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बिहार के 42वें राज्यपाल बने आरिफ मोहम्मद खान, मुख्य न्यायाधीश दिलाएं शपथ

UB India News by UB India News
January 3, 2025
in खास खबर, पटना, राजभवन
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बिहार के 42वें राज्यपाल बने आरिफ मोहम्मद खान, मुख्य न्यायाधीश दिलाएं शपथ
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बिहार के नए राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान आज (02 जनवरी, 2025) पद और गोपनीयता की शपथ लिए. पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश उन्हें शपथ दिलवाएं. आरिफ मोहम्मद खान 30 दिसंबर को पटना पहुंचे थे. 24 दिसंबर 2024 को केंद्र सरकार ने बिहार समेत कई अन्य राज्यों के राज्यपाल बदले थे. केरल के राज्यपाल की जिम्मेदारी संभाल रहे आरिफ मोहम्मद खान को अब बिहार की जिम्मेदारी मिली है. बिहार के राज्यपाल रहे राजेंद्र आर्लेकर को केरल की जिम्मेदारी मिली है. आरिफ मोहम्मद खान बिहार के 42वें गर्वनर होंगे.

कौन हैं आरिफ मोहम्मद खान?

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आरिफ मोहम्मद खान का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के बरवाला गांव में हुआ था. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी. यहीं छात्र राजनीति से ही उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई. सबसे पहले वे एएमयू में महासचिव बने, जिसके बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अध्यक्ष भी बने. 26 साल की उम्र में उन्होंने 1977 में कांग्रेस की टिकट पर बुलंदशहर की सियाना सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा. 1980 वे कानपुर से सांसद भी चुने गए. 8वीं, 9वीं और 12वीं लोकसभा के दौरान वे भी बहराईच सीट से संसद पहुंचे.

बिहार को 26 साल बाद कोई मुस्लिम राज्यपाल मिला है. आरिफ मोहम्मद खान से पहले एआर किदवई 14 अगस्त 1993 से 26 अप्रैल 1998 तक बिहार के राज्यपाल रहे थे. वे भी उत्तर प्रदेश के ही रहने वाले थे.

सीएम नीतीश और तेजस्वी ने की मुलाकात

31 दिसंबर 2024 को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से शिष्टाचार भेंट करने के लिए पहुंचे थे. 01 जनवरी को 2025 को नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी राज्यपाल से मुलाकात करने पहुंचे थे. इसके बाद राज्यपाल ने भी नव वर्ष पर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी से मुलाकात की थी. राबड़ी देवी, लालू यादव और तेजस्वी यादव ने उनका स्वागत किया था और नववर्ष की बधाई दी थी.

बिहार के नवनियुक्त राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान पटना पहुंचते ही फार्म में आ गए हैं। पुराने दोस्तों से मिल रहे हैं। सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के साथ बेहतर तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। केरल में राज्य सरकार से उनकी जैसी तनातनी रही, बिहार में उनके वैसे रुख की स्थिति नहीं है। इसलिए कि बिहार में एनडीए की सरकार है। एनडीए की ही केंद्र सरकार ने उन्हें नियुक्त भी किया है। इसलिए यहां वैसे टकराव की आशंका नहीं है। प्रतिपक्ष को भी वे समान रूप से साध रहे हैं।

अश्विनी चौबे, नेयाज और राबड़ी से मिले

पटना पहुंचने पर राज्यपाल भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे के घर गए और भोजन किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नववर्ष पर राज्यपाल से मुलाकात की। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव राज्यपाल से मिले तो वे भी राबड़ी देवी को जन्मदिन का मुबारकबाद देने बेझिझक राबड़ी देवी के आवास पहुंच गए। वहां लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी से उन्होंने मुलाकात की। और तो और, राज्यपाल इससे पहले फुलवारी शरीफ में अपने दशकों पुराने सहपाठी नेयाज अहमद से मिलने उनके घर पहुंच गए। बकौल नेयाज अहमद यह कृष्ण-सुदामा के मिलन जैसा रहा। यह आरिफ मोहम्मद खान का उदारवादी चेहरा है, जिसके लिए उनकी ख्याति भी रही है।

राज्यपाल की सहजता के मायने क्या?

राज्यपाल खान के बिहार में कामकाज के अंदाज का यह ट्रेलर है। बिहार में राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की जगह आरिफ मोहम्मद खान की नियुक्ति क्यों हुई, यह गुत्थी अब भी अनसुलझी है। इतना तो तय ही माना जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर भाजपा या एनडीए के हित में ही वे काम करेंगे, पर किस रूप में वे भाजपा या एनडीए के लिए कारगर होंगे, उनके शुरुआती अंदाज से इस नतीजे पर पहुंचने के लिए बिहार में अब भी माथापच्ची जारी है। अनुमान लगाने में सियासत की समझ रखने वाले भी असमर्थ दिख रहे हैं।

कहीं राष्ट्रपति शासन की तैयारी तो नहीं!

वैसे यह हाइपोथेटिकल सवाल है। इसलिए इसका जवाब भी हाइपोथेटिकल ही होगा। नीतीश कुमार का अभी भाजपा के प्रति जैसा रुख दिखाई दे रहा है, उससे यही संकेत मिलता है कि एनडीए सरकार कंफर्ट स्थिति में नहीं है। नीतीश कुमार जिस तरह अचानक चौंकाने वाले फैसले के लिए जाने जाते हैं, उससे खतरा और अधिक दिखता है। भाजपा से वर्षों पुराना रिश्ता झटके में उन्होंने 2013 में तोड़ लिया था। 2014 के संसदीय चुनाव में अकेले वे उतर गए थे। 2015 में उन्होंने डूब चुके आरजेडी को साथ लेकर उबार दिया। उसके बाद भी 2017, 2022 और 2024 में उन्होंने सीएम की कुर्सी की सलामती के लिए कभी आरजेडी तो कभी भाजपा से हाथ मिलाया।

अगर फिर नीतीश ने लिया चौंकाने वाला फैसला तो…

ऐसे में नीतीश कुमार फिर कोई चौंकाने वाला फैसला ले लें तो आश्चर्य नहीं। ऐसा हुआ तो यहां राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। राजनीतिक अस्थिरता का हवाला देकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थिति बन सकती है। भाजपा बचे आठ-नौ महीनों के लिए सरकार बनाने की माथापच्ची के बजाय राष्ट्रपति शासन ही पसंद करेगी। तब राज्यपाल का यह उदारवादी चेहरा भाजपा के काम आएगा, जिसका परिचय उन्होंने आते ही बिना भेदभाव लोगों से मिल कर दे दिया है।

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