काग्रेस सहित 14 राजनीतिक दलों के सरकार पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग संबंधी आरोप के मामले पर सर्वोच्च न्यायालय ने ठंड़ा पानी ड़ाल दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका को ही सुनने से इनकार कर दिया जो खाली आरोपों के आधार पर दायर कर दी गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि केंद्र सरकार विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए उनके खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल कर रही है। प्रधान न्यायाधीश ड़ी वाई चंद्रचूड़़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला की पीठ ने याचिका पर विचार करने की अनिच्छा जताई और कहा कि नेताओं को आम नागरिकों की तुलना में अधिक छूट नहीं मिलती‚ जब कानून की नजर में सब बराबर हैं तो यह कैसे कहा जा सकता है कि तब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो सकती जब तक कि तीन आयामी जांच से संतुष्टि नहीं हो जाती। शीर्ष अदालत की अनिच्छा को भांपते हुए राजनीतिक दलों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी ने याचिका वापस ले ली। तब पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत का यह कहना बिलकुल तर्कसंगत है कि व्यक्तिगत आपराधिक मामला होने की स्थिति में ही अदालत उसे सुन सकती है। किसी मामले के तथ्यों से संबंध के बिना सामान्य दिशा–निर्देश देना खतरनाक होगा। सिंघवी ने खूब आंकड़े़ पेश किए और अपनी बात साबित करने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए। अदालत के इस फैसले ने सरकार को बड़़ी राहत और विपक्षी दलों को करारा झटका दे दिया है। विपक्ष अब अपने सबसे प्रमुख आरोप से हाथ धो बैठा है। अब विपक्ष के नेता किसी राजनीतिक रैली या सभा में केंद्र पर यह आरोप नहीं लगा सकेंगे‚ जबकि सत्ताधारी दल भाजपा और हमलावर होकर अपने आरोपों को दोहराएगी। प्रधानमंत्री मोदी अपनी सभाओं में यह कहने भी लगे हैं कि उनके खिलाफ सारे भ्रष्टाचारी एक हो गए हैं। अब सारे केंद्रीय मंत्रियों और पार्टी प्रवक्ताओं को एक मजबूत हथियार बैठे बिठाए मिल गया है। इस मामले में विपक्ष के नेता अपरिपक्व नजर आए हैं। शीर्ष अदालत पेगासस मामले में भी अपना यह रुख जाहिर कर चुका था कि जब तक कोई पक्ष अपने आरोपों को पुष्ट करने के लिए ठोस तथ्य नहीं रखेगा तब तक किसी को भी कटघरे में खड़़ा करना संभव नहीं होगा।
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