हृषिकेश पञ्चांग के अनुसार सूर्य नारायण 14 जनवरी रात्रि 9 बजकर 39 मिनट पर धनु राशि को पार कर मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं. यह राशि परिवर्तन ही संक्रांति कहलाता है. जानकारों की मानें तो ये घटना सूर्य की चाल बदलने से हो रही है. काशी के पण्डित लोकेश कृष्ण त्रिपाठी बताते हैं, यह अपने आप में एक पुण्य क्षण होता है, किंतु यह घटना तीव्रता से घटित होने के कारण ही पर्व के रूप में इसके पुण्य काल का वरण होता है, जो 40 घटी या 16 घंटे का है. इस प्रकार पुण्य काल 15 जनवरी दिन में 1 बजकर 39 मिनट तक हुआ. अर्थात 15 जनवरी दिन के 1:39 तक मकर संक्रांति का स्नान दान किया जा सकता है. ऋतु परिवर्तन, अयन परिवर्तन , मौसम परिवर्तन और वृद्धि योग इस संक्रांति को विशेष बनाते हैं.
मांगलिक कार्य होंगे शुरू
इसी दिन हेमंत के उपरान्त शिशिर ऋतु का प्रवेश, प्रचण्ड शीत में कमी और सूर्य उत्तरायण हो रहे हैं. मांगलिक कार्य आरम्भ हो जायेंगे. हालांकि अयन संक्रांति के बाद 3 दिवसों तक शुभ कार्यों की वर्जना होती है.

महावीर पञ्चांग के अनुसार कब
महावीर पञ्चांग के अनुसार भी प्रदोष के पश्चात् रात्रि में किसी भी समय संक्रांति लगती है तो उसका पुण्य काल दूसरे दिन होता है. अर्थात् मकर का सूर्य हमें 15 को ही मिलने वाला है। अतः यह पर्व 15 जनवरी को ही मनाया जाएगा। इस दिन तिल , गुड़ आदि खाद्य पदार्थ, पोथी, पञ्चांग, पादुका, वस्त्र, कम्बल आदि का दान पुण्य फल देता है.

क्यों हो रहा है 14-15 तारीख वाला संशय?
हर वर्ष सूर्य लगभग 20 मिनट विलम्ब से राशि परिवर्तन करता है. यह 20 मिनट का अन्तर लगभग 72 वर्षों 24 घंटे या 1 दिन का हो जाता है. सूर्य सनातन मार्गी ग्रह है अतः यह समय 1 दिन आगे बढ़ जाता है. सन् 1936 से मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है. सन् 2008 से हर वर्ष जनमानस में संशय हो रहा है. लगभग सन् 2080 तक यह पर्व 15 जनवरी को मनाया जाना चाहिए तदोपरांत 16 जनवरी का संशय उत्पन्न होगा.
आज सूर्य करेगा मकर राशि में प्रवेश:मकर संक्रांति की तारीख को लेकर पंचांग भेद
इस साल मकर संक्रांति की तारीख को लेकर पंचांग भेद हैं। कुछ पंचांगों में 14 जनवरी को और कुछ में 15 जनवरी को ये पर्व बताया गया है। दरअसल, सूर्य आज दोपहर करीब 3.20 बजे मकर राशि में प्रवेश करेगा, इस वजह से अगले दिन यानी 15 जनवरी को जो सूर्योदय होगा, उसमें सूर्य मकर राशि में रहेगा, इसलिए 15 तारीख को मकर संक्रांति का पुण्यकाल रहेगा। पुण्यकाल यानी इस दिन नदी स्नान और दान-पुण्य किए जाएंगे।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, 14 जनवरी की सुबह तो सूर्य धनु राशि में ही है। मकर संक्रांति में सबसे अधिक नदी स्नान और दान-पुण्य का महत्व है। ये शुभ सुबह-सुबह करने का विधान है, इसलिए 15 जनवरी को मकर संक्रांति से जुड़े शुभ काम करना ज्यादा शुभ है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के बाद खरमास भी खत्म हो जाएगा। खरमास खत्म होने के बाद विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कामों के लिए शुभ मुहूर्त मिलने लगेंगे।
सूर्य जब गुरु की धनु या मीन राशि में रहता है तो उस समय को खरमास कहा जाता है। खरमास के समय में पंचदेवों में से एक सूर्यदेव देवगुरु बृहस्पति की सेवा में रहते हैं, इस वजह से वे मांगलिक कर्म में नहीं आ पाते हैं, इस कारण खरमास में मांगलिक कर्म नहीं किए जाते हैं।
