निजी स्कूलों की मनमानी एक बार फिर सुर्खियां बटोर रही हैं। देश भर चाहे राजधानी दिल्ली हो या आसपास के शहरों से लेकर सुदूर कस्बो तक के प्राइवेट स्कूलों में कॉपी–किताबों और स्कूल यूनिफॉर्म खरीदने के लिए भारी दबाव ड़ाला जा रहा है। इस तरह की खबरें रोजाना मीडि़या में जगह पा रही हैं कि या तो स्कूल में मौजूद स्टॉल से सारी चीजें खरीदी जाएं या जिस दुकान का जिक्र स्कूल प्रबंधन करे‚ वहीं से खरीदारी करें। इसे लालच की संज्ञा दी जाए या कुछ और समझ से बाहर की बात है।
दिल्ली और उससे सटे शहरों–नोएड़ा‚ गाजियाबाद‚ गुरुग्राम–में रहने वालों के बीच बातचीत में यह कथन बेहद महत्वपूर्ण है कि यहां के किसी अच्छे निजी स्कूल में बच्चे का दाखिला कराना बेटी ब्याहने से कम सौभाग्य की बात नहीं है। भले यह बात हल्के–फुल्के अंदाज में कही जाती हो‚ मगर यह निजी स्कूलों के प्रति हाई क्लास और मिडि़ल क्लास (अपर और लोअर) के नजरिए की गवाही भी देती है। यह भी कम दिलचस्प नहीं कि जैसे–जैसे सरकारी स्कूलों की ‘सेहत’ गिरती गई वैसे–वैसे प्राइवेट स्कूल ‘मोटे–तगड़े़’ होते चले गए।
राजधानी दिल्ली के स्कूलों की बात करें तो यहां १‚७०० से अधिक निजी स्कूल हैं। शिक्षा निदेशालय की तमाम हिदायतों और नियम–कायदों को ठेंगा दिखाते हुए अभिभावकों से निजी स्कूल किसी खास विक्रेता से किताबें और यूनिफार्म खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। यह चलन वर्षों से जारी है‚ मगर न तो स्कूलों को सरकार का ड़र है‚ न उन्हें अपने कृत्य पर शर्म आती है। यहां तक कि किताबों के दाम में पिछले साल से ४० से ५० प्रतिशत तक बढ़ोतरी की गई है। ऐसे में अच्छी शिक्षा दिलाने की प्रतिबद्धता रखने वाले अभिभावकों के दिल पर क्या गुजरती होगी‚ इसका अंदाजा लगाना मुश्किल तो कतई नहीं है। लाख टके का सवाल यही कि स्कूलों की तानाशाही के खिलाफ सरकार का इकबाल थर–थर कांपने क्यों लगता हैॽ क्या ऐसे स्कूलों पर शिकंजा कसने से सरकार गिरने का ड़र सत्तारूढ़ दलों को सताता हैॽ
अलबत्ता‚ यह बहस और मंथन का विषय हो सकता है कि निजी स्कूलों के संचालक या मालिक किस तबके से आते हैं‚ और उन लोगों के खिलाफ सरकार की सख्ती कब और किस रूप में देखी गई है। सरकार को समझना होगा कि निजी स्कूल तभी पनप सके जब सरकारी स्कूल कमजोर होने लगे। यह गणित अब उल्टी दिशा में हो तो बात बने।







