आज सोमवार, 7 अप्रैल को जब भारतीय शेयर बाजार 3900 अंकों की छलांग नहीं बल्कि सीधी गिरावट के साथ ज़मीन चूमने लगा, तब दुनिया को एक बार फिर याद आया ट्रंप इज़ बैक और इस बार भी, ‘तूफान’ अमेरिका से ही आया है. सेंसेक्स का गिरना और 15 लाख करोड़ रुपये का एक झटके में उड़ जाना महज एक तकनीकी दुर्घटना नहीं है. इसके पीछे एक मजबूत नाम है, डोनाल्ड ट्रंप. ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति ने वैश्विक निवेशकों को अनिश्चितता की गहरी खाई में धकेल दिया है.
ट्रंप कहते हैं—”कभी-कभी चीजों को सुधारने के लिए कड़वी दवा लेनी पड़ती है.” मगर सवाल ये है, दवा किसके लिए और बीमारी किसकी? बाजार में दहशत, भरोसे का ब्लैकआउट IT, फार्मा, मिडकैप से लेकर स्मॉलकैप तक हर इंडेक्स जैसे ICU में चला गया हो. भारत में तो मानो निवेशकों को हार्ट अटैक ही आ गया हो, लेकिन क्या ये सब सिर्फ आर्थिक गणनाओं का खेल है? या ट्रंप की ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की रणनीति एक बार फिर बाकी दुनिया को “ले डाउन” करने पर तुली है? क्या ये सिर्फ अमेरिका की घरेलू राजनीति है या वैश्विक आर्थिक आतंकवाद?
जब अमेरिका छींकता है तो दुनिया को जुकाम हो जाता है, लेकिन अब तो अमेरिका खांस नहीं रहा साफ-साफ “खंजर” चला रहा है. टैरिफ के जरिए जो हमला हो रहा है, उसका असर S&P, Nasdaq, Dow Jones से लेकर Nikkei और Hang Seng तक सब पर साफ दिख रहा है. भारत में भी इसका असर दिख रहा है. BSE की कंपनियों का मार्केट कैप कुछ ही मिनटों में 15 लाख करोड़ रुपये घट गया. Nifty के EPS में अनुमानित 3% गिरावट की चेतावनी FY26 के लिए दी गई है.
ट्रंप की टैरिफनीति – एक न्यूक्लियर बटन? JP Morgan तक को कहना पड़ गया कि मंदी की आशंका अब 60% तक पहुंच गई है। यानी ट्रंप की नीति अब सिर्फ आर्थिक रणनीति नहीं, बल्कि आर्थिक न्यूक्लियर बटन बन चुकी है, जिसे दबाकर वे दुनिया को फिर घुटनों पर लाना चाहते हैं. लेकिन इस बार गलती पूरी दुनिया की होगी अगर वो सिर्फ देखती रह गई.







