बिहार में चुनाव से पहले मुस्लिम वोटों को गोलबंद करने की बड़ी कोशिश हो रही है । 23 मार्च को CM नीतीश कुमार ने सीएम हाउस में इफ्तार पार्टी का आयोजन किया। घोषणा के साथ ही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, इमारत-ए-शरिया, खानकाह मुजीबिया समेत 7 मुस्लिम संगठनों ने CM के इफ्तार का बहिष्कार कर दिया। कहा, ‘वक्फ संशोधन विधेयक 2024 कानून बनता है तो नीतीश कुमार और जदयू जिम्मेवार होगी। इसी के विरोध में इफ्तार पार्टी में शामिल होने से इनकार किया जाता है।’
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26 मार्च को पटना के गर्दनीबाग में वक्फ संशोधन बिल का मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया। इस विरोध में शामिल होने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव बीमार होने के बाद भी पहुंच गए। उन्होंने यहां इस विरोध को अपना समर्थन दिया। कहा, ‘गलत हो रहा है। हम इसके विरोध में हैं। नीतीश कुमार उनके साथ हैं, वे इस बिल का समर्थन कर रहे हैं। जनता सब समझ रही है।’
इन दो तस्वीर से लगभग साफ हो गया है कि बिहार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम की सियासत वक्फ कानून के इर्द-गिर्द ही रहने वाली है? वे किस आधार पर किस पार्टी का साथ देंगे और किसका विरोध करेंगे, ये लकीर भी लगभग खींच दी गई है। मौके की नजाकत को देखते हुए सभी पार्टियां इसे अभी से भुनाने में जुट गई है।
खास बात है कि BJP को छोड़कर बिहार की सभी पार्टियों ने दावत-ए-इफ्तार का आयोजन किया। हालांकि, भाजपा नेताओं ने इसमें शामिल होने से इनकार नहीं किया। NDA के घटक दलों की इफ्तार पार्टी में भाजपा नेता शामिल होते दिखे।
बीजेपी के साथ सत्ता में रहते हुए एक-दो मुद्दों पर मुस्लिम संगठनों ने नीतीश कुमार के साथ असहमति तो जताई, लेकिन कभी भी इतना बड़ा विरोध नहीं किया। बिहार की सियासत में ऐसा पहली बार हुआ, जब मुस्लिम के 7 बड़े संगठनों ने एक साथ नीतीश कुमार के कार्यक्रम का न केवल बहिष्कार किया, बल्कि सार्वजनिक तौर पर विरोध का लेटर भी जारी कर दिया।
इस स्पेशल रिपोर्ट में पढ़िए और देखिए, वक्फ बिल संशोधन पर नीतीश कुमार का मोदी सरकार को समर्थन देना कितना हितकर साबित हो सकता है? लालू प्रसाद यादव को कितना लाभ मिल सकता है? नीतीश और लालू ने बिहार में मुस्लिमों के लिए क्या-क्या काम किए?
पहले उन 7 संगठनों को जानिए, जिसने नीतीश कुमार का विरोध किया
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड- यह एक देशव्यापी ऑर्गनाइजेशन है। मुस्लिम संगठनों का इसे अंब्रेला ऑर्गेनाइजेशन कहा जाता है। इसे सभी संगठनों की सुपर बॉडी भी कहा जाता है। सभी संगठन इसके साथ अटैच्ड होते हैं। इनका आदेश पूरा मुस्लिम समाज मानता है।
खानकाह रहमानी- ये एक धार्मिक स्थल है। देश-विदेश में इनके श्रद्धालु हैं। ये संस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण और समाज सुधार पर वर्षों से काम कर रही है। लोगों को पॉलिटिकल अवेयर करने में भी ये एक्टिव है। बिहार भर के मुस्लिम समाज में इनकी सामाजिक और पॉलिटिकल पकड़ है।

इमारत-ए-शरिया- ये एक सामाजिक-धार्मिक संगठन है। पूरे बिहार में इसके लगभग 5 लाख मेंबर्स हैं। एक मेंबर्स 50 से ज्यादा वोट प्रभावित कर सकते हैं।
जमीयत उलमा-ए-हिंद- ये एक धार्मिक संगठन है। बिहार के 35 जिलों में इनके संगठन हैं। साढ़े 3 लाख से ज्यादा मेंबर्स हैं।
जमीयत अहले हदीस- ये एक नेशनल बॉडी है, बिहार में उतना प्रभावी नहीं है।
जमात-ए-इस्लामी हिंद- ये मुख्य तौर दिल्ली और यूपी का संगठन है। देश भर में इनके संगठन हैं।
खानकाह मुजीबिया- ये सोसाइटी के लिए काम करने वाली संस्था है। इसके कोई रजिस्टर्ड मेंबर्स नहीं हैं। ये संस्था बच्चों को अरबी की तालीम देती है। हर साल 150 से ज्यादा लोग यहां तालीम ग्रहण करने आते हैं। इसके अलावा उर्स के मौके पर देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
नीतीश कुमार से मुस्लिम समाज की नाराजगी क्यों?
