वेदिक वांगमय में पर्यावरण की स्वच्छता‚ संरक्षण‚ पर्यावरण के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के कर्त्तव्य और स्वच्छ पर्यावरण के निर्माण जैसी अनेक प्रेरणाओं का वर्णन किया गया है। गौरतलब है कि वेदों में पर्यावरण को लेकर पूरा अध्याय ही है‚ जिसमें पर्यावरण को स्वच्छ बनाने‚ प्रदूषण न हो‚ इसके लिए अपना कर्त्तव्य प्रति दिन निभाने (हवन करने–जिसमें औषधियों और गाय के घी का प्रयोग होता है)‚ बडी संख्या में पेड–पौधों‚ झाडियों‚ औषधीय पौधों को लगाने और प्रदूषण न हो‚ इसके प्रति सचेत रहने की चर्चा की गई है। वैदिक वांगमय में पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा को सामाजिक‚ सांस्कृतिक‚ धार्मिक और आध्यात्मिक कृत्य माना गया है। वेदों में प्रदूषण को जहर बताया गया है। वेदों के अलावा उपनिषदों‚ ब्राह्मण ग्रंथों‚ स्मृतियों‚ गृह सूत्रों‚ महाभारत‚ गीता‚ रामायण के अलावा संस्कृत के अनेक ग्रंथों में पर्यावरण के तमाम आयाम बताए गए हैं। शारीरिक‚ सामाजिक‚ सांस्कृतिक‚ आध्यात्मिक‚ धार्मिक और मानसिक जितनी भी तरह के प्रदूषण हैं‚ सभी को खत्म करने की बात कही गई है। अगिहोत्र‚ वृक्षारोपण‚ औषधीय पौधों के रोपण और उनसे बनाई गईं औषधियों के सेवन से कई तरह की समस्याएं और प्रदूषण समाप्त होते हैं। मानसिक प्रदूषण से निजात पाने के लिए अनेक मंत्रों में तमाम तरह की औषधियों के प्रयोग का वर्णन है। मानसिक तनाव कम करने के लिए अमेरिका के मनोवैज्ञानिक वैरी रैथनर ने पूना विश्वविद्यालय में ‘अगिहोत्र का मानसिक तनाव पर प्रभाव’ विषयक शोध किया जिससे पता चला कि अगिहोत्र यानी हवन रोजाना करने से बच्चों का मृगी रोग समाप्त हो जाता है। ध्वनि‚ मृदा‚ वायु‚ प्रकाश और अंतरिक्ष प्रदूषण से निजात पाने के लिए तमाम तरह की विधियां वैदिक वांगमय में बताई गई हैं।
संसार में सबसे चर्चित विषयों में पर्यावरण भी है। पर्यावरण कई तरह का है। आदमी पर्यावरण के सभी क्षेत्रों से किसी न किसी रूप में जुडा हुआ है। विचार करें तो हम पाते हैं जितना भौतिक जगत का पर्यावरण प्रदूषित है‚ उससे कहीं ज्यादा आध्यात्मिक पर्यावरण प्रदूषित है। आधिदैविक शक्तियों से संचालित एवं पंच भौतिक तवों से निर्मित (आधिभौतिक) शरीर की तमाम समस्याओं के निदान का वर्णन किया गया है यानी जो पर्यावरण आदमी को मानसिक और आत्मिक स्तर पर प्रभावित करे‚ उसके सुधार के लिए जरूरी उपाय करने की प्रेरणा वैदिक वांगमय में वर्णित है। दुनिया भर में ५ जून पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। पर्यावरण दिवस भौतिक जगत के पर्यावरण और उसके हालात को याद करने का एक अवसर है। भौतिक जगत में आए बदलावों और उनसेे आइ तब्दिीलियों पर विचार करने का दिन है यह। भौतिक जगत का पर्यावरण आध्यात्मिक जगत के पर्यावरण से किसी न किसी रूप में जुडा है। इसलिए यह दिन भौतिक और आध्यात्मिक‚ दोनों पर्यावरणीय स्थितियों पर विचार करने का है। दैवीय शक्तियों और आधिभौतिक शक्तियों से जीवन में अनुकूल अवस्था में सुख मिलता है‚ और प्रतिकूल अवस्था में दुख मिलता है। अनुकूलता के लिए मन‚ ह्रदय‚ चित्त और आत्मा में सकारात्मक ऊर्जा का लगातार संचार करते रहना चाहिए। यह आंतरिक पर्यावरण शुद्ध करने के लिए जरूरी है। सकारात्मक सोच के साथ मन‚ वाणी और कर्म के जरिए परोपकार और यज्ञ करते रहना चाहिए। यज्ञ जीवन की पवित्रता और सुख के लिए जरूरी है जिसमें आत्म–यज्ञ भी शामिल है। वैदिक वांगमय में सभी तरह के शुभ कर्मों‚ व्यवहारों और विचारों को यज्ञ माना गया है।
