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AI ‘वाइब स्कैमिंग’ का खतरनाक सच …………..

UB India News by UB India News
January 11, 2026
in कारोबार, खास खबर, टेक्नोलॉजी
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AI  ‘वाइब स्कैमिंग’ का खतरनाक सच …………..
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एआई के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने हमारी जिंदगी को आसान बनाया है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही खतरनाक है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में अब तक आपने ‘वाइब कोडिंग’ की तारीफ सुनी होगी, लेकिन अब इसकी एक काली परछाई ‘वाइब स्कैमिंग’ (What Is Vibe Scamming) के रूप में सामने आई है। साइबर अपराधी अब बिना किसी टेक्निकल नॉलेज के सिर्फ AI को प्रॉम्प्ट देकर खतरनाक फिशिंग जाल बुन रहे हैं। यह स्कैम करने का इतना स्मार्ट तरीका है कि साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स भी इसे लेकर चिंतित हैं। जानिए क्या है यह नया खतरा और आप इससे कैसे बच सकते हैं।

क्या है वाइब स्कैमिंग?
वाइब स्कैमिंग दरअसल एआई की मदद से किए जाने वाले ऑनलाइन फ्रॉड का नया तरीका है। इसमें स्कैमर एडवांस एआई टूल्स का इस्तेमाल कर ऐसे नकली वेब पेज, फिशिंग ईमेल और वेबसाइट तैयार करते हैं, जो दिखने में पूरी तरह असली लगते हैं। यूजर इन्हें असली समझकर लॉगिन डिटेल्स या पर्सनल जानकारी डाल देता है और यही डेटा सीधे स्कैमर्स तक पहुंच जाता है। खास बात यह है कि इसमें स्कैमर को किसी खास टेक्निकल स्किल की जरूरत नहीं होती। बस सही तरह का प्रॉम्प्ट दिया जाता है और एआई खुद ही फर्जी कंटेंट तैयार कर देता है।
वाइब कोडिंग से कैसे अलग है वाइब स्कैमिंग?
वाइब कोडिंग एक सकारात्मक तकनीक है, जिसमें एआई मॉडल को अपनी जरूरत या समस्या बताने पर वह खुद कोड लिखकर एप या सॉफ्टवेयर बना देता है। यानी बिना प्रोग्रामिंग सीखे भी डेवलपमेंट संभव हो जाता है। वहीं वाइब स्कैमिंग इसी कॉन्सेप्ट का गलत इस्तेमाल है। इसमें एआई से नकली वेबसाइट, फिशिंग पेज और स्कैम कैंपेन डिजाइन करवाए जाते हैं, जो इतने रियलिस्टिक होते हैं कि असली-नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।

कैसे काम करती है वाइब स्कैमिंग?
इस स्कैम की शुरुआत एक साधारण सवाल या प्रॉम्प्ट से होती है। स्कैमर एआई से किसी साइबर अटैक या सिक्योरिटी सिस्टम की जानकारी हासिल करता है। इसके बाद उसी जानकारी के आधार पर वह ऐसे फिशिंग पेज या मालवेयर तैयार करता है, जो डिवाइस की सुरक्षा को चकमा दे सकें। पिछले साल अगस्त में एक ऐसा ही मामला सामने आया था, जब एआई की मदद से बनाई गई फुल-स्टैक फिशिंग साइट लंबे समय तक पकड़ में ही नहीं आई।

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एआई टूल्स ऐसा क्यों करने देते हैं?
हालांकि ChatGPT, Gemini जैसे एआई प्लेटफॉर्म्स में सेफ्टी फीचर्स मौजूद हैं, लेकिन ये पूरी तरह अचूक नहीं हैं। रिसर्च में सामने आ चुका है कि साइबर अपराधी इन टूल्स का इस्तेमाल मालवेयर बनाने, स्कैम रिसर्च करने और फर्जी कंटेंट तैयार करने में कर रहे हैं। कुछ एआई मॉडल्स को ‘जेलब्रेक’ करके उनसे गैरकानूनी कंटेंट भी बनवाया जा सकता है।

वाइब स्कैमिंग से बचाव कैसे करें?

