जाति है कि जाती नहीं… बिहार के समाज और सूबे की सियासत के लिए इसे एक बड़ा सच माना जाता है. वहीं, कुछ दलों के संदर्भ में धर्म की राजनीति को भी चुनावी चश्मे से देखा जाता है. लेकिन, क्या यही सच है? हाल में एक सर्वे हुआ है जिसमें बहुत ही चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. इसको गहराई से जानेंगे तो जनता के मिजाज का पता चलता है. इससे यह भी पता लगता है कि राजनीतिक पार्टियां जनता को समझने में कहां चूक कर रहीं हैं. पार्टियां क्या सोच रहीं हैं और जनता क्या सोच रही है?
क्या जैसा राजनीतिक पार्टियां सोचती हैं उसी लाइन पर जनता भी सोचती है? राजनीतिक दल कैसे एक्ट कर रहे हैं और जमीन पर हालात कैसे हैं? क्या कारण होता है कि कहीं बहुत मतदान तो कहीं कम वोटिंग होती है? क्या जाति और धर्म का मुद्दा जनता के मन पर असर डालता है? अगर डालता है तो क्या वह वोटिंग का भी आधार होता है? क्या राजनीतिक विचारधारा बड़ी चीज है या फिर धनबल? ऐसे ही कई सवालों का खुलासा हुआ है जो काफी चौंकाने वाला है. दरअसल, लोकसभा चुनाव 2024 के बाद भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी द्वारा कराए गए नॉलेज एटीट्यूड एंड प्रैक्टिसेज इंडलाइन सर्वे 2024 यानी केएपी 2024 (KAP 2024) की सर्वेक्षण रिपोर्ट कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.
क्या जनता का मिजाज पढ़ पा रही हैं राजनीतिक पार्टियाां? –इस सर्वे के अनुसार, लोकसभा चुनाव के दौरान मात्र 4.2% मतदाताओं ने जाति देखकर वोटिंग की और 1.01% वोटरों ने धर्म को प्राथमिकता माना. वहीं, चौंकाने वाली बात यह है कि दलीय आस्था (राजनीतिक विचारधारा से जुड़ाव) से जुड़े समर्थक होने के कारण 32.02% मतदाताओं ने मतदान किया. जाहिर तौर पर इस सर्वे से जो तथ्य उभर कर सामने आए हैं इसके अनुसार, जाति और धर्म की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों से जनता का मिजाज पढ़ने में कुछ तो चूक हो रही है. इस सर्वेक्षण में यह पता लगा है कि 41.4% मतदाताओं ने मतदान का निर्णय अपने परिवार की राय के आधार पर किया. इसी सर्वे रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि 32.8 प्रतिशत मतदाताओं ने अच्छे प्रत्याशियों के कारण मतदान किया था. वहीं, 22.24 प्रतिशत मतदाताओं ने धनबल को अधिक मतदान के लिए प्रमुख कारण बताया. जबकि, 20.6% मतदाताओं का मानना था कि मतदान के महत्व के प्रति अधिक जागरूक होने के कारण उन्होंने वोटिंग की.
इन कारणों से वोटिंग से दूर रहे मतदाता
केएपी 2024 के सर्वे में मतदाताओं से पिछले चुनाव में मतदान नहीं करने पर जब पूछा गया तो इसके भी कई कारण सामने आए. इनमें सबसे बड़ा कारण मतदान के समय वह अपने निर्वाचन क्षेत्र में नहीं थे, ऐसा कहने वालों की संख्या 30.01% रही. इसके अतिरिक्त 26.1% मतदाता ऐसे रहे जिन्होंने यह बताया कि उनके पास मतदाता पहचान पत्र नहीं था. जबकि, 11.2 प्रतिशत मतदाताओं का कहना रहा कि उनका नाम मतदाता सूची में शामिल ही नहीं था, इसलिए वोट नहीं दे पाए.
चुनाव आयोग ने सर्वे का यह पैटर्न अपनाया
यहां यह भी बता दें कि केएपी इंडलाइन सर्वेक्षण में 60, 000 प्रत्याशियों को शामिल किया गया था. जानकारी के अनुसार प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के दो सबसे अधिक मतदान वाले बूथ और दो सबसे कम मतदान वाले बूथों के मतदाताओं को इस सर्वेक्षण में शामिल किया गया. हर बूथ पर 60 प्रतिभागियों को सर्वेक्षण का हिस्सा बनाया गया. सर्वेक्षण पूरी तरह से आंतरिक था और इसमें निर्वाचन विभाग के पदाधिकारी ही शामिल किए गए थे. जाहिर तौर पर इसकी विश्वसनीयता को लेकर भी इत्मिनान हुआ जा सकता है.







