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समाज से संविधान तक है जाति का बोलबाला………

UB India News by UB India News
February 7, 2023
in पटना, बिहार
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समाज से संविधान तक है जाति का बोलबाला………
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत समय-समय पर चौंकाने वाले बयान देते रहते हैं। कभी वे हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी लोगों को हिन्दू कहते हैं, तो कभी आरक्षण की समीक्षा की बात कहते हैं। उनका ताजा बयान जाति व्यवस्था को लेकर आया है। उन्होंने कहा है कि जातियां पंडितों की देन हैं। ईश्वर एक है और उसने सबको