  • ऑनलाइन ब्राउजिंग के दौरान किसी भी लिंक या वेबसाइट के URL को ध्यान से जांचें।
  • जहां संभव हो, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन जरूर एक्टिव रखें।
  • अगर कोई ईमेल, कॉल या मैसेज डर दिखाकर तुरंत एक्शन लेने को कहे, तो सतर्क हो जाएं।
  • डिवाइस में भरोसेमंद एंटी-वायरस इस्तेमाल करें और सिस्टम को हमेशा अपडेट रखें।

एआई के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने हमारी जिंदगी को आसान बनाया है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही खतरनाक है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में अब तक आपने ‘वाइब कोडिंग’ की तारीफ सुनी होगी, लेकिन अब इसकी एक काली परछाई ‘वाइब स्कैमिंग’ (What Is Vibe Scamming) के रूप में सामने आई है। साइबर अपराधी अब बिना किसी टेक्निकल नॉलेज के सिर्फ AI को प्रॉम्प्ट देकर खतरनाक फिशिंग जाल बुन रहे हैं। यह स्कैम करने का इतना स्मार्ट तरीका है कि साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स भी इसे लेकर चिंतित हैं। जानिए क्या है यह नया खतरा और आप इससे कैसे बच सकते हैं।

क्या है वाइब स्कैमिंग?
वाइब स्कैमिंग दरअसल एआई की मदद से किए जाने वाले ऑनलाइन फ्रॉड का नया तरीका है। इसमें स्कैमर एडवांस एआई टूल्स का इस्तेमाल कर ऐसे नकली वेब पेज, फिशिंग ईमेल और वेबसाइट तैयार करते हैं, जो दिखने में पूरी तरह असली लगते हैं। यूजर इन्हें असली समझकर लॉगिन डिटेल्स या पर्सनल जानकारी डाल देता है और यही डेटा सीधे स्कैमर्स तक पहुंच जाता है। खास बात यह है कि इसमें स्कैमर को किसी खास टेक्निकल स्किल की जरूरत नहीं होती। बस सही तरह का प्रॉम्प्ट दिया जाता है और एआई खुद ही फर्जी कंटेंट तैयार कर देता है।
वाइब कोडिंग से कैसे अलग है वाइब स्कैमिंग?
वाइब कोडिंग एक सकारात्मक तकनीक है, जिसमें एआई मॉडल को अपनी जरूरत या समस्या बताने पर वह खुद कोड लिखकर एप या सॉफ्टवेयर बना देता है। यानी बिना प्रोग्रामिंग सीखे भी डेवलपमेंट संभव हो जाता है। वहीं वाइब स्कैमिंग इसी कॉन्सेप्ट का गलत इस्तेमाल है। इसमें एआई से नकली वेबसाइट, फिशिंग पेज और स्कैम कैंपेन डिजाइन करवाए जाते हैं, जो इतने रियलिस्टिक होते हैं कि असली-नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।

कैसे काम करती है वाइब स्कैमिंग?
इस स्कैम की शुरुआत एक साधारण सवाल या प्रॉम्प्ट से होती है। स्कैमर एआई से किसी साइबर अटैक या सिक्योरिटी सिस्टम की जानकारी हासिल करता है। इसके बाद उसी जानकारी के आधार पर वह ऐसे फिशिंग पेज या मालवेयर तैयार करता है, जो डिवाइस की सुरक्षा को चकमा दे सकें। पिछले साल अगस्त में एक ऐसा ही मामला सामने आया था, जब एआई की मदद से बनाई गई फुल-स्टैक फिशिंग साइट लंबे समय तक पकड़ में ही नहीं आई।

एआई टूल्स ऐसा क्यों करने देते हैं?
हालांकि ChatGPT, Gemini जैसे एआई प्लेटफॉर्म्स में सेफ्टी फीचर्स मौजूद हैं, लेकिन ये पूरी तरह अचूक नहीं हैं। रिसर्च में सामने आ चुका है कि साइबर अपराधी इन टूल्स का इस्तेमाल मालवेयर बनाने, स्कैम रिसर्च करने और फर्जी कंटेंट तैयार करने में कर रहे हैं। कुछ एआई मॉडल्स को ‘जेलब्रेक’ करके उनसे गैरकानूनी कंटेंट भी बनवाया जा सकता है।

वाइब स्कैमिंग से बचाव कैसे करें?

  • ऑनलाइन ब्राउजिंग के दौरान किसी भी लिंक या वेबसाइट के URL को ध्यान से जांचें।
  • जहां संभव हो, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन जरूर एक्टिव रखें।
  • अगर कोई ईमेल, कॉल या मैसेज डर दिखाकर तुरंत एक्शन लेने को कहे, तो सतर्क हो जाएं।
  • डिवाइस में भरोसेमंद एंटी-वायरस इस्तेमाल करें और सिस्टम को हमेशा अपडेट रखें।
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