बीजेपी की सिफारिश पर वक्फ संशोधन विधेयक 2024 लोकसभा में पास कराने की बजाय ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) को भेज दिया गया. अगले ही दिन शुक्रवार (9 अगस्त) को 31 सदस्यों वाली जेपीसी भी गठित कर दी गई. हालांकि, बड़ा सवाल इस विधेयक के जेपीसी में भेजने को लेकर ये उठ रहा है कि क्या यह मोदी सरकार की कोई रणनीति है या मजबूरी?
पहले की सरकारों में विधेयकों को संसद की विभिन्न समितियों को भेजना आम बात थी. लेकिन मोदी सरकार के पहले दो कार्यकाल में ऐसा कम ही हुआ है. कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय में ज्यादातर विधेयक संसदीय समितियों को भेजे जाते थे.
PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, 17वीं लोकसभा में सिर्फ 16% विधेयक समितियों को भेजे गए. 16वीं लोकसभा में 25% विधेयक समितियों को गए. यह प्रतिशत पहले के मुकाबले काफी कम है.
यूपीए सरकार के समय 14वीं लोकसभा में 60% और 15वीं लोकसभा में 71% बिल संसदीय समितियों को भेजे गए. मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में सिर्फ 4 बिल ही संसद की ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी को भेजे गए. PRS के आंकड़ों के अनुसार, आधी समितियों ने 115 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट दे दी.
पहले जानिए वक्फ बिल पर क्या है विवाद
अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री किरेन रिजिजू ने गुरुवार (8 अगस्त) को वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 लोकसभा में पेश किया. इस विधेयक में मौजूदा वक्फ अधिनियम 1995 में करीब 40 संशोधन और कई भाग खत्म करने का प्रस्ताव है. इस अधिनियम में आखिरी बार साल 2013 में संशोधन किया गया था.
कांग्रेस, सपा, टीएमसी, डीएमके समेत तमाम विपक्षी दलों ने वक्फ (संशोधन) विधेयक का विरोध किया. विपक्ष ने आरोप लगाते हुए कि सरकार कम्युनिटीज के बीच में विवाद पैदा करना चाहती है. इस बिल को लाकर सरकार देश को जोड़ने का नहीं, बल्कि बांटने का काम कर रही है. यह आर्टिकल 30 का सीधा उल्लंघन है, संघीय व्यवस्था पर हमला है.
वहीं सरकार का कहना है कि इस विधेयक के जरिए वक्फ बोर्ड को मिली असीमित शक्तियों पर अंकुश लगाकर बेहतर और पारदर्शी तरीके से प्रबंधन किया जाएगा. अभी वक्फ बोर्ड के पास किसी भी जमीन को अपनी संपत्ति घोषित करने की पावर है. ये बिल पारित होने के बाद जमीन पर दावे से पहले उसका वेरिफिकेशन करना होगा. इससे बोर्ड की एकतरफा मनमानी पर रोक लगेगी.
क्या होती है JPC और उसकी शक्तियां?
संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) संसद की एक विशेष समिति होती है जिसे किसी खास विषय या बिल की गहन जांच करने के लिए बनाया जाता है. इस समिति में सभी राजनीतिक पार्टियों की समान भागीदारी होती है. समिति में लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के सदस्य होते हैं.
JPC किसी भी व्यक्ति को गवाह के तौर पर बुला सकती है और उससे जानकारी या दस्तावेज मांग सकती है. अगर कोई गवाह समिति के बुलावे पर नहीं आता है, तो यह संसद की अवमानना माना जाता है. आम तौर पर संसदीय समितियों की कार्यवाही गोपनीय होती है. लेकिन अगर शेयर बाजार या बैंकिंग से जुड़ी कोई गड़बड़ी हो, तो समिति चाहे तो अध्यक्ष की अनुमति पर मीडिया को अपनी जांच के बारे में बता सकती है.
आम तौर पर JPC मंत्रियों को गवाही के लिए नहीं बुलाती है. लेकिन शेयर बाजार या बैंकिंग से जुड़ी गड़बड़ी की जांच में अध्यक्ष की अनुमति से जेपीसी मंत्रियों से कुछ सवाल पूछ सकती है. अगर इस बारे में कोई विवाद होता है, तो अंतिम फैसला समिति के अध्यक्ष का होता है. जेपीसी कोई अदालत नहीं है और इसे सजा देने का अधिकार नहीं है. इसका काम सिर्फ जांच करना और संसद को अपनी रिपोर्ट देना होता है. सरकार इस रिपोर्ट पर अमल करे या न करे, यह उस पर निर्भर करता है.
वक्फ बिल JPC को भेजना बीजेपी की मजबूरी?