दैनिक भास्कर ने विरोध करने वाले सभी संगठनों से बात की। इनसे समझना चाहा कि आखिर उनकी नीतीश कुमार से नाराजगी क्यों है? इस पर सभी संगठनों ने लगभग एक ही बात बताई कि नीतीश कुमार ने वक्फ संशोधन बिल को अपना समर्थन देकर हमारे वजूद पर आघात किया है। हमारा कब्रिस्तान खतरे में हैं। वे मेरे लिए काम करें, लेकिन हमारा गर्दन उड़ा दें तो इसका क्या फायदा। जब जिंदा ही नहीं रहेंगे तो विकास का क्या करेंगे?
संगठनों ने दावा किया कि नीतीश कुमार अगर समर्थन नहीं देते तो इस बिल का लोकसभा में पास होना संभव नहीं था। हमारी नाराजगी इसी बात से है। क्या चुनाव में भी इसका असर होगा? इस पर इन्होंने कहा कि चुनाव अभी दूर है, उस वक्त क्या निर्णय लिया जाएगा हम इस पर उसी समय बात करेंगे।
2015 के बाद से मुस्लिमों का नीतीश कुमार से मोहभंग
बात 2024 लोकसभा चुनाव की है। नीतीश कुमार NDA की एक मीटिंग में शामिल थे। यहां सीएम को कहना पड़ा, ‘मुसलमानों को जाकर बताइए, उनके लिए सरकार ने क्या-क्या काम किया है। RJD आ गई तो दंगा फसाद करेगी।’
इस बयान का संदेश साफ था। नीतीश कुमार भी ये मान चुके थे कि इस समाज का अब उनसे मोह भंग हो चुका है। 2024 के लोकसभा और 2020 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में नीतीश कुमार की पार्टी के एक भी मुस्लिम कैंडिडेट जीतने में सफल नहीं हो पाए थे।
2015 विधानसभा चुनाव में आखिरी बार JDU से 5 मुस्लिम विधायक जीते थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में JDU के एक भी मुस्लिम सांसद नहीं जीत पाए थे। 2020 के विधानसभा चुनाव जदयू ने 11 मुस्लिम कैंडिडेट को मैदान में उतारा, लेकिन एक भी कैंडिडेट जीतने में सफल नहीं रहे। यही हाल 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हुआ, जदयू के एक भी कैंडिडेट चुनाव नहीं जीत पाए।
अब जानिए, नीतीश ने मुस्लिमों के लिए क्या किया
2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने मुस्लिमों की कई पुरानी डिमांडों को एक-एक करके पूरा किया। पटना में हज भवन का निर्माण, अंजुमन इस्लामिया की मॉडर्न बिल्डिंग का निर्माण, मदरसा के शिक्षकों की सैलरी सरकारी स्कूल के शिक्षकों के बराबर करना, उर्दू शिक्षकों की बहाली, कब्रिस्तान की घेराबंदी या हर विधानसभा क्षेत्र में आवासीय स्कूल और छात्रावास का निर्माण, हायर एजुकेशन के लिए मुस्लिम छात्रों को स्कालरशिप जैसी कई योजनाएं 2005 से लेकर अब तक शुरू की गई है।

लालू यादव को क्यों मिलता है मुस्लिमों का साथ
लालू यादव मुस्लिमों के लिए मजबूती हैं या मजबूरी? इस सवाल पर पटना में एक मुस्लिम स्कॉलर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, ‘मुस्लिम समाज हमेशा से उन पार्टियों के साथ गोलबंद रहा है, जो उन्हें सामाजिक सुरक्षा का भाव दे सके।
1990 के काल से ही बिहार जातीय हिंसा और दंगा की चपेट में रहा है, उस वक्त अगर हमारे साथ कोई खड़ा मिला तो वे लालू प्रसाद यादव थे। खासकर बिहार में आडवाणी का रथ रोकने के बाद मुस्लिम समाज ने उन्हें अपना मसीहा मान लिया।’
