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कैसा है बिहार की जनता का मूड ?

UB India News by UB India News
September 15, 2025
in पटना, बिहार
0
कैसा है बिहार की जनता का मूड ?

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बिहार चुनाव को लेकर जहां राजनीतिक दलों और गठबंधनों की सक्रियता तेज हो गई है, वहीं चुनाव को लेकर सर्वे करने वाली एजेंसियां भी मैदान में हैं. इसी कड़ी में बिहार चुनाव को लेकर एक सर्वे किया गया है जिनके आंकड़ों ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है. सत्ता विरोधी लहर के बीच नीतीश फैक्टर का अभी भी मजबूती के साथ डटे रहना, इस सर्वे की मुख्य बात है. वहीं, तटस्थ मतदाताओं के हाथ में सत्ता की चाबी होने की बात साफ तौर पर दिख रही है. जबकि, इसी सर्वे में बड़ा आंकड़ा मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर भी आया है, जिसमें तेजस्वी यादव और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता में उतार-चढ़ाव की बात स्पष्ट तौर पर निकाल कर आई है. लेकिन, इस सर्वे के की सबसे बड़ी बात जो सामने आई है वह नीतीश सरकार के विधायकों का प्रदर्शन है जो अब जनता की नजरों पर चढ़े हुए हैं. दरअसल, सर्वे के आंकड़े में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं जिसमें बड़ी संख्या में मतदाता कह रहे हैं कि हमें वर्तमान विधायक नहीं चाहिए. वहीं बड़ी संख्या समर्थकों की भी है और कह नहीं सकते, कहने वालों की संख्या भी अच्छी खासी है.

जनता की नजर में विधायक पास या फेल?

सर्वे में 53.5 प्रतिशत मतदाता कह रहे हैं कि उन्हें वर्तमान विधायक नहीं चाहिए, वहीं 14. 7 प्रतिशत लोगों ने अपनी कोई राय नहीं बनाई है, जबकि 31.8% लोगों ने विधायकों के समर्थन में हामी भरी है. यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि इसमें सत्ताधारी विधायक ही नहीं, बल्कि विपक्ष के विधायक भी शामिल हैं. जाहिर है विधायकों के प्रति जनता का गुस्सा न केवल नीतीश सरकार के लिए बड़ी चिंता का सबब है, बल्कि विपक्षी दलों के लिए भी टेंशन का कारण बनने जा रहा है. अगर मतदाताओं के यही तेवर रहे और इसी सोच से उन्होंने मतदान किया तो निश्चित तौर पर नीतीश सरकार के लिए सत्ता की वापसी की राह मुश्किल होगी, लेकिन विपक्ष की राह भी कांटो भरी है. हालांकि, जिस प्रकार से 31.8% विधायकों के समर्थन में खड़े हैं और 14.7% मतदाताओं ने अपनी राय व्यक्त नहीं की है, इसको मिला दें तो दोनों ही पक्षों की थोड़ी बहुत स्थिति संभालती दिख सकती है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जनता की नजरों पर चढ़ चुके विधायक अब वापसी कर पाएंगे?

शहरों में नाराजगी अधिक, गांव भी पीछे नहीं

चुनाव सर्वे को आंकड़ों में देखें तो ग्रामीण और शहरों का शहरी इलाकों के मत भी साफ-साफ अलग दिख रहे हैं. शहरी इलाकों के लोगों में इस बार विधायकों के प्रति अधिक आक्रोश है और 57% लोग कह रहे हैं कि हमें ऐसे विधायक नहीं चाहिए. वहीं, ग्रामीण क्षेत्र के 52% लोग इस मत के हैं कि वह विधायकों की वापसी नहीं करना चाहते हैं. दूसरी ओर, शहरी क्षेत्र के 31% और ग्रामीण क्षेत्र के 32% मतदाता चाहते हैं कि उनके वर्तमान विधायक ही चुने जाएं. वहीं, बड़ा आंकड़ा पता नहीं या फिर कह नहीं सकते, कहने वालों का है. इनमें शहरी क्षेत्र के 12% लोग और ग्रामीण क्षेत्र के 16% लोगों ने अपनी कोई राय नहीं दी है. जानकार कहते हैं कि सर्वे में 14.7 प्रतिशत तटस्थ मतदाता सबसे बड़ा सियासी ट्विस्ट ला सकते हैं. ये मतदाता न तो विधायकों के पक्ष में हैं और न ही पूरी तरह खिलाफ. माना जा रहा है कि ये न्यूट्रल वोटर ही बिहार में सत्ता का फैसला करेंगे. अगर विपक्ष इन तक पहुंचने में कामयाब रहा तो नीतीश सरकार की राह और मुश्किल हो सकती है.
दूसरी ओर, सर्वे में मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की लोकप्रियता में उतार-चढ़ाव दिखा है. नीतीश कुमार पहले की तुलना में 15 प्रतिशत से बढ़कर 24 प्रतिशत तक पहुंच गए हैं तो तेजस्वी यादव पूर्व की 40 प्रतिशत लोकप्रियता से गिरकर 33 प्रतिशत के लगभग हैं. ऐसे में यह भी साफ है कि नीतीश का अनुभव और स्थापित छवि उन्हें मजबूत बनाती है, जबकि तेजस्वी की युवा जोश और आक्रामक रणनीति ने उन्हें एक बड़ा विकल्प बना दिया है. नीतीश सरकार के विधायकों पर जनता का गुस्सा तेजस्वी यादव के लिए फायदेमंद हो सकता है बशर्ते वे तटस्थ मतदाताओं को लुभा सकें. जाहिर है चुनावी मुकाबला बिहार की सियासत को रोमांचक बना रहा है.53.5% मतदाताओं का विधायकों पर गुस्सा और 14.7% तटस्थ वोटर सत्ता पक्ष के लिए खतरे का संकेत हैं. अगर जनता इसी मूड में वोट करती है तो एनडीए की वापसी कठिन हो सकती है. हालांकि, 31.8% समर्थकों का आधार और नीतीश की व्यक्तिगत छवि कुछ राहत दे सकती है. विपक्ष के लिए यह सुनहरा मौका है, लेकिन तटस्थ वोटरों को लुभाना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी।
इस सर्वे में साफ-साफ दिख रहा है कि जनता सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि अपने स्थानीय विधायकों से भी सवाल कर रही है. 53.5% मतदाता जब अपने मौजूदा विधायक को बदलने की बात कहते हैं तो यह केवल असंतोष नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के प्रति एक स्पष्ट चेतावनी कही जा सकती है. ऐसे में यह भी कि इस बार का चुनाव सिर्फ गठबंधन और चेहरों का नहीं, बल्कि जमीनी कामकाज की भी परीक्षा होगी. जिन विधायकों ने जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में कोताही बरती है उनके लिए वापसी की राह कठिन हो सकती है. वहीं, सर्वे से यह भी स्पष्ट है कि तटस्थ मतदाताओं की चुप्पी चुनावी बिसात पर सबसे बड़ा दांव बन सकती है. ऐसे में राजनीतिक दलों को अब यह समझना होगा कि जनता अब ‘भावनाओं’ से नहीं, ‘परफॉर्मेंस’ से वोट देगी. यह बदलाव बिहार में राजनीतिक जागरूकता का नया चरण है-जहां नेता नहीं, अब जनता तय करेगी कि कौन ‘रहेगा  और किसको बहार करना है!
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