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नाम के आगे से जाति सूचक टाइटल हटाने वाले नीतीश क्यों करवा रहे हैं जातीय जनगणना?

UB India News by UB India News
August 4, 2023
in खास खबर, पटना, बिहार, ब्लॉग
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नाम के आगे से जाति सूचक टाइटल हटाने वाले नीतीश क्यों करवा रहे हैं जातीय जनगणना?
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पटना हाई कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद बिहार में जातीय जनगणना का कार्य एक बार फिर से शुरू हो चुका है। बिहार सरकार जल्द ही जातीय जनगणना को पूरा करने के मिशन पर है। ऐसे में कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिस बिहार में ज्यादातर लोगों के नाम के आगे जाति सूचक शब्द नहीं होते हैं, वहां जातीय जनगणना जैसे कार्य को इतना तवज्जो क्यों दिया जा रहा है। नाम के आगे जाति सूचक शब्द लगाने और हटाने की पीछे कहानी का खुलासा बाहुबली पूर्व सांसद आनंद मोहन ने की है। आनंद मोहन ने डिटेल में बताया कि आखिर लालू प्रसाद, नीतीश कुमार सरीखे नेता जिन्होंने एक वक्त में अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्दों को हटाया था वह आज जाति जनगणना को लेकर इतने आतुर क्यों दिख रहे हैं।

लालू-नीतीश ने नाम से हटा लिया था जाति सूचक शब्द
दरअसल, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, आनंद मोहन सरीखे बिहार के ज्यादातर नेता जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की पैदाइश हैं। ये सभी नेता कहीं ना कहीं जेपी के अनुवायी रहे हैं। हालांकि बदलते वक्त के साथ इनकी राजनीति करने के तरीके में काफी बदलाव दिखता रहा है, लेकिन शुरुआती दिनों में बिहार के तमाम समाजवादी नेता जेपी की बताई बातों को अमल में लाते थे।

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जेपी के कहने पर जाति सूचक शब्दों से बचने लगे थे नेता
आनंद मोहन ने एक यूट्यब चैनल से बातचीत में बताया कि जयप्रकाश नारायण ने नारा दिया था ‘जात पात के मिटे निशान, मानव-मानव एक समान।’ जेपी के इस नारे के बाद उस वक्त आंदोलन से जुड़े तमाम युवा नेताओं ने अपने नाम के आगे से जाति सूचक टाइटल हटा लिया था, जिसमें लालू यादव ने अपना नाम लालू प्रसाद लिखना शुरू कर दिया था। नीतीश कुमार सिंह अपना नाम नीतीश कुमार लिखने लगे थे। शिवानंद तिवारी अपना नाम शिवानंद लिखने लगे। आनंद मोहन सिंह अपना नाम आनंद मोहन लिखने लगे। जेपी ने आह्वान किया था- दाढ़ी-चोटी और जेनऊ ये तीनों तिकड़म के निशान हैं, इसलिए अगर सच्चे समाजवादी बनना चाहते हैं तो इन्हें त्याग दीजिए। मुसलमानों से दाढ़ी कटवाने को कहा गया। हिन्दुओं की उच्च जातियों को जेनऊ और नाम जाति सूचक टाइटल हटाने को कहा गया। जेपी के कहने पर उस दौर के युवा समाजवादी नेताओं ने जेनऊ और जाति सूचक टाइटल का त्याग कर दिया।

जातीय जनगणना से विपक्ष को मिली मंडल पार्ट-2 की चाबी, जानिए बीजेपी के पास ऑप्शन क्या है?
आज जातीय जनगणना कराने के सवाल पर आनंद मोहन ने बताया कि अंग्रेजों ने जातीय जनगणना करवा था। आजादी के बाद आरक्षण देकर सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों और दलितों को मिला। आरक्षण पुरानी जनगणना के आधार पर अनुमान के आधार पर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जातीय जनगणना का लोगों को बेहिचक सामना करना चाहिए। कोई कहता है कि वह मुठ्ठी भर हैं, कोई ढाकी भर हैं। यह भ्रम टूटना चाहिए। रियलिटी सामने आना चाहिए कि कौन कितना है।

ब्राह्मण और राजपूत जातीय जनगणना से क्यों पीछे हट रहे?
पूर्व सांसद ने कहा कि अन्य जातियां बिहार से निकलकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में जाकर बसे हैं। नेशनल स्तर पर जाति की बात करें तो ब्राह्मण, राजपूत को इसमें रख सकते हैं। ये दो ऐसी जातियां हैं जो देश के उत्तर, पूर्व, पश्चिम, दक्षिण सभी दिशाओं में फैले हैं। समझ से परे है कि ये जातियां जातीय जनगणना से क्यों भाग रहे हैं। इसलिए जातीय जनगणना ना केवल प्रांतीय स्तर पर बल्कि पूरे देश के स्तर पर होना चाहिए।

आनंद मोहन ने कहा कि बिहार ने जातीय जनगणना की शुरुआत की है। इसे स्वीकार करना चाहिए। समाज में जिस भी जाति की जितनी भी संख्या है उसे स्वीकारने में क्या दिक्कत है। अनुमान पर नहीं, बल्कि यथार्थ पर पिछड़े लोगों को सामाजिक स्तर पर उन्हें इसका लाभ मिले। पूर्व सांसद यह भी कहते हैं कि नीचे दारोगा से लेकर बीडीओ और ऊपर चीफ सेक्रेटरी जो बन गया उसे आरक्षण से मुक्त कर देना चाहिए। उसी तरह विधायक, सांसद और ऊपर राष्ट्रपति तक उसे आरक्षण से मुक्त करके उसके भाइयों को दीजिए। ताकि आरक्षण का लाभ सही अर्थ में पिछड़ो और दलितों को मिल सके। इसलिए जातीय जनगणना के साथ आर्थिक गणना भी होनी चाहिए। आनंद मोहन ने कहा कि उन्होंने अपनी जेल डायरी में लिखा है कि सही मायने में आरक्षण का लाभ देने के लिए यह तय हो कि पिछड़े और दलितों में जो आरक्षण के बल पर आगे निकल गए हैं उन्हें रोकिए और जो पीछे छूट गए हैं उन्हें आरक्षण देकर आगे कीजिए।

आनंद मोहन ने कहा कि राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जो द्विज हैं उनके विष के दांत टूट गए हैं। अब पिछड़ों और दलितों में नवद्विज पैदा हुए हैं उन्हीं से पिछड़ो और दलितों को खतरा है। जातीय जनगणना के उद्देश्य को लेकर पूर्व बाहुबली सांसद ने यह भी स्वीकारा कि जब भी कोई राजनेता काई कार्य करते हैं तो उसमें राजनीतिक लाभ निहित होता है।

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