‘यह बात सच है कि मुस्लिमों के उत्थान के लिए जितना काम नीतीश कुमार ने किया है, उसका एक हिस्सा काम भी लालू यादव ने नहीं किया है। बीजेपी से गठबंधन के कारण मुस्लिम नीतीश से ज्यादा सुरक्षित लालू के संरक्षण में खुद को पाते हैं।’
मुस्लिमों के पास लालू का विकल्प नहीं
90 के दशक से लालू यादव बिहार में मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण के सहारे अपनी सियासत करते आ रहे हैं। जातीय आधारित गणना के मुताबिक, बिहार में मुस्लिम आबादी लगभग 18 प्रतिशत और यादव आबादी लगभग 14 प्रतिशत है। इसके बाद भी उन्होंने हमेशा चुनाव में टिकट या पावर में हिस्सेदारी देने की बात हो तो यादवों को ही तवज्जो दिया है।
यही कारण है कि मुस्लिम समाज बिहार में लालू यादव के विकल्प की तलाश में जुट गया है। 2020 के विधानसभा चुनाव में RJD ने 17 मुस्लिम कैंडिडेट को विधानसभा का टिकट दिया था। इनमें मात्र 8 ही चुनाव जीतने में सफल हो पाए थे।
जबकि, बिहार की सबसे नई पार्टी में से एक AIMIM ने 16 मुस्लिम कैंडिडेट को उतारा था। इनमें 5 जीतने में सफल रहे थे। संकेत साफ है कि मुस्लिम बिहार में लालू का विकल्प तलाश रहे हैं।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट अरुण पांडेय बताते हैं, ’इस बार देखना दिलचस्प होगा कि मुस्लिम किस आधार पर वोट करते हैं। इस बार प्रशांत किशोर ने भी ऐलान कर दिया है कि वे 40 सीटों पर मुस्लिम कैंडिडेट को उतारेंगे। AIMIM पहले से ही मुकाबले में है। कांग्रेस अपनी मजबूत तैयारी कर रही है।
भाजपा के साथ रहते हुए नीतीश कुमार अपनी इमेज बचाकर रखे थे। तीन तलाक, सीएए पर उनका अलग स्टैंड रहता था। यही कारण है कि मुसलमानों का साथ नीतीश कुमार को मिलते रहा है। सत्ता में रहते हुए उन्होंने मुस्लिम वेलफेयर के कई काम किए हैं।’
CSDS-लोकनीति के पोस्ट-पोल सर्वे 2020 के मुताबिक, RJD और कांग्रेस वाले महागठबंधन को 75% मुस्लिमों ने वोट दिया। वहीं, BJP और JDU वाले NDA को 5% और चिराग पासवान की पार्टी LJP को 2% मुस्लिम वोट मिले।
10 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम विधायक कभी नहीं जीत पाए
बिहार विधानसभा में अब तक के हुए चुनाव में सबसे अधिक 10 फीसदी मुस्लिम विधायक दो बार जीत कर विधानसभा पहुंचे हैं। जबकि, बिहार विधानसभा की 243 में से 47 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर हार-जीत तय करते हैं। इनमें 10 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहां इनकी आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है।
सबसे अधिक 34 मुस्लिम विधायक 1985 के विधानसभा चुनाव में जीते थे। तब संयुक्त बिहार था। बिहार में विधानसभा की सीटों की संख्या 325 थी। इस हिसाब से ये कुल सीटों का 10 फीसदी हुआ। इसी तरह बिहार अलग होने के बाद 2015 में सबसे ज्यादा 24 विधायक विधानसभा पहुंचे थे। इस वक्त विधानसभा में सीटों की संख्या 243 है, तो इस हिसाब से भी मुस्लिम विधायकों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत ही होती है।







