अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान में विरोध प्रदर्शनों पर वहां की सरकार की सख्त कार्रवाई के खिलाफ सैन्य कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं। ट्रंप ने अभी तक यह नहीं बताया कि ये कदम क्या होंगे, हालांकि माना जा रहा है कि वह जंग की तैयारी कर रहे हैं। बता दें कि ईरान में विरोध प्रदर्शन तेज होते जा रहे हैं, और लोग सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर बवाल मचाए हुए हैं। अमेरिका अगर ईरान में दखल देना चाहता है तो उसके पास कई विकल्प हैं। ये विकल्प कूटनीति से लेकर सैन्य हमलों तक हैं, लेकिन इतिहास बताता है कि इनमें से कुछ कदम उसके लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं।
ईरान पर प्रतिबंधों का नहीं होता है असर
अमेरिका के पास सबसे आसान तरीका है, ईरान पर नए प्रतिबंध लगाना और उसके कृत्यों की निंदा करना। हाल ही में ट्रंप ने ईरान से कारोबार करने वाले किसी भी देश पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया है। ये कदम अमेरिका को अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम करने का मौका देते हैं और विरोध करने वालों को बिना सीधे टकराव के नैतिक समर्थन मिलता है। लेकिन सालों का अनुभव बताता है कि ये तरीके ज्यादा असर नहीं करते। ईरान की सरकार आर्थिक दबाव झेलने में माहिर है। वे लागत को आम लोगों पर डाल देते हैं और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों को दुश्मनों की साजिश बताते हैं। ईरान ने समय के साथ नए बाजार खोज लिए हैं और डॉलर के बिना व्यापार करना सीख लिया है।
अमेरिका के पास छिपे हुए तरीके भी हैं, जैसे साइबर हमले करना या विरोध करने वालों को इंटरनेट ब्लॉक तोड़ने में मदद करना। स्वतंत्र मीडिया को सहायता देकर विरोध प्रदर्शनों को दुनिया के सामने लाया जा सकता है। ये कदम ईरान की सरकार के लिए मुश्किल पैदा करते हैं, जिनमें निगरानी और दमन पर ज्यादा खर्च और तकनीकी परेशानियां शामिल हैं। फिर भी, इनसे बहुत उम्मीद नहीं करनी चाहिए। ईरान की सरकार अपनी सत्ता बचाने के लिए किसी भी हद से गुजर सकती है, और ये तरीके उनके फैसलों को बदलने में शायद ही सफल हो पाएं।
उल्टा पड़ सकता है सेना का इस्तेमाल
अमेरिका के पास तीसरा रास्ता ये है कि वह ईरान पर हमला कर दे, लेकिन असल में इसका असर उल्टा हो सकता है। ईरान की सेना और उसमें भी इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर बाहरी खतरे की बात कहकर अपनी ताकत बढ़ा सकती है, और उसे खतरनाक ढंग से इस्तेमाल कर सकती है। अमेरिका का हमला ईरान के सुरक्षा तंत्र को वह कहानी दे देगा जो वे चाहते हैं, कि यह देश के अस्तित्व की लड़ाई है। ईरान की संसद के कट्टरपंथी स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने हाल के भाषण में चेतावनी दी थी कि अगर ईरान पर कोई हमला हुआ, तो इजरायल और क्षेत्र में स्थित अमेरिका के सभी सैन्य ठिकाने और संपत्तियां उनके देश के लिए वैध लक्ष्य बन जाएंगी।
ईरान की सरकारी मीडिया ने तेहरान और अन्य शहरों में सरकार समर्थकों की बड़ी रैलियां दिखाईं, जहां लोग ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ और ‘इजरायल मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे। सैन्य टकराव इसलिए और भी खतरनाक है क्योंकि मौजूदा विरोध प्रदर्शन आम लोगों द्वारा किए जा रहे हैं और बिखरे हुए हैं। ये प्रदर्शन सामाजिक समस्याओं से जुड़े हैं, और महिलाएं इन प्रदर्शनों में सबसे आगे हैं। प्रदर्शनकारी अपने प्रदर्शनों में सरकार की विचारधारा को चुनौती दे रहे हैं। कुर्द बहुल इलाकों में प्रदर्शनकारियों पर जमकर हिंसा हो रही है और उनका बेरहमी से दमन किया जा रहा है। अगर अमेरिका हमला करता है, तो ईरान की सरकार इन विरोधों को विदेशी साजिश बता देगी, जिससे और सख्त कार्रवाई को जायज ठहराया जा सकेगा।
लोगों को याद है 1953 का तख्तापलट
ईरान के कई आम नागरिक अमेरिका के सीधे दखल से सतर्क हैं। इसका कारण 1953 का वह तख्तापलट है, जिसमें अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने ईरान के चुने हुए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को हटाया और शाह मोहम्मद रेजा पहलवी की सत्ता बहाल की। इसके बाद करीब 2 दशक तक दमन, राजनीतिक पुलिसिंग और तानाशाही चली, जो पश्चिमी हितों से जुड़ी थी। यह घटना ज्यादा पुरानी नहीं है, और ईरान के तमाम लोग उस दौर से परिचित हैं। इसलिए ट्रंप का यह कहना कि ईरान की धार्मिक व्यवस्था गिरने से लोकतंत्र आएगा, लोगों को 1953 की याद दिलाता है, जहां बाहरी दखल से तानाशाही आई थी, न कि खुद की हुकूमत।
यही वजह है कि ईरान में कई लोग रेजा पहलवी जैसे लोगों पर शक करते हैं। रेजा देश के आखिरी शाह के बेटे हैं और पश्चिम में उन्हें ईरान के भविष्य के नेता के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन वे दमन और विदेशी समर्थन वाली पुरानी व्यवस्था से जुड़े हैं, इसलिए ईरान के लोगों में उनकी बहुत ज्यादा विश्वसनीयता नहीं है। ईरानियों का शक हाल के क्षेत्रीय अनुभवों से और मजबूत होता है। इराक में विदेशी दखल ने राज्य को खोखला कर दिया, जिससे कमजोर सिस्टम बना जो बाहरी ताकतों और मिलिशिया के हाथ में चला गया। सीरिया में केंद्रीय सत्ता गिरने से पूर्व अल-कायदा नेता अहमद अल-शारा सत्ता में आए। ट्रंप समेत पश्चिमी देशों ने उन्हें अब विश्वसनीय राजनीतिक चेहरा बना दिया है, भले उनका जिहादी अतीत हो।
ये उदाहरण मध्य पूर्व में यह विश्वास बढ़ाते हैं कि पश्चिमी दखल लोकतांत्रिक ताकतों को मजबूत नहीं करता, बल्कि यह सबसे संगठित और सशस्त्र गुटों को सत्ता देता है, जिससे लंबी अस्थिरता आती है। अगर ईरान में घरेलू बदलाव न हुआ, तो देश टूट सकता है और अराजकता फैल सकती है। ऐसे में कहा जा सकता है कि अमेरिका भले ही ईरान को सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहा हो, लेकिन उसके लिए इससे कुछ हासिल कर पाना आसान नहीं होगा। ईरान के लोगों को खुद भरोसा नहीं है कि अमेरिका के हमले की स्थिति में उनके देश के हालात बेहतर हो सकेंगे, ऐसे में कोई सर्वमान्य निष्कर्ष मिलना मुश्किल है।










