संसद भवन के उद्घाटन समारोह में कांग्रेस‚ टीएमसी‚ जेड़ीयू‚ आरजेड़ी‚ एनसीपी‚ सपा सहित बीस राजनीतिक पार्टियों ने शामिल न होने की घोषणा कर दी है। इनका कहना है कि जब संसद से ही लोकतंत्र को बहिष्कृत कर दिया गया हो‚ लोकतंत्र की मूल भावना का हनन कर दिया गया हो‚ तब संसद के नये भवन का कोई महत्व नहीं है। विपक्षी दलों का समारोह बहिष्कार करने का तर्क या आरोप यह है कि इस भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा न किए जाकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा किया जाना चाहिए था। राष्ट्रपति को उद्घाटन के लिए आमंत्रित न करके भाजपा सरकार ने न केवल राष्ट्रपति का भारी अपमान किया है‚ बल्कि सीधे–सीधे लोकतंत्र पर हमला किया है। उन्होंने समारोह को पूरी तरह प्रधानमंत्री केंद्रित बताया है और नये संसद भवन के निर्माण पर भी सवालिया निशान लगाया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि राष्ट्रपति संवैधानिक सत्ता का प्रमुख होता है और संसदीय परंपरा का अभिन्न अंग भी होता है। संसद के सत्र का प्रारंभ राष्ट्रपति के संबोधन से होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो संसद भवन के उद्घाटन के लिए राष्ट्र प्रमुख को ही प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिएथा। सरकार ने प्रधानमंत्री से उद्घाटन कराने का निर्णय क्यों लिया है। इस बारे में कोई ठोस तर्क मौजूद नहीं है‚ सिवाय इसके कि लोक सभा अध्यक्ष ने नये संसद भवन का उद्घाटन करने के लिए राष्ट्रपति की बजाय प्रधानमंत्री को चुना है। विपक्ष ने इसे अलोकतांत्रिक कृत्य की संज्ञा दी है। विपक्ष चाहता तो इस मुद्दे को ज्यादा तूल न देता और संसद भवन के उद्घाटन जैसे अनुष्ठान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करके संसदीय परंपरा के प्रति अपनी निष्ठा का प्रदर्शन कर सकता था। प्रधानमंत्री मोदी के प्रति उसके भीतर जो असहमति‚ आक्रोश या निंदा का भाव है‚ उसे इस अवसर पर स्थगित कर सकता था। सरकार भी यहां विपक्ष की भावनाओं का ध्यान रखकर राष्ट्रपति को उद्घाटन के लिए आमंत्रित कर सकती थी। अब ये दोनों ही संभावनाएं समाप्त हो गई हैं। स्वस्थ लोकतंत्र के लिएयह शुभ नहीं है। भले ही सर्वोच्च न्यायालय में राष्ट्रपति से उद्घाटन कराने के लिए याचिका दायर की गई हो‚ लेकिन उसके वांछित परिणाम के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। सिर्फ अपेक्षा की जा सकती है कि लोकतंत्र के हित में दोनों थोड़़ा झुकेंगे और एक दूसरे के लिए गुंजाइश बनाएंगे।
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