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बिहार एनडीए की राजनीति के अंदरखाने वफादारी का सवाल!

UB India News by UB India News
February 21, 2025
in खास खबर, पटना, बिहार, ब्लॉग
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बिहार एनडीए की राजनीति के अंदरखाने वफादारी का सवाल!
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राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए कागज पर तो बहुत मजबूत दिख रहा है, लेकिन क्या वह जमीन पर भी उतनी ही मजबूत है?….वो सामने था तो कम कम दिखाई देता था, चला गया तो बराबर दिखाई देने लगा…निशान-ए-हिज्र (वियोग या अलगाव) भी है वस्ल (मिलाप) की निशानियों में, कहां का जख्म कहां पर दिखाई देने लगा… कुछ इतने गौर से देखा चराग जलता हुआ, कि मैं चराग के अंदर दिखाई देने लगा… शाहीन अब्बास की लिखी शायरी बिहार एनडीए की सियासत पर बिल्कुल सटीक बैठती है. दरअसल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समय-समय पर यू टर्न ने एनडीए की मजबूती को भी काफी चोट पहुंचाई है. हालांकि, फिर वह अब एनडीए को मजबूत करने में ही लगे हुए हैं. पाला बदलने का काम या फिर राजनीतिक अनिश्चितता का दौर लाने वाले नीतीश कुमार पहले नहीं हैं, बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे बड़े मौसम वैज्ञानिक (समय के अनुकूल सियासी फैसले लेने वाले) के तौर पर तो दिवंगत रामविलास पासवान जाने जाते रहे हैं. उन्होंने इस तरह की राजनीति की शुरुआत की थी. बाद में उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं ने भी इस राजनीतिक रणनीति में बखूबी अपना योगदान दिया.

दरअसल, चुनाव पूर्व गठबंधनों के बारे में तो आम जनता और मतदाता यह स्पष्ट तौर पर समझ जाते हैं कि उनकी पसंद कौन है और उन्हें किन्हें चुनना है. लेकिन, दोस्त, दोस्ती की आड़ में जब दुश्मनी करे और चुनाव बाद गठबंधन के साथी ही बदल ले तो उसके बारे में क्या कहेंगे. दिलचस्प तो तब की स्थिति होती है जब वही दोस्त सामने चुनौती बनकर खड़ा हो जाए. बिहार की राजनीति में चिराग पासवान इस भूमिका को बेहद सधे अंदाज में निभा चुके हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘हनुमान’ के तौर पर ख्याति प्राप्त चिराग पासवान ने 2020 के विधानसभा चुनाव में जो किया वह उसका सिरा इस तरह की राजनीति से भी जुड़ता है.

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पिता रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद चिराग पासवान ने स्वयं को नीतीश कुमार के सामने सीधी चुनौती के तौर पर प्रस्तुत करने की योजना बनाई. उन्होंने खुले तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना नेता घोषित किया और चुनाव में अकेले लड़ गए. मोटे तौर पर तो सबकी समझ में यह बात आ रही थी कि चिराग पासवान की स्ट्रैटेजी क्या है और इसके पीछे कौन है. अंत में जब चुनाव परिणाम आए तो इसका पूरा पॉलिटिकल सीन उभरकर सामने आ गया. जनता दल यूनाइटेड 43 सीटों पर आ गई. यहां यह बता दें कि 2005 में बिहार में भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन होने के बाद जदयू का सबसे निम्नतम प्रदर्शन था. जाहिर तौर पर चिराग अपने लक्ष्य में सफल रहे और उन्होंने जनता दल यूनाइटेड का को 20 से अधिक विधानसभा क्षेत्र में सीधा नुकसान पहुंचाया.