एबीपी न्यूज ने इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार से बातचीत की. उन्होंने बताया, ‘बीजेपी का वक्फ बोर्ड में संशोधन विधेयक लाने का मकसद इसे मजबूत करना नहीं बल्कि कमजोर करना था. इससे ज्यादा इस बिल के फैसले पर प्रतिक्रियाओं का राजनीतिक इस्तेमाल करना उनका मकसद था. तीन तलाक बिल पारित होने के बाद बीजेपी को कोई राजनीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं. लेकिन वक्फ विधेयक को पारित कराने की बजाए लंबित रखा जाता है तो मुसलमानों को भड़काकर हिंदुओं को सहलाने की राजनीति बनी रहती है. ये बिल का सबसे बड़ा कारण है और तलवार लटकी रहे कि हम ऐसा कर सकते हैं.’
“लोकसभा में बहुमत सरकार के पास दिखता है लेकिन वास्तव है या नहीं, इसका परीक्षण अबतक नहीं हो पाया है. ये तरीके से बहुमत परीक्षण का वक्त था. लेकिन बीजेपी नहीं चाहती कि ऐसी नौबत आए. दूसरा बिल पर एनडीए घटक दलों में सहमति नहीं है. तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने कहा था कि अगर जेपीसी को भेजा जाता है तो वह समर्थन करेंगे. टीडीपी की सलाह को मानते हुए जेपीसी का गठन किया गया है. किसी विपक्षी दल ने जेपीसी की मांग नहीं की थी.”
वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार ने आगे कहा, “जेडीयू से ललन सिंह ने जरूर वक्फ बोर्ड के खिलाफ और बीजेपी की लाइन के साथ लोकसभा में भाषण दिया. लेकिन ललन सिंह की लाइन नीतीश कुमार की लाइन नहीं है. अभी बीजेपी ने दिखाया सभी घटक दल उसके साथ हैं लेकिन जब परीक्षण का समय आता तो उनके लिए बिल के पक्ष में वोट देना मुश्किल हो सकता था.”
हालांकि संसदीय मंत्री किरण रिजिजू ने संसद में कहा कि कई विपक्षी सांसद इस बिल के समर्थन में हैं. लेकिन पार्टी की विचारधारा के कारण खुलकर नहीं बोल सकते. इस पर अमित शाह ने बीच में बोला कि सांसदों का नाम नहीं बताना… ये सुन सभी हंस पड़े.
JDU, LJP, TDP को मुस्लिम वोट बैंक खोने का डर नहीं?
लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी का मुस्लिम वोट बैंक कम होता दिखा है. लेकिन जेडीयू, एलजेपी और टीडीपी को तो मुस्लिम वर्ग समर्थन करता है, तो क्या वक्फ संशोधन बिल का समर्थन करके उन्हें अपना वोट बैंक खोने का डर नहीं है. इस पर वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार ने कहा, जेडीयू से ललन सिंह ने बिल का भले ही समर्थन किया है, लेकिन पार्टी की पॉलिसी पर खामौशी रहे. मुस्लिम अपेक्षा रखते हैं कि जेडीयू उनकी आवाज को बुलंद रखेगा.
“हालांकि एलजेपी चीफ चिराग पासवान ऐसे मुद्दों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लेते हैं. वह मुस्लिम वोट बैंक पर डिपेंड भी नहीं रहते. वह बीजेपी की तरह ही दलित + स्वर्ण को जीतने की कोशिश करते हैं.”
प्रेम कुमार का ये भी कहना है कि अब सरकार की मनमानी नहीं चल सकती. बिल लाने का उनका ही निर्णय था और जेपीसी को भेजने का भी उनका ही फैसला था. जबकि विपक्ष इस बिल को जेपीसी में भेजने की मांग नहीं कर रहा था.
क्या हो सकती है बीजेपी की रणनीति?
एबीपी न्यूज ने वरिष्ठ पत्रकार विष्णु शर्मा से भी बातचीत की. उन्होंने कहा, बीजेपी पर अक्सर हिंदूवादी पार्टी का आरोप लगता है और एंटी मुस्लिम कहा जाता है. जबकि बीजेपी का नारा है ‘सबका साथ सबका विकास’. बीजेपी इस एंटी मुस्लिम वाली छवि से दूर रहने की कोशिश करती है. लेकिन असल में ऐसा हो नहीं पाता है. इसलिए बीजेपी मुस्लिम समाज के बड़े-बड़े ठेकेदारों को खुश करने की बजाए छोटे तबके के मुस्लिम समाज की समस्याओं को समझकर उनको हल करने की कोशिश करती है.
