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सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी को न केवल 5 सीटों का नुकसान हुआ बल्कि वोट शेयर 5.5% गिरा

UB India News by UB India News
June 12, 2024
in पटना, भाजपा
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सम्राट चौधरी को मिली बिहार बीजेपी की कमान
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23 मार्च 2023। तब विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष सम्राट चौधरी को अचानक प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बीजेपी नेतृत्व ने सबको चौका दिया था। सामने लोकसभा का चुनाव था। चौधरी के सामने दो बड़े लक्ष्य थे।

पहला- नीतीश कुमार की जदयू से गठबंधन के बिना राज्य में पार्टी को अपने बूते खड़ा करना।

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दूसरा- नीतीश कुमार से नाराज लव-कुश समीकरण के एक धड़े कुशवाहा को अपने पाले में लाना।

आज जब लोकसभा चुनाव के नतीजे सबके सामने हैं। बिहार के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि सम्राट चौधरी लव-कुश समीकरण बनाने में लगभग फेल रहे। इसके साथ ही बीजेपी का बिहार में जातियों का एक और प्रयोग असफल रहा। सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी को न केवल 5 सीटों का नुकसान हुआ है, बल्कि वोट शेयर में करीब 5.5 प्रतिशत की गिरावट हुई।

अब तीन पॉइंट में समझिए कैसे फेल हुए सम्राट चौधरी

1. नीतीश के साथ गठबंधन मजबूरी बनी

पॉलिटिकल एक्सपर्ट की माने तो समय रहते बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व इस बात को भांप गया था कि बिना नीतीश के लोकसभा चुनाव में स्थिति अच्छी नहीं रहने वाली है। यही कारण है कि नीतीश कुमार के लिए बीजेपी का दरवाजा हमेशा के लिए बंद करने की घोषणा के बावजूद चुनाव से ठीक पहले एनडीए का दरवाजा खुल दिया गया और बिहार में एनडीए गठबंधन की सरकार बनी।

2. कुशवाहा का भरोसा सम्राट नहीं, लालू बने

चुनाव से पहले जातीय गणना की रिपोर्ट के बाद ये बात जाहिर हो गई थी कि बिहार में कुशवाहा जाति एक बड़ी शक्ति है और चुनाव में यादव के बाद एक बड़ी भूमिका अदा कर सकती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में इनकी आबादी 4.21 प्रतिशत है। रिपोर्ट में इनकी संख्या करीब 55 लाख बताई गई है।

यही कारण है कि बीजेपी ने सम्राट चौधरी के साथ साथ उपेंद्र कुशवाहा को भी अपने पाले में लाई, लेकिन इसके बाद भी चुनावी आंकड़े बता रहे हैं कि कुशवाहा वोटर्स इस बार एनडीए से ज्यादा लालू के साथ खड़े रहे हैं। 2005 के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि लालू यादव बिहार के लव-कुश (कोइरी-कुर्मी) वोटर्स में सेंधमारी करने में कामयाब रहे।

3. प्रदेश अध्यक्ष रहते एक भी कुशवाहा को टिकट नहीं दिला पाए

वरिष्ठ पत्रकार भोला नाथ कहते हैं कि सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने से बीजेपी को कोई लाभ नहीं हुआ। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए भी सम्राट लोकसभा चुनाव में पार्टी से एक भी कुशवाहा लीडर्स को टिकट दिलाने में कामयाब नहीं हुए। इसका आक्रोश जमीन पर भी देखने को मिला।

यादव के बाद बीजेपी का कुशवाहा कार्ड भी फेल हुआ

वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय कहते हैं कि बीजेपी के सामने नीतीश कुमार के लव-कुश समीकरण को साधना था। उपेंद्र कुशवाहा इतनी बार पाला बदल चुके हैं कि उनसे उनकी जाति के लोगों का विश्वास लगातार टूट रहा है। ऐसे में एक तरीके से सम्राट चौधरी के लिए अग्निपरीक्षा थी। लेकिन, इस अग्निपरीक्षा में वे बुरी तरह फेल रहे।

बीजेपी और सहयोगी एनडीए को मुंगेर, नवादा, औरंगाबाद, काराकाट जैसी कई अहम सीटों पर भारी नुकसान हुआ। लोकसभा चुनाव के रिजल्ट इस बात के साफ संकेत दे रहे हैं कि कुशवाहा का प्रयोग बीजेपी से ज्यादा लालू प्रसाद यादव का सफल रहा। कुशवाहा उम्मीदवार उतारने का इन्हें कई सीटों पर लाभ मिला।