चिराग पासवान की रणनीति काबिले गौर इसलिए रही, क्योंकि नीतीश कुमार ने 2017 में जब यू टर्न लेकर फिर से बीजेपी के पाले में आने का फैसला किया, तब यह सब हुआ था. दरअसल, भाजपा और जदयू के कोर वोटर का एक तबका जेडीयू और नीतीश कुमार की दोस्ती से नाराज हुआ करते थे. निश्चित तौर पर जो नाराज मतदाता थे वह चिराग पासवान को एक विकल्प के तौर पर देखने लगे और इसका सीधा चुनाव चुनावी नुकसान नीतीश कुमार के जदयू को हुआ. जाहिर तौर पर जदयू में भी चिराग पासवान को लेकर नाराजगी बढ़ी, लेकिन वह एनडीए के हिस्सा रहे. नीतीश कुमार इस स्थिति को अधिक दिनों तक बर्दाश्त नहीं कर पाए और अपनी नाराजगी को एक और यू टर्न के जरिए मुकाम तक पहुंचा दिया. वर्ष 2022 में उन्होंने बीजेपी से नाता तोड़ा और वह राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन में आ गए और साथ सरकार बना ली.

इसके बाद तो जो हुआ वह राजनीतिक दृष्टि से बेहद ही दिलचस्प घटा. नीतीश कुमार ने डायरेक्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल लिया. यह सब इसलिए हो पाया कि उनके मन की महत्वाकांक्षाएं उबाल मरती रहीं कि एक न एक दिन वह भी देश के शीर्ष भूमिका में आएं. इंडिया ब्लॉक बनाने में नीतीश कुमार ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसके अगवा बने. वहीं, दूसरी ओर तेजस्वी यादव लगातार अपना रास्ता क्लियर करने के लिए बिहार में कोशिश करते रहे और नीतीश कुमार को दिल्ली की राजनीति में भेजने की के लिए प्रयासरत रहे. यह कुछ-कुछ वैसा ही था जब वर्ष 2013 में लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार को अपने पाले में किया था, और तेजस्वी यादव को उनके साथ लगाकर 2015 में डिप्टी सीएम बनवा दिया था.

इसके बाद तो नीतीश कुमार ने कई बयान तेजस्वी यादव के नेतृत्व को लेकर दिए और यह भी कहा कि बिहार का राजनीतिक भविष्य अब तेजस्वी के हाथों में है. लेकिन, सियासत का क्या कहिए…नीतीश कुमार को यह जल्दी ही एहसास हो गया कि इंडिया ब्लॉक में उनकी उम्मीदें पूरी नहीं होगीं. ऐसे में आने वाले समय में उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी खतरा है, क्योंकि लालू यादव और तेजस्वी यादव की निगाहें उसी कुर्सी की ओर देख रही हैं जिसपर वह काबिज हैं. दिलचस्प यह कि नीतीश कुमार ने जब यह कहा था कि- ”मर जाना कबूल है, लेकिन बीजेपी के साथ अब नहीं जाएंगे”… उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ ली और कहा-”गलती हो गई अब कभी नहीं जाएंगे, दोबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे”. वह बार-बार कहते हैं कि अब महागठबंधन के साथ नहीं जाएंगे.

खास बात यह कि नीतीश कुमार अपनी यह गलती अमूमन हर मंच पर दोहराते हैं और लगातार कहते हैं कि अब गलती नहीं करेंगे. अब जब दोबारा विधानसभा चुनाव बिहार में होने वाले हैं तो जेडीयू इस राजनीतिक अविश्वसनीयता को भली-भांति पहचानते हुए रणनीति अपना रही है. हाल में ही अमित शाह ने जब यह कहा था कि बिहार का मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह एनडीए का विधायक दल तय करेगा, तो निश्चित तौर पर उस पर राजनीति गरमाई. आनन-फानन में जेडीयू और बीजेपी, दोनों ओर से कोर्स करेक्शन किया गया और नीतीश कुमार को फेस घोषित किया गया. फिर बात एऩडीए की एकजुटता की उठी.