मूल्यपरक पर्यावरण संरक्षण को समझना भी जरूरी है यानी जीवन‚ परिवार‚ समाज‚ संस्कृति‚ धर्म‚ स्वदेशी और विज्ञान को बढाने के लिए हर तरह के पर्यावरण को दुरुस्त रखना जरूरी है। मानसिक और आध्यात्मिक पर्यावरण की पवित्रता रखना भी जरूरी है। इसमें वृक्षारोपण‚ अपंगों‚ असहायों और रोगियों को दान करना भी आध्यात्मिक शक्तियों को खुश करने में अहम भूमिका निभाता है। आधिदैविक दुख से बचने के लिए तप की जरूरत होती है। तप का मतलब है तितीक्षा सहन करने की क्षमता। आत्मविश्वास के साथ ही साथ आत्मिक शक्ति को बढाना और करुणा‚ दया‚ न्याय‚ प्रेम‚ सत्य और अहिंसा जैसे सुणों को बढाना चाहिए। यह आंतरिक पर्यावरण के लिए जरूरी है। इससे शारीरिक‚ बौद्धिक‚ आत्मिक और प्राणिक पर्यावरण को स्वच्छ रखने में मदद मिलती है। वेद में पर्यावरण को साफ रखने के लिए यज्ञ की महत्ता को सर्वोपरी माना गया है। शांति की प्रार्थना वाले मंत्र में पर्यावरण के इन्हीं अवयवों का उल्लेख मिलता है–द्यौ‚ अंतरिक्ष‚ जल‚ वायु‚ औषधियां‚ वनस्पतियां और पृथ्वी सभी में शंाति के लिए कामना की गई है। इन तत्वों में संतुलन बना रहे। यजुर्वेद के रुद्राध्याय में वृक्ष‚ वनस्पतियों‚ औषधियों‚ वन और अरण्यों के लिए आदर‚ उनको समृद्ध करने‚ उनका उपयोग लेने और शंाति प्राप्ति का संकेत किया है। बनानां पतये नमः‚ वृक्षाणं पतये नमः–औषधीनां पतये नमः आदि मंत्रों में वृक्षों‚ औषधियों (पौधों) और वनों को रुद्र कहा गया है। रुद्र को विषपान करने वाला कहा गया है अर्थात वृक्ष–जहर का सेवन करते हैं। यजु का मंत्र है या ते रुद्र‚ शिवा तनूः शिवा विवाहा भेषजी। शिवां रुतस्य भेषजी तया नो मृड जीव से यानी रुद्र हमारी रक्षा करें। हमारे जीने के लिए रोज सुखमय हों। अथर्ववेद में भी वनस्पतियों के सतत उपयोग के साथ–साथ उनकी जडों को न काटने का आदेश है‚ जिससे उनका संरक्षण होता रहे। एक मंत्र में कहा गया है‚ सुबह वनस्पतियों (औषधियों) की जडों को न काटें‚ बल्कि उन्हें टहनियों से काट कर इस्तेमाल में लाना चाहिए। अथर्ववेद में अनेक प्रकार की वनस्पतियों का वर्गीकरण कर कौन वनस्पति कब और किसके द्वारा तथा कैसे उखाडी या काटी जाए‚ इसे साफ तरीके से बताया गया है। यजुर्वेद के मंत्र में कहा गया है–पृथिवि देव यजन्योण ध्यास्ते मूलं मा हिपं सिशं यानी यह जो विद्वानों के उत्तम कार्य करने की जगह पृथ्वी है‚ और उस पर जो औषधियां (वनस्पतियां) हैं‚ उनकी वृद्धि करने वाले मूल (जड) को कभी नष्ट न करूं। यजुर्वेदवन जलाने वालों को राजा से दंडि़त करने का साफ आदेश देता है– वनाय वन पमन्यतारण्याय दावपम् यानी हे राजन! जो वन को नुकसान पहंुचाए उसको दंडित करके उसे उस भू–भाग से ही दूर रखने का कार्य कीजिए। वृक्षों के आच्छादन को बढाने हेतु बेहतर तरीके से कार्य करने को कहा गया है–नमो वृक्षभ्यो हरिकेशोभ्यो। वृक्षों और हरे पत्तों के प्रति नम्र भाव हो। ऋग्वेद का अरण्यानि सूक्त प्रातिक एवम् साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें वनों के समूह को अरण्यानि नाम दिया गया है– अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नष्यसि। कथा ग्रामं न पृच्छसि मत्वा भीरिव विन्दती यानी हे अरण्यों की शोभा रानी। तू वनों की पृष्ठगामिनी बनकर वनों में क्यों व्याप रही हैॽ अरण्यों की शोभा रूप में तू ग्रामों को शोभित क्यों नहीं करतीॽ अरण्यानि मन को शीतलता प्रदान करती है। वह शांतिदायिनी है‚ सबको शांति प्रदान करती है। वेदों में जगह–जगह पर्यावरण और उसके अवयवों के संरक्षण का उपदेश दिया गया है। मापो मौाधीहिएं सीधारिनों धाम्नो राजंस्ततो वरुण नो मुच। यानी हे राजन्। ऐसा उद्यम करो जिससे जल और वनस्पतियां हम सबको सतत रूप से मिलती रहें। आवः औषधीरूत नोवन्तु‚ द्यौर्वना गिरयो वृक्ष कोशः। यानी जल में उगने वाले पौधे‚ आकाश‚ वन तथा वृक्षों से अच्छादित पर्वत प्रदूषण को कम करते हैं। यजुर्वेद में वृक्षों को दुष्प्रभावों का शमन करने वाला कहा गया है। वेद में पेड–पौधे देवता के समान माने गए हैं। जैसे जल‚ अग्नि‚ धरती और आकाश देवता हैं‚ उसी तरह वृक्ष भी देवता माने गए हैं। ऐसे देवताओं की रक्षा करना वेद में पुण्य का कार्य बताया गया है। पर्यावरण को साफ–सुथरा रखने में वृक्षों का योगदान सबसे अधिक बताया गया है। वह वैदिक दर्शन के मुताबिक तो है ही विज्ञान और लोक–संस्कृति के मुताबिक भी है। हम मिलकर वृक्ष लगाएं और पर्यावरण की रक्षा करें‚ जिससे प्रकृति के सभी संसाधन स्वच्छ और आनंद देने वाले बने रहें।







