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‘डिस्कवरिंग जीसस’ कौतूहल का विषय….

UB India News by UB India News
April 10, 2023
in Lokshbha2024, अध्यात्म, खास खबर, ब्लॉग
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‘डिस्कवरिंग जीसस’ कौतूहल का विषय….
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यह सुन कर दुनिया भर के ईसाई भड़क जाएंगे कि बाइबिल में ईसा मसीह की शिक्षाएं नहीं हैं‚ गहन शोध के बाद यह दावा किया है इतिहासकार हर्ष महान कैरे ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरिंग जीसस’ में। रूपा प्रकाशन से प्रकाशित ३८७ पेज की यह अंग्रेजी पुस्तक ईसाइयों और गैर ईसाइयों के बीच कौतूहल का विषय बन गई है। लेखक का दावा है कि बाइबिल में जो शिक्षाएं लिखी गई हैं‚ वो पॉल के विचार हैं‚ जो कभी ईसा मसीह से मिला ही नहीं था। पर उसका दावा है कि ईसा मसीह ने यह ज्ञान उसे अवचेतन अवस्था में दिया था जिसे उसने लिपिबद्ध कर दिया। हालांकि पॉल ईसा मसीह के बारह प्रथम और मूल शिष्यों में से एक नहीं था फिर भी वो स्वयं को अपोस्टेल (प्रचारक) होने का दावा करता है जबकि ऐतिहासिक प्रमाण इसके विरु द्ध हैं।

यीशु के बारह प्रधान शिष्य थे जिन्हें अपोस्टेल (प्रचारक) कहा जाता है। इनमें से एक का नाम जूड्स इस्कारियट था‚ जिसने यीशु को धोखा दे कर गिरफ्तार करवाया और सूली पर चढ़वाया। कहते हैं कि बाद में उसने प्रायश्चित में आत्महत्या कर ली जिसके बाद शेष ग्यारह प्रचारकों ने आपसी सहमति से एक और प्रचारक को अपने साथ ले लिया पर वो पॉल नहीं था। परंतु आज का ईसाई धर्म पॉल की लिखी शिक्षाओं पर ही आधारित है। ‘डिस्कवरिंग जीसस’ पुस्तक ईसाई धर्मशा्त्रिरयों के लेखों पर किए गए शोध पर आधारित है। ये धर्मशास्त्री थे‚ जिन्होंने यीशु के बाद की शताब्दियों में लेखन कार्य किया। इस शोध से यह सिद्ध होता है कि यीशु के असली प्रचारक और पॉल न तो कभी एक साथ रहे और न ही उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं में कोई समानता है।

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इस बात के भी प्रमाण हैं कि पॉल जीवन भर इन प्रचारकों से लड़ता रहा पर उन्होंने कभी भी उसे स्वीकारा नहीं। पॉल द्वारा स्थापित मान्यता है कि संसार का अंत होगा और न्याय की घड़ी होगी। वो लिखता है कि इस दिन मृतक अपनी कब्रों से नये शरीरों के साथ उठ खड़े होंगे और जो जीवित होंगे उन्हें भी नये शरीर मिलेंगे। इन सब का फैसला इनके कर्मों के आधार पर होगा। सद्कर्म वाले स्वर्ग में सुख भोगेंगे और दुष्कर्म वाले नरक में अनंत काल तक दुख भोगेंगे। पॉल आगे कहते हैं कि यह फैसला यीशु ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में करेंगे। पॉल की सबसे महत्वपूर्ण घोषणा यह थी कि जो मानते हैं कि यीशु ईश्वर के पुत्र हैं‚ और मर कर जिंदा हुए हैं‚ वो सब स्वर्ग जाएंगे जबकि लेखक का शोध इस ग्रंथ में यह सिद्ध करता है कि यीशु और उनके बारह प्रमुख प्रचारकों का यह मत कतई नहीं था। वे तो पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करते थे जो कि व्यक्ति के पूर्वजन्म के कर्मों पर आधारित होता है। जन्म–मृत्यु के इस निरंतर चक्र से आत्मा तभी मुक्त हो सकती है‚ जब उसे आध्यात्मिक साधना द्वारा आत्म साक्षात्कार हो जाए। ईसा मसीह की ये शिक्षाएं आज के प्रचलित ईसाई धर्म (पॉल द्वारा प्रतिपादित) के बिल्कुल विपरीत हैं‚ और वैदिक धर्म के समान हैं। यह बात दूसरी है कि इसी लेखक ने अपने दूसरे एक ग्रंथ ‘ऐन आर्यन जर्नी’ में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्य बाहर से भारत आए थे और इसलिए वैदिक ज्ञान भी बाहर से ही भारत आया।

