं। यहां महिला शक्ति को उत्तर या दक्षिण में नहीं बांटा जा सकता।डीएमके ने किया बचाव
हालांकि डीएमके ने मारन के बयान का बचाव किया है। पार्टी नेता टीकेएस एलंगोवन ने कहा कि तमिलनाडु में महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर सशक्त किया गया है। डीएमके सूत्रों के मुताबिक मारन का उद्देश्य छात्राओं को सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करना था। पार्टी सूत्रों ने यह भी दावा किया कि देश की औद्योगिक महिला श्रमिकों में 40 प्रतिशत से अधिक अकेले तमिलनाडु से हैं और बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

अपने विवादित बयानों के लिए चर्चित वरिष्ठ द्रमुक सांसद दयानिधि मारन ने तमिलनाडु में इसी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर भारतीय महिलाओं पर जो टिप्पणी की है, वह घोर निंदनीय और अस्वीकार्य तो है ही, इसने राज्य की राजनीति में एक बार फिर उत्तर-दक्षिण की खाई को गहरा कर दिया है। उल्लेखनीय है कि चेन्नई के एक सरकारी महिला कॉलेज में विद्यार्थियों को लैपटॉप बांटने के कार्यक्रम के दौरान उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन की मौजूदगी में मारन ने कहा कि तमिलनाडु में महिलाओं से पढ़ने के लिए, जबकि उत्तर भारत में महिलाओं को घर पर रहने, खाना बनाने और बच्चे पैदा करने के लिए कहा जाता है। दक्षिण भारतीय राजनीति में इस तरह के विवाद नए नहीं हैं। द्रमुक नेता अक्सर उत्तर-दक्षिण के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक अंतर को उभारकर राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश करते रहे हैं। पर इस बार उनके नेता का बयान न सिर्फ अशोभनीय है, बल्कि द्रमुक के सहयोगी माने जाने वाले हिंदी भाषी राज्यों के प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए भी असहज करने वाला है। देश में महिलाओं की स्थिति राज्य-दर-राज्य अलग-अलग है, लेकिन इसे उत्तर बनाम दक्षिण के सांचे में ढालना न केवल गलत है, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिहाज से हानिकारक भी। शिक्षा व महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में तमिलनाडु की उपलब्धियां निस्संदेह सराहनीय हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे राज्यों की महिलाएं घरेलू गुलाम हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, महिला सशक्तीकरण के मामले में उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्य कई दक्षिण भारतीय राज्यों से आगे हैं। देश की राजनीति में नेताओं द्वारा महिलाओं पर अपमानजनक टिप्पणी का यह कोई पहला मामला नहीं है। एक तरफ वे बेटी बचाओ की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे बयान देकर आखिर क्या संदेश देते हैं? राजनीति में शब्दों की कीमत होती है और राजनेताओं को यह समझना चाहिए कि उनके बयान समाज की दिशा तय करते हैं। महिला सशक्तीकरण कोई क्षेत्रीय प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय लक्ष्य है, जिसे हासिल करने के लिए सभी राज्यों को एक-दूसरे से सीखने की जरूरत है। अगर दयानिधि मारन वाकई महिला सशक्तीकरण के पक्षधर हैं, तो उन्हें अपने शब्दों पर पुनर्विचार कर अविलंब माफी मांगनी चाहिए। अन्यथा, ऐसे बयान राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल होते रहेंगे और महिलाओं के असल मुद्दे पीछे छूटते रहेंगे।

 

डीएमके सांसद दयानिधि मारन के उत्तर भारत और तमिलनाडु की महिलाओं को लेकर दिए गए बयान ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। उनके बयान पर भाजपा ने कड़ी आपत्ति जताई है, जबकि डीएमके ने इसे महिला सशक्तिकरण से जुड़ा संदेश बताया है।
चेन्नई सेंट्रल से चार बार सांसद रह चुके दयानिधि मारन ने क्वैद-ए-मिल्लत गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वूमन में छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि तमिलनाडु में लड़कियों को पढ़ाई और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है, जबकि उत्तर भारत में महिलाओं से घर में रहने, रसोई संभालने और बच्चे पैदा करने की उम्मीद की जाती है।

उन्होंने आगे कहा कि तमिलनाडु एक द्रविड़ राज्य है, जहां महिलाओं की प्रगति को राज्य की प्रगति माना जाता है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि, सीएन अन्नादुरई और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का जिक्र करते हुए कहा कि यही वजह है कि वैश्विक कंपनियां चेन्नई आती हैं, क्योंकि यहां की महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर हैं। इस कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने भी छात्रों को संबोधित किया और ‘उलगम उंगल काईयिल’ योजना के तहत छात्राओं को लैपटॉप वितरित किए।
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हालांकि डीएमके ने मारन के बयान का बचाव किया है। पार्टी नेता टीकेएस एलंगोवन ने कहा कि तमिलनाडु में महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर सशक्त किया गया है। डीएमके सूत्रों के मुताबिक मारन का उद्देश्य छात्राओं को सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करना था। पार्टी सूत्रों ने यह भी दावा किया कि देश की औद्योगिक महिला श्रमिकों में 40 प्रतिशत से अधिक अकेले तमिलनाडु से हैं और बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

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