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लालू यादव के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी दिल्ली रवाना, बिहार में बढ़ी सियासी हलचल , क्या कुछ नया होने वाला है!

UB India News by UB India News
November 25, 2023
in पटना, बिहार
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लालू यादव के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी दिल्ली रवाना, बिहार में बढ़ी सियासी हलचल , क्या कुछ नया होने वाला है!
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गुरुवार को दिल्ली चले गए हैं। ऐसे में प्रदेश में सियासी हलचल बढ़ गई है। इसे देखते हुए तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इसका कारण यह है कि राजद सुप्रीमो लालू यादव के एक दिन पहले ही दिल्ली जाने के बाद नीतीश कुमार भी गए हैं। हालांकि उनकी इस यात्रा को निजी यात्रा बताया जा रहा है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक दिवसीय यात्रा पर गुरुवार को दिल्ली के लिए रवाना हो गए। वह शुक्रवार को वापस पटना लौटेंगे।

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मुलाकात से क्यों मची सियासी हलचल?

इस संबंध में मिली जानकारी के अनुसार यह उनकी निजी यात्रा है। राजनीतिक दल के नेताओं से मिलने का उनका कोई कार्यक्रम नहीं है।

बिहार में बढ़ी सियासी हलचल
नीतीश कुमार के दिल्ली रवाना होने से बिहार में सियासी हलचल बढ़ गई है। जानकारी के अनुसार, सीएम नीतीश कुमार गुरुवार शाम करीब चार बजे दिल्ली के लिए फ्लाइट से रवाना हुए हैं। इसे उनकी निजी यात्रा बताया जा रहा है। वह 25 नवंबर को वापस बिहार लौटेंगे।

हालांकि, राजद सुप्रीमो लालू यादव के दिल्ली जाने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भी जाने से सियासी अटकलें तेज हो गई हैं। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि नीतीश कुमार आईएनडीआईए गठबंधन के प्रमुख नेताओं से मुलाकात कर सकते हैं।

बता दें कि बिहार में इन दिनों प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने का मुद्दा गरमाया हुआ है। इसे लेकर पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से नेताओं की प्रतिक्रिया सामने आ रही हैं।

ऐसे में जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार इस मुद्दे पर आईएनडीआईए गठबंधन में शामिल दलों के नेताओं से समर्थन करने को लेकर चर्चा कर सकते हैं। बहरहाल, लालू यादव के भी दिल्ली में ही होने की वजह से जानकार भी इसकी संभावनाओं को नकार नहीं रहे हैं।

नीतीश कुमार की बदौलत ही पूरे देश में जाति आधारित गणना की चर्चा : शीला
इधर, परिवहन मंत्री शीला मंडल ने गुरुवार को कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ की है। उन्होंने कहा है कि नीतीश कुमार की बदौलत ही आज पूरे देश में जाति आधारित गणना की चर्चा हो रही है।

मुख्यमंत्री ने जाति आधारित गणना का काम पूरा कराने के साथ-साथ आरक्षण की सीमा को बढ़ाने का ऐतिहासिक काम किया है। जदयू प्रदेश कार्यालय में आयोजित जन सुनवाई कार्यक्रम के बाद संवाददाताओं से बातचीत के क्रम में उन्होंने यह बात कही।

शीला मंडल ने कहा कि कुछ लोगों की मानसिकता केवल कमियां निकालने की होती है। उन्हें अच्छी चीजें नजर नहीं आतीं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यों से विपक्ष के लोग घबराए हुए हैं। दरअसल मुख्यमंत्री काम की बात करते हैं।

बिहार की सियासत में कुछ नया होने वाला है!

लोकसभा के चुनावी संग्राम के बीच बिहार का राजनीतिक वातावरण नए-नए सियासी समीकरण का कारण बनते जा रहा है। कभी चर्चा यह होती है कि एनडीए का दो धड़ा जदयू के साथ गठबंधन करने जा रहा है तो कभी यह चर्चा होती है कि I.N.D.I.A से नीतीश कुमार नाराज हैं। यही कारण है कि चर्चाओं का बाजार गर्म है। सियासी पंडित भी नहीं समझ पा रहे हैं कि 2024 के चुनाव से पहले बिहार में क्या होगा और कौन सा समीकरण बनेगा। वैसे भी सियासत में कुछ भी संभव है।

क्या हैं नीतीश के राजनीतिक संकेत!

