क्या आपको पता है भारत में काम करते हुए किसी भारतीय को आखिरी बार साइंस में नोबेल प्राइज कब मिला था? पूरे 94 साल पहले 1930 में सीवी रमन को फिजिक्स में नोबेल प्राइज मिला था और यह आज भी भारत में काम करने वाले किसी भारतीय को मिला इकलौता नोबेल प्राइज है.
हालांकि, उसके बाद तीन और भारतीय मूल के वैज्ञानिकों को नोबेल प्राइज मिला है. 1968 में हरगोविंद खुराना को मेजिसिन में, 1983 में सुब्रमण्यम चंद्रशेखर को फिजिक्स में और 2009 में वेंकटरामन रामकृष्णन को केमिस्ट्री में मिला. लेकिन, ये तीनों ही साइंटिस्ट अपना काम भारत से बाहर रहकर कर रहे थे और जब उन्हें नोबेल प्राइज मिला, तब वह भारतीय नागरिक भी नहीं थे.
क्या भारत में काम करते हुए कोई भारतीय नोमिनेट भी नहीं हुआ?
ऐसा नहीं है कि भारत से कोई वैज्ञानिक नोबेल प्राइज के लिए नॉमिनेट ही नहीं किया गया. कई वैज्ञानिकों का नाम नोबेल के लिए नोमिनेट किया गया, मगर किसी कारणवश उन्हें नोबेल के लिए चुना नहीं गया. जैसे कि मेघनाद साहा, होमी भाभा, सत्येंद्र नाथ बोस और भी कई. कुछ तो ऐसे भी थे जिन्होंने बहुत बड़ी खोजें कीं लेकिन उन्हें नॉमिनेट ही नहीं किया गया.
नोबेल प्राइज के लिए जिन लोगों को नॉमिनेट किया जाता है, उनके नाम 50 साल तक गुप्त रखे जाते हैं. अभी तक फिजिक्स और केमिस्ट्री के लिए 1970 तक के नॉमिनेशन की जानकारी है, जबकि मेडिसिन के लिए सिर्फ 1953 तक की. अब तक जितने लोगों की लिस्ट सामने आई है, उसके मुताबिक करीब 35 भारतीयों को नोबेल के लिए नॉमिनेट किया गया है.
ऐसा नहीं है कि किसी को भी नोबेल के लिए नॉमिनेट कर दिया जाता है. हर साल कुछ खास लोगों को ही यह मौका मिलता है, जैसे कि यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर, साइंटिस्ट और पुराने नोबेल विनर. अगर किसी साइंटिस्ट को नॉमिनेट किया गया है तो इसका मतलब है कि उन्होंने कुछ बड़ी खोज की है और कुछ वैज्ञानिकों ने नोबेल लायक माना है.
नोबेल प्राइज क्यों नहीं जीत पा रहा भारत?
यह सवाल जायज है कि जब भारत में टैलेंट की कोई कमी नहीं है फिर भी साइंस में नोबेल प्राइज क्यों नहीं मिल रहा? इसकी एक नहीं, कई वजह हो सकती हैं. एक बड़ी वजह फंडिंग भी हो सकती है. क्योंकि रिसर्च के लिए काफी फंडिंग की जरूरत होती है. रिसर्च के लिए नई मशीनें खरीदने, लैब बनाने और वैज्ञानिकों को तनख्वाह में अच्छा खासा खर्च होता है. प्राइवेट कंपनियां भी रिसर्च में पैसा लगाने से डरती हैं.
बीते दस सालों में GDP का सिर्फ 0.6-0.8% हिस्सा ही रिसर्च पर खर्च किया गया है. यह ब्राजील, रूस, चीन और साउथ अफ्रीका जैसे देशों से भी काफी कम है. साल 2005 में जहां रिसर्च पर जीडीपी का 0.82% खर्च होता था, वहां 2023 में यह घटकर 0.64% रह गया है. मतलब कि रिसर्च के लिए पैसा और भी कम हो गया है.
सिर्फ पैसा और सुविधाएं ही काफी नहीं!
एक सच यह भी है कि नोबेल प्राइज में अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिकों का ही ज्यादातर दबदबा है. वहां रिसर्च के लिए ज्यादा पैसा और अच्छी सुविधाएं हैं. भारत में ऐसा नहीं है. एक खास बात यह है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री और मेडिसिन में नोबेल प्राइज जीतने वाले 653 लोगों में से 150 से ज्यादा यहूदी हैं. लेकिन इजरायल जिसे यहूदियों का देश माना जाता है, उसने सिर्फ चार ही नोबेल प्राइज जीते हैं. ये सभी नोबेल केमिस्ट्री में हैं.
चीन और इजरायल जैसे देश तो रिसर्च में बहुत पैसा लगाते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने बहुत कम नोबेल प्राइज जीते हैं. इजरायल में तो रिसर्च के लिए सब कुछ है- पैसा, सुविधाएं और टैलेंट. फिर भी वो नोबेल प्राइज क्यों नहीं जीत पा रहा? यह एक सोचने वाली बात है.
इससे यह पता चलता है कि सिर्फ पैसा और सुविधाएं ही काफी नहीं हैं. नोबेल प्राइज़ जीतने के लिए कुछ और भी चाहिए होता है, जैसे कि नए आइडिया, रचनात्मक सोच, और जोखिम लेने की हिम्मत.
रिसर्च में कम, अपना करियर चमकाने में लगे हैं वैज्ञानिक?