ठीक इसी तरीके का प्रयोग बिहार के प्रदेश प्रभारी रहते हुए भूपेंद्र यादव ने किया था। तब उन्होंने लालू यादव के कोर वोट बैंक में सेंधमारी के लिए नित्यानंद राय को प्रोजेक्ट किया था। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। हालांकि, उनके नेतृत्व में पार्टी कुछ सीटों पर लोकसभा का चुनाव जीतने में कामयाब रही थी, लेकिन वो पार्टी की छवि से ज्यादा कैंडिडेट का प्रभाव था। इस बार यादव वोटर्स भी पूरी तरह एनडीए से दूर हो गए।

सीट हारने के साथ जीत की मार्जिन भी कम हुई

इस चुनाव में एनडीए की तरफ से 4 सीटों पर कुशवाहा उम्मीदवार को उतारा गया था। इनमें जदयू ने सीवान से विजयालक्ष्मी कुशवाहा, पूर्णिया से संतोष कुशवाहा और वाल्मीकि नगर से सुनील कुमार को उम्मीदवार बनाया था। जबकि, काराकाट से उपेंद्र कुशवाहा खुद चुनाव लड़े थे।

वहीं, महागठबंधन की तरफ से 7 कैंडिडेट कुशवाहा जाति के उतारे गए थे। इनमें राजद ने उजियारपुर से आलोक कुमार मेहता, नवादा से श्रवण कुशवाहा और औरंगाबाद से अभय कुमार सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाया था। वीआईपी ने मोतिहारी से राजेश कुशवाहा, सीपीआईएम ने खगड़िया से संजय कुशवाहा, भाकपा माले ने काराकाट से राजराम सिंह और कांग्रेस ने पटना साहिब से अंशुल अभिजीत को उम्मीदवार बनाया था।

एनडीए सीवान और वाल्मीकि नगर सीट जीतने में सफल रही। काराकाट और पूर्णिया में पार्टी की हार हुई। वहीं, महागठबंधन भले दो सीट औरंगाबाद और काराकाट जीती, लेकिन हर सीट पर जीत का मार्जिन बिगाड़ दी।

इसे ऐसे समझें कि नवादा सीट 2019 में बीजेपी 1.48 लाख के मार्जिन से जीती थी। इस बार जीत का मार्जन घट कर 67 हजार पर आ गया। इसी तरह मुंगेर सीट भले जदयू ने जीत ली है, लेकिन जीत का मार्जिन पिछले चुनाव के 1.68 लाख से घटकर 80 हजार 870 वोट पर आ गया। वाल्मीकि नगर में जीत का मार्जिन 2019 के 3.54 लाख वोट से घट कर 98 हजार पर आ गया।

अपने जिले में भी वोट कन्वर्ट नहीं करा पाए सम्राट

बात अगर सम्राट चौधरी के परफॉर्मेंस की करें तो चुनाव के दौरान उन्होंने ताबड़तोड़ रैलियां की। बीजेपी के ऑफिशियल सूत्रों के मुताबिक, सम्राट चौधरी ने चुनाव के दौरान लगभग 118 रैलियां की। एक दर्जन से ज्यादा शहरों में रोड शो किए, लेकिन वे अपने जिले मुंगेर में भी कोइरी-कुर्मी का वोट कन्वर्ट नहीं करा पाए।

यहां लालू यादव ने अशोक महतो की पत्नी कुमारी अनीता को अपना उम्मीदवार बनाया था। आंकड़े बताते हैं कि मुंगेर लोकसभा इलाके में लगभग 70 फीसदी कोइरी-कुर्मी ने अशोक महतो को अपना समर्थन दिया है। लगभग यही आंकड़ा उनके प्रभाव इलाके जमुई और बांका लोकसभा क्षेत्र का भी है।

अब सामने विधानसभा का चुनाव है। इसके मद्देनजर पार्टी एक बार फिर से बिहार में कोई बड़ा प्रयोग कर सकती है। फिलहाल पार्टी बिहार में हार की गहन समीक्षा कर रही है और हार के हर पक्ष को समझने की कोशिश कर रही है।

 

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