अप्रत्याशित रूप से बदलते राजनीतिक समीकरण का संकेत तो सबसे पहले मोतिहारी की एक जनसभा में दी थी। तब इन्होंने कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की जमकर आलोचना की थी। नमो नीत एनडीए सरकार की जमकर तारीफ की थी। और तब भाजपा के कुछ नामचीन नेताओं की तरफ इशारा करते यह भी कहा था कि इन लोगों से दोस्ती को हम भूलेंगे।

पांच राज्यों के हो रहे चुनाव के दौरान एमपी में कांग्रेस के विरुद्ध उम्मीदवार खड़ा कर नाराजगी का संकेत दिया।
इसी दौरान नीतीश कुमार ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि I.N.D.I.A के प्रति कांग्रेस का रवैया उदासीन है। कांग्रेस का सारा ध्यान पांच राज्यों के चुनाव पर केंद्रित है। इस बयान के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन ने नीतीश कुमार से बात की। और दूसरे ही दिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ अखिलेश प्रसाद सिंह ने रूखा बयान दिया कि वे चाहते हैं कि तुरंत मोदी को हटा दिया जाए। राजनीत में इतना जल्दी कुछ थोड़े होता है।
एक संकेत इस बात की पुष्टि करता है कि इन दिनों राजद सुप्रीमो लालू यादव की नजदीकियां कांग्रेस से बढ़ी है। लालू यादव ने डॉ श्रीकृष्ण सिंह की जयंती समारोह में कांग्रेस कार्यालय जाते हैं, वहीं नीतीश कुमार परहेज करते दिखते हैं। दूसरी ओर नीतीश कुमार वाम दल के सम्मेलन में जाते हैं और वहां लालू प्रसाद नहीं जाते हैं।

इधर हाल में विधानसभा में जनगणना को लेकर और जीतनराम मांझी को लेकर आए बयान पर लगभग दलों ने आलोचना की पर रालोजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा जो अक्सर नीतीश कुमार पर कुछ ज्यादा आक्रामक रहते हैं, वे इस मुद्दे पर एक ट्वीट कर चुप बैठ गए।
हाल के दिनों में नीतीश कुमार जिस सरकारी कार्यक्रम या किसी सभा में जाते हैं तो वे किसी न किसी बहाने वर्ष 2005 के पहले की चर्चा कर पूछते हैं कि तब कुछ था। ये तो हम आए और विकास का कितना काम किया। लोग भूलने लगे हैं। उन्हें याद कराते रहिए।

वहीं उपेंद्र कुशवाहा ने भी पिछले दिनों ट्वीट कर अपरोक्ष रूप से राजद के 15 वर्षों के शासन काल का जिक्र कर लालू प्रसाद को कटघरे में खड़ा करने का काम किया।

वैसे राजनीति तो संभावनाओं का खेल है। कब क्या हो जाए, कोई कह नहीं सकता। लेकिन अभी बिहार में महागठबंधन इनटैक्ट दिखता है लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि बाद की राजनीति में नीतीश जी ज्यादा देर तक कहीं रुक नहीं पाते। ऐसे में अगर किसी गठबंधन में ज्यादा पाने की संभावना दिखेगी तो चले भी जा सकते हैं। खतरा यह है कि I.N.D.I.A में नेता का चयन नहीं हुआ है। सीट शेयरिंग पर बात नहीं हुई है। संयोजक को लेकर भी अनदेखी की है। पांच राज्यों के चुनाव में व्यस्त रहने वाली कांग्रेस पर नीतीश कुमार शिथिलता का आरोप तक लगा चुके हैं। कांग्रेस के प्रति नाराजगी भी जाता चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस कुछ और अनदेखी की तो नीतीश कुमार दवाब में रह कर राजनीति करने वाले नहीं। फिर कुछ अलग भी सोच सकते हैं जो राज्य में एक नया राजनीति को जन्म दे सके।

नया समीकरण बनते दिख नहीं रहा: फजल
रालोजाद के मुख्य प्रवक्ता फजल इमाम मल्लिक कहते हैं कि देश या राज्य स्तर पर नया समीकरण बनते दिख नहीं रहा है। लेकिन इस प्रश्न का जवाब नीतीश जी या उनके पार्टी के वरीय नेता ज्यादा बढ़िया से दे सकते हैं। लेकिन नया समीकरण की बात करें तो एक दरवाजा भाजपा की तरफ खुलता है। मगर भाजपा ने दरवाजा बंद कर रखा है। दूसरा रास्ता थर्ड फ्रंट की बनती है। इसकी संभावना भी काफी कम है। अब रही नीतीश कुमार के प्रति उपेंद्र कुशवाहा के सॉफ्ट कॉर्नर होने की। सच्चाई यही है कि उपेंद्र कुशवाहा ने बहुत ही साधी भाषा में दलित अपमान या महिला अपमान के मुद्दे पर विरोध करते ट्वीट किया है। एक सच तो है कि नीतीश कुमार ने बिहार को जंगल राज से मुक्त कराया। विकास की परिभाषा गढ़ी। लेकिन अंत में फिर वे आरजेडी की गोद में चले गए, जहां वे मजबूत मुख्यमंत्री नहीं बल्कि मजबूर मुख्यमंत्री हो गए है। तो नीतीश कुमार की जो लाचारगी दिख रही है। उसके प्रति उपेंद्र कुशवाहा जरूर सॉफ्ट हैं। लेकिन इससे एनडीए में उनका रिश्ता आज भी अटूट है। और रालोजद आगामी लोकसभा डटकर एनडीए के साथ लड़ेगा।

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