एक वजह यह भी मानी जाती है कि कई वैज्ञानिक अपना समय रिसर्च में कम और अपनी तरक्की में ज्यादा लगाते हैं. उन्हें नोबेल प्राइज से ज्यादा पद्म श्री या भारत रत्न जैसे प्राइज चाहिए होते हैं.
वहीं कई वैज्ञानिक तो ऐसे टॉपिक पर रिसर्च करते हैं जो पुराने हो चुके हैं या फिर भारत के लिए जरूरी ही नहीं हैं. कई बार अमेरिका या यूरोप में फेल हो चुके एक्सपेरिमेंट को ही भारत में दोहराते रहते हैं. जैसे कि पानी और खेती की टेक्नोलॉजी पर ध्यान देने की बजाय ‘हाई-एनर्जी पार्टिकल एक्सिलरेटर’ या ‘न्यूक्लियर फ्यूजन’ जैसे मुश्किल प्रोजेक्ट में लगे रहते हैं.
यानी भारत में रिसर्च तो बहुत होती है लेकिन उसका कोई फायदा नहीं होता. नोबेल प्राइज़ तो दूर की बात है, कई बार तो उस रिसर्च का कोई मतलब ही नहीं निकलता. कोरोना के समय में भी प्राइवेट कंपनियों ने वैक्सीन बनाकर सबको हैरान कर दिया था. सरकारी लैब पीछे ही रह गईं थी. इससे यह साबित होता है कि सरकारी रिसर्च इंस्टीट्यूट काफी पीछे हैं.
कुछ अनोखी रिसर्च के लिए सही दिशा बहुत जरूरी है. उन्हें ऐसे टॉपिक पर काम करना होगा जो भारत के लिए जरूरी हैं, जैसे कि पानी की समस्या, खेती की समस्या और बीमारियों का इलाज. तभी उनकी रिसर्च से देश को फायदा होगा और शायद नोबेल प्राइज भी मिल सकेगा.
भारत में रिसर्च का माहौल भी जिम्मेदार है?
कई बार ऐसा होता है कि हमारे वैज्ञानिक विदेश में तो बहुत अच्छी पढ़ाई करके आते हैं, लेकिन भारत आकर कुछ खास नहीं कर पाते. इसकी वजह है भारत में रिसर्च का माहौल.
भारत में रिसर्च का माहौल कुछ खास अच्छा नहीं है. यहां ज्यादातर रिसर्च पेपर लिखने और प्रमोशन पाने की होड़ लगी रहती है. नई खोज या आविष्कार करने की कोशिश बहुत कम की जाती है. इस माहौल में विदेश से पढ़कर आने वाले वैज्ञानिक भी फंस जाते हैं और अपना टैलेंट नहीं दिखा पाते. नई खोजें करने और नए आविष्कार करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना जरूरी है. उन्हें अच्छी तनख्वाह और सुविधाएं देनी होंगी ताकि वो अपना पूरा ध्यान रिसर्च में लगा सकें.
वैज्ञानिकों को उनके काम का पूरा क्रेडिट नहीं मिलता?
कई बार ऐसा भी होता है कि हमारे वैज्ञानिक बहुत बड़ा काम करते हैं, लेकिन उन्हें नोबेल प्राइज नहीं मिलता. हमारे वैज्ञानिकों को उनके काम का पूरा क्रेडिट नहीं मिलता और इससे उनका मनोबल नहीं टूट जाता है. ऐसे कुछ भारतीय वैज्ञानिक हैं-
जगदीश चंद्र बोस: इन्होंने 1895 में ही ‘वायरलेस कम्युनिकेशन’ का आविष्कार कर दिया था. लेकिन उन्हें नोबेल नहीं मिला. 1909 में यह नोबेल गुग्लिल्मो मार्कोनी और फर्डिनेंड ब्राउन को मिल गया, जबकि उन्होंने वही काम किया था जो पहले जगदीश चंद्र बोस ने पहले ही कर दिया था.
केएस कृष्णन: इन्होंने सीवी रमन के साथ मिलकर ‘रमन स्कैटरिंग इफेक्ट’ की खोज की थी. रमन को तो इसके लिए नोबेल मिल गया, लेकिन केएस कृष्णन को नहीं मिला.
ईसीजी सुदर्शन: साल 1979 और 2005 में फिजिक्स का नोबेल प्राइज ऐसे काम के लिए दिया गया जिसमें सबसे जरूरी योगदान तो ईसीजी सुदर्शन का था. लेकिन उन्हें नोबेल नहीं मिला. सुदर्शन ने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरेक्शन पर काम किया था.
जापान है सबसे आगे!
एशिया, अफ्रीका और साउथ अमेरिका के वैज्ञानिकों ने बहुत कम नोबेल प्राइज जीते हैं. फिजिक्स में 227 में से सिर्फ 13, केमिस्ट्री में 197 में से सिर्फ 15 और मेडिसिन में 229 में से सिर्फ 7 नोबेल प्राइज इन तीन महाद्वीपों के वैज्ञानिकों को मिले हैं. अमेरिका और यूरोप के अलावा सिर्फ 9 देशों के वैज्ञानिकों ने साइंस में नोबेल प्राइज जीता है. इनमें सबसे ज्यादा नोबेल जापान के वैज्ञानिकों ने जीते हैं.
कई बार यह भी कहा जाता है कि नोबेल प्राइज देने में भेदभाव होता है. लेकिन यह सच है कि अमेरिका और यूरोप में रिसर्च का माहौल बहुत अच्छा है और इसलिए वहाँ के वैज्ञानिक ज्यादा नोबेल प्राइज जीतते हैं.