वरिष्ठ पत्रकार विष्णु शर्मा ने उदाहरण देते हुए बताया कि वक्फ बिल बीजेपी अचानक लेकर नहीं आई. इस पर बीजेपी पिछले कई सालों से काम कर रही है. साल 2018 में मोदी सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय ने AMU को यूपी, बिहार, दिल्ली और उत्तराखंड में वक्फ संपत्तियों का जीपीएस सर्वे कराने की जिम्मेदारी सौंपी थी. तब एएमयू की ओर से जिला अधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मदद से करीब 88 हजार संपत्तियों का सर्वे किया गया. सर्वे में पाया गया कि वक्फ की ज्यादातर जमीन पर कब्जा कर बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर ली गई हैं. भारत की आजादी के बाद पहली बार इस तरह का सर्वे हुआ था. एएमयू के छात्र चाहते तो विरोध कर सकते थे. लेकिन उन्हें लगा कि इससे मुस्लिम समाज का कहीं न कहीं फायदा है.
“बीजेपी खुद को एंटी मुस्लिम नहीं दिखाना चाहती है. वह सिर्फ तुष्टीकरण के खिलाफ है. इसलिए बीजेपी ये मैसेज देने की कोशिश करती है कि ये हम नहीं कर रहे हैं, बल्कि मुसलमान कर रहे हैं. इसलिए बीजेपी से संदेश देना चाहती है कि हमने अपनी मनमानी नहीं की, हमसे सबसे चर्चा के बाद ही ये बिल पारित किया. ये हो सकता है कि जेडीयू-टीडीपी बिल से सहमत न हो, लेकिन ऐसा बहुत कम मुमकिन है.”
वरिष्ठ पत्रकार विष्णु शर्मा ने कहा, ‘JPC में भी बीजेपी का ही ज्यादा दबदबा रहेगा. लेकिन ये मैसेज विदेशों तक जाएगा कि चर्चा के बाद ही बिल की कुछ खामियां ठीक करके पारित किया गया. बीजेपी चाहती तो राम मंदिर पर भी बिल लाकर बना सकती थी, लेकिन उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रास्ता चुना.’
लोकसभा में पास होकर भी राज्यसभा में अटक जाता बिल?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार ने कहा, ‘राज्यसभा में बीजेपी के पास निश्चित रूप से बहुमत नहीं है. अब पहले वाली स्थिति भी नहीं है. पहले जगन मोहन रेड्डी को मनाकर समर्थन ले लिया करते थे. बीजेडी का खुद से समर्थन मिल जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. बीजेपी आज राज्यसभा में भी बिल पास कराने में सक्षम नहीं है. अब राज्यसभा के उपसभापति के खिलाफ महाभियोग का खतरा भी मंडरा रहा है. इसलिए सभी दलों की सहमति से ही बिल लाना सरकार के लिए जरूरी हो गया है. ये एक बड़ा बदलाव है.’
वहीं इस पर वरिष्ठ पत्रकार विष्णु शर्मा का कहना है कि राज्यसभा मुद्दा नहीं है क्योंकि अगर बहुमत न होना मुद्दा होता तो ऐसे राज्यसभा में कोई भी बिल पास नहीं होगा और राज्यसभा में कोई भी बिल पास न होने का मतलब है फिर तो सरकार गिरेगी. एक भी बिल गिरता है तो विपक्ष अविश्वासमत प्रस्ताव आ जाएगा.
क्या है राज्यसभा का गणित
245 सीटों वाली राज्यसभा में वर्तमान में 225 सांसद हैं जहां बिल पास कराने के लिए कम से कम 113 सीटों की जरूरत होती. एनडीए के पास अभी 110 ही सीटें है. एनडीए सरकार पहले YSR कांग्रेस और बीजेडी के सहारे बिल पास कराती रही है. राज्यसभा में वाईएसआर के 11 सांसद और बीजेडी के 8 सांसद हैं. मगर इस बार दोनों दलों ने खुलकर विरोध किया है.
अगले महीने 3 सितंबर को राज्यसभा की 12 खाली सीटों (9 राज्य) पर चुनाव होना है. इनमें से 10 सीटें सदस्यों के लोकसभा चुनाव जीत जाने के बाद खाली हुई हैं. इनके अलावा तेलंगाना से केशव राव और ओडिशा से ममता मोहंता के इस्तीफा देने के कारण खाली हैं. माना जा रहा है कि इन 12 में से एनडीए को कम से कम 10 सीटों पर जीत मिल सकती है. इतना ही नहीं राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत होने वाले 6 सांसदों के पद अभी खाली हैं. ये सभी पद भरे जाने के बाद राज्यसभा में एनडीए की संख्या 125 पार कर सकती है.