मकर संक्रांति पर सूर्य देव की विशेष पूजा रोज करनी चाहिए। सुबह जल्दी उठें और स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल भरें, चावल और फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें। सूर्य को जल चढ़ाते समय में सूर्य के 12 मंत्रों का जप करना चाहिए।
सूर्य के 12 नाम मंत्र- ऊँ मित्राय नमः, ऊँ रवये नमः, ऊँ सूर्याय नमः, ऊँ भानवे नमः, ऊँ खगाय नमः, ऊँ पूष्णे नमः, ऊँ हिरण्यगर्भाय नमः, ऊँ आदित्याय नमः, ऊँ सवित्रे नमः, ऊँ अर्काय नमः, ऊँ भास्कराय नमः, ऊँ सूर्यनारायणाय नमः।
सूर्य को जल चढ़ाने से धर्म लाभ के साथ ही स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं। मंत्र जप से एकाग्रता और आत्मविश्वास बढ़ते हैं। सूर्य को अर्घ्य देते समय पानी की जो धारा जमीन पर गिरती है, उस धारा में से सूर्यदेव के दर्शन करना चाहिए। ध्यान रखें, सूर्य को सीधे देखने से बचें। अर्घ्य देने के बाद जमीन पर गिरे पानी को अपने माथे पर लगाना चाहिए। जल ऐसी जगह चढ़ाना चाहिए, जहां जमीन पर गिरे जल पर किसी व्यक्ति के पैर न लगे।
मकर संक्रांति के साथ ही उत्तरायण पर्व भी मनाया जाता है। उत्तरायण यानी इस दिन से सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू हो जाता है, हालांकि खगोल विज्ञान के अनुसार 21-22 दिसंबर को ही सूर्य उत्तरायण हो जाता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं की वजह से मकर संक्रांति के साथ ही ये पर्व मनाया जाता है।
भीष्म पितामह ने उत्तरायण पर त्यागे थे प्राण
महाभारत युद्ध में अर्जुन ने भीष्म पितामह पर इतने बाण चलाए थे कि वे बाणों की शय्या पर आ गए थे, लेकिन उनकी मृत्यु नहीं हुई, क्योंकि भीष्म को उनके पिता शांतनु से इच्छामृत्यु का वरदान दिया था। भीष्म पितामाह पूर्वजन्म में एक वसु थे।
वसुओं को भी देवता माना गया है। एक बार पृथु और अन्य वसु अपनी पत्नियों के साथ मेरु पर्वत पर घूम रहे थे। इसी पर्वत पर वशिष्ठ ऋषि का आश्रम भी था।
एक वसु की पत्नी ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में बंधी नंदिनी गाय को देखा तो उसने अपने पति द्यौ नामक वसु से वह गाय मांगी।
पत्नी की बात मानकर द्यौ अपने भाइयों के साथ वशिष्ठ मुनि को बताए बिना उस गाय को ले आया। जब महर्षि वशिष्ठ अपने आश्रम आए तो उन्हें अपनी गाय नहीं देखी तो उन्होंने दिव्य दृष्टि से जान लिया कि वसु ने उनकी गाय की चोरी की है। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया।
शाप से डरकर सभी वसु ऋषि वशिष्ठ से क्षमा मांगने आए तो ऋषि ने कहा कि तुम सभी वसुओं को तो शीघ्र ही मनुष्य जीवन से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन इस द्यौ नामक के वसु को अपने कर्म भोगने के लिए बहुत दिनों तक पृथ्वीलोक में रहना पड़ेगा और आजीवन ब्रह्मचारी के रूप में जीवन बिताना होगा।
अष्ट वसुओं में से सात भीष्म की माता गंगा ने जन्म लेते ही नदी में बहा दिया था और उनकी मुक्ति के साथ वे वशिष्ठ मुनि के शाप से मुक्त हो गए थे। आठवें द्यौ नाम के वसु ने गंगापुत्र भीष्म के रूप में जन्म लिया था, शाप की वजह से से भीष्म आजीवन ब्रह्मचारी रहे और लंबे समय तक पृथ्वी पर रहे।