दरअसल, जेडीयू नेतृत्व को भी इस बात का भान है, लेकिन खुले तौर पर भला कोई कैसे स्वीकार करे कि भाजपा के कार्यकर्ता इस बार उनके साथ देंगे अथवा नहीं. जाहिर है इस बात का इजहार करना भी बड़ा खतरा है. ऐसे में जेडीयू और बीजेपी ने मिलकर रणनीति अपनाई. यही कारण है कि जेडीयू ने बीते 28 अक्टूबर को जब नीतीश कुमार ने सभी एनडीए सहयोगियों के राज्य और जिला अध्यक्षों के साथ अन्य नेताओं को अपने आवास पर बुलाया तो जेडीयू के राज्यसभा सांसद संजय झा ने इस योजना को अमलीजामा पहनाया. इस काम में डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने पूरे तौर पर समर्थन दिया.

एनडीए के दलों के कार्यकर्ताओं के बीच एकता की कवायद शुरू हो गई और यह योजना नए आयाम में बदल गई. संजय झा कुछ-कुछ पुराने दौर के ‘जॉर्ज फर्नांडिस’ की भूमिका निभाते हुए भाजपा नेताओं और छोटे सहयोगियों से संपर्क करने लगे. सभी को यह समझाने में सफल रहे कि अगर एनडीए 243 में से 225 सींटे जीतना चाहता है तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को एकजुट होना ही पड़ेगा. उन्होंने कहा, ”हम जमीन पर किसी भी गलतफहमी को बर्दाश्त नहीं कर सकते, चाहे जदयू हो बीजेपी हो या कोई अन्य दल”. संजय झा ने कहा, ”कार्यकर्ताओं को साथ काम करना ही पड़ेगा और इसके नतीजे भी अच्छे आएंगे.”

बस एनडीए इस नीति पर चल पड़ा और बीते दिसंबर में एक बड़ी योजना बनाई गई जिसमें 37 जिलों में संयुक्त कार्यकर्ता सम्मेलन को आयोजन करना था. सभी पांचो एनडीए सहयोगी दलों के राज्य अध्यक्ष हर सम्मेलन में उपस्थित रहते हैं. इस अभियान का पहला चरण बीते 15 जनवरी से पश्चिम चंपारण से शुरू हुआ, इसमें 10 जिलों को कवर किया गया. वर्तमान में इस सम्मेलन का चौथा चरण चल रहा है जिसमें खगड़िया, बेगूसराय के बाद नवादा को कवर किया जा रहा है. संजय झा ने के अनुसार, अंतिम चरण 28 फरवरी को बजट सत्र से बिहार विधानसभा के बजट सत्र से पहले पूरा होने की उम्मीद है.

2020 विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान के कारण जेडीयू को झटका लगा था. पर इस बार फुलप्रूफ तैयारी.

गौरतलब है कि इसके समानांतर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रगति यात्रा भी शुरू की है जिसमें वह पूरे राज्य को कवर कर रहे हैं. 21 फरवरी को इस यात्रा का समापन पटना में होने वाला है. संजय झा ने कहा, ”मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि एक ऐसे नेता की है, जिन्होंने राज्य को लालू युग के अंधकार से बाहर निकाला है. नीतीश जी न केवल यह बता रहे हैं कि उन्होंने क्या-क्या किया है, बल्कि वर्तमान योजनाओं का जायजा भी ले रहे हैं. वह यह भी बता रहे हैं कि जिलों में और क्या-क्या करने की आवश्यकता है.

नीतीश कुमार विकासवादी एजेंडे पर बढ़ रहे हैं. फुटओवर ब्रिज, सड़कें और नालियों जैसी योजनाओं को वह तुरंत स्वीकार कर रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उपलब्धियां को प्रदर्शित करने के लिए प्रगति यात्रा एक तरह से मंच बन गया है. अंत में यह कि गठबंधनों में बदलाव होते रहते हैं. दांव भी चले जाते हैं… लेकिन, नीतीश कुमार की यह यात्रा बिहार की राजनीति की अनिश्चितता को भी दर्शाती है. नीतीश कुमार खुद पर केंद्रित किए हुए हैं. जाहिर है एक बार पिर यहां वफादारियों की परीक्षा भी होनी है. लेकिन, यहां यह मान लेना चाहिए कि आपका सत्ता प्राप्त करना और बने रहना अंतिम लक्ष्य है.

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