लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को बड़ा झटका मिला है. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है. कमलनाथ ने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ के साथ बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. इतना ही नहीं, इनके साथ कांग्रेस के करीब एक दर्जन विधायक और पूर्व विधायक भी बीजेपी ज्वाइन कर सकते हैं. कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ के साथ दिल्ली पहुंचे और उन्होंने कांग्रेस आलाकमान को अपना इस्तीफा सौंप दिया. बताया जा रहा है कि कमलनाथ पार्टी आलाकमान से नाराज चल रहे थे.
मध्य प्रदेश संगठन में फेरबदल और प्रदेश अध्यक्ष पद से कमलनाथ को हटाए जाने के बाद से कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व सीएम कमलनाथ नाराज चल रहे थे. संभावना जताई जा रही है कि दिल्ली में चल रही भाजपा की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद भाजपा कई बड़े राजनीतिक धमाके कर सकती है और कई कांग्रेस नेताओं को भाजपा में शामिल कराएगी. हालांकि, भाजपा में शामिल होने को लेकर कमलनाथ ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
छिंदवाड़ा से 9 बार सांसद रहे हैं कमलनाथ
कमलनाथ छिंदवाड़ा से 9 बार सांसद रहे अभी उनके बेटे नकुलनाथ वहां से सांसद हैं. छिंदवाड़ा से कमलनाथ के जीतने के पीछे कई कारण रहे हैं. उन्होंने इस इलाके में स्कूल-कॉलेज, खुलवाए, इसके अलावा वेस्टर्न कोलफील्ड्स और हिंदुस्तान यूनिलिवर जैसी कंपनियां, क्लॉथ मेकिंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट और ड्राइवर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की देन भी कमलनाथ को ही जाता है. जिससे वहां के लोगों को रोजगार मिला. आज भी छिंदवाड़ा में कमलनाथ को लोग अपनी आंखों पर बैठाए हुए हैं.
कमलनाथ का कांग्रेस से करीब 60 साल का रिश्ता रहा है। वह गांधी परिवार के सबसे करीबी नेताओं में शुमार हैं। इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना तीसरा बेटा बताया था। खुद कमलनाथ उन्हें ताउम्र मां कहकर बुलाते रहे। कमलनाथ संजय गांधी और राजीव गांधी के खास सिपहसलार रहे। राजीव गांधी के निधन के बाद भी वह पहले सोनिया गांधी, बाद में राहुल गांधी के सलाहकार में शामिल रहे। मूल रूप से कानपुर के रहने वाले कमलनाथ 1980 में पहली बार छिंदवाड़ा से चुनाव मैदान में उतरे। 1997 के अलावा वह 9 बार लगातार छिंदवाड़ा से जीते। जब खुद चुनाव नहीं लड़े तो उनके परिवार ने छिंदवाड़ा से जीत हासिल की। 1996 में उनकी पत्नी अलकानाथ सांसद चुनी गई। 2018 में जब कमलनाथ मध्यप्रदेश के सीएम बने तो छिंदवाड़ा सीट अपने बेटे नकुलनाथ को सौंप दी। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले छिंदवाड़ा का दुर्ग ही उनकी कमजोर नस बन गया, जिस पर वह किसी भी हालत में खोना नहीं चाहते हैं।
संजय गांधी के साथ राजनीति में आए कमलनाथ
संजय गांधी और कमलनाथ दोनों बचपन के दोस्त थे। दून स्कूल में दोनों ने साथ पढ़ाई की थी। बाद में कमलनाथ ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बी कॉम ग्रैजुएशन पूरी की। संजय गांधी की दोस्ती के कारण 1968 में वह युवा कांग्रेस के साथ अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने युवा नेताओं की एक कोर टीम बनाई थी। उस टीम में जगदीश टाइटलर, कमलनाथ, आर के धवन और रुखसाना सुल्ताना जैसे नेता शामिल थे। आपातकाल के बाद मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। नई सरकार ने संजय गांधी और सरकार की मनमानियों की जांच के लिए शाह कमीशन का गठन किया गया। संजय गांधी को ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म की रील और प्रिंट जलाने के मामले में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। रशीद किदवई की किताब ‘नेता-अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पावर इन इंडियन पॉलिटिक्स’में भी इस घटना का जिक्र किया है। जर्नलिस्ट विनोद मेहता ने अपनी किताब ‘संजय गांधी-अनटोल्ड स्टोरी’में लिखा कि इंदिरा गांधी को जेल में बंद संजय गांधी की सुरक्षा की चिंता सताने लगी। तब कमलनाथ एक केस की सुनवाई के दौरान जज से झगड़ गए। नाराज जज ने उन्हें सात दिनों के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया। इस घटना ने कमलनाथ को गांधी परिवार का करीबी बना दिया।
1980 में इंदिरा गांधी ने बताया था कमलनाथ को तीसरा बेटा
मोरारजी देसाई की सरकार अंतर्कलह के कारण 1979 में गिर गई। कांग्रेस के समर्थन से चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री बने। पांच महीने बाद कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और जनवरी 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए। इस चुनाव में संजय गांधी ने अपने सभी करीबियों को चुनाव मैदान में उतारा। युवाओं को लोकसभा का टिकट दिया गया। कानपुर के कमलनाथ छिंदवाड़ा से चुनाव मैदान में उतरे। उनके लिए इंदिरा गांधी 13 दिसंबर 1979 को प्रचार करने छिंदवाड़ा पहुंची। इस सभा में इंदिरा गांधी ने कमलनाथ को राजीव गांधी और संजय गांधी के बाद अपना तीसरा बेटा बताते हुए जिताने की अपील कर दी। बताया जाता है कि कमलनाथ हमेशा इंदिरा गांधी को मां कहकर बुलाते रहे। संजय गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के निधन के बाद भी वह गांधी परिवार के विश्वस्त करीबियों में शामिल रहे। कमलनाथ कांग्रेस की सरकारों में मंत्री रहे। नरसिम्ह राव की सरकार में पहली बार पर्यावरण मंत्री और कपड़ा मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने। मनमोहन सिंह की पहली सरकार में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री बने। यूपीए-2 में भी सड़क परिवहन, शहरी विकास और संसदीय कार्य मंत्रालय को संभाला। 2018 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने।
अब क्यों बीजेपी के लिए उमड़ा है कमलनाथ का प्रेम
कमलनाथ अब करीब 78 साल को हो चुके हैं। बीजेपी की पॉलिसी के हिसाब से 70 प्लस वाले नेताओं को पार्टी टिकट नहीं दे रही है। मगर छिंदवाड़ा को जीतने के लिए बीजेपी ने बड़ी पेशबंदी कर रखी है। वहां कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता को प्रभार दिया गया है। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने छिंदवाड़ा की सात सीट तो जीत ली मगर जीत का मार्जिन कम रहा। अब कांग्रेस उम्मीदवार को ब्रांड मोदी और राम मंदिर इफेक्ट से जूझना होगा। ऐसे में बेटे नकुलनाथ के लिए छिंडवाड़ा सेफ सीट बनाने के लिए कमलनाथ ने बीजेपी का रास्ता चुना है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कमलनाथ के लिए अभी छिंदवाड़ा के किले को बचाना जरूरी है। पांच साल बाद राजनीति की परिस्थिति बदल सकती है। तब तक के लिए इस सीट पर नाथ परिवार का कब्जा बना रहेगा।