डिस्कवरिंग जीसस’ पुस्तक में लेखक ने बाइबिल से ही प्रमाण लेकर पॉल और मूल प्रमुख प्रचारकों के बीच मतभेद को दर्शाया है। इसी तरह बाइबिल से लिए गए अन्य उदाहरणों की सहायता से ईसाई धर्म की तमाम मौजूदा मान्यताओं को सिरे से खारिज किया है‚ क्योंकि ये मान्यताएं पॉल द्वारा प्रतिपादित हैं‚ यीशु के प्रमुख शिष्यों द्वारा नहीं। इसके अलावा भी ईसाई पादरियों द्वारा प्रारंभिक सदियों में लिखे गए लेखों के आधार पर इस पुस्तक के लेखक ने यह सिद्ध किया है कि वे पॉल को यीशु का प्रमुख शिष्य नहीं मानते थे और उसकी शिक्षाओं से सहमत नहीं थे। मसलन‚ यीशु के भाई जेम्स‚ जो यीशु की मृत्यु के बाद जेरु सलम के बिशप बने और प्रमुख प्रचारकों के चर्च के मुखिया बने‚ दुर्भाग्य से उन लोगों के लेख आज उपलब्ध नहीं हैं। केवल वही साहित्य उपलब्ध है‚ जो बहुत सावधानी से पैक करके मिस्र में गाढ़ दिया गया था जिसे अब ‘नाग हमादी’ पुस्तकालय के नाम से जाना जाता है। यह जितनी सावधानी से पैक किया गया है‚ वही इस बात का प्रमाण है कि उन्हें इस मूल साहित्य को नष्ट किए जाने का डर था। इसके अलावा‚ पॉल के अनुयायियों ने मूल प्रचारकों पर हमले की भावना से या उनका मजाक उड़ाने के लिए जो कुछ आगे की सदियों में लिखा उससे भी अपोस्टेल (प्रचारक) के विचारों का पता चलता है।

पुस्तक में आगे इस बात का वर्णन है कि कैसे पॉल और पौलाइन चर्च ने ‘न्यू टेस्टामेंट’ के साथ छेड़छाड़ की। इससे पता चलता है कि केवल ‘गोस्पेल ऑफ मैथ्यू’ के लेख ही शुद्ध हैं‚ जिन्हें प्रचारकों के शिष्यों ने स्वीकार किया था क्योंकि ये हिब्रू भाषा में लिखे गए थे जिनका बाद में ‘गोस्पेल ऑफ मार्क’ ने यूनानी भाषा में अनुवाद किया था। हालांकि इसमें भी एक दो बातें ऐसी हैं‚ जो पॉल के सिद्धांतों का समर्थन करती हैं। उदाहरण के तौर पर यीशु को आध्यात्मिक दर्जा देने के लिए उनके जन्म को कुंवारी मां के गर्भ से हुआ बताना‚ उनके चमत्कारों को महिमामंडित करना या उनका मर कर पुनर्जीवित होना। यह अंतिम बात पॉल ने इसीलिए जोड़ी ताकि वह अपने ‘अंतिम न्याय’ के सिद्धांत को स्थापित कर सके। इस तरह बाइबिल के ही उदाहरणों से लेखक ने बार–बार पॉल के सिद्धांतों और मान्यताओं को गलत सिद्ध करने का प्रयास किया है।

लेखक ईसाई धर्म गुरुओं को इस विषय में उससे शास्त्रार्थ करने की खुली चुनौती भी देता है। आश्चर्य की बात है कि २०२२ में प्रकाशित इस ग्रंथ में उठाए गए विषयों पर ईसाई जगत से चुनौती देने अभी तक कोई सामने नहीं आया है। अगर ऐसा हो तो बहुत सारी गुत्थियां सुलझ सकती हैं‚ और भ्रांतियां भी दूर हो सकती हैं। क्योंकि एक संत‚ योगी या तत्ववेत्ता किसी भी धर्म का मानने वाला क्यों न हो‚ जब वो साधना की चरम सीमा पर पहुंचता है‚ तो उसे जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है‚ वो सार्वभौमिक होता है। तब धर्मों के बीच कोई मतभेद रह ही नहीं जाता। जो मतभेद आज दिखाई देता है‚ वह आध्यात्मिकता या रुहानियत का आवरण मात्र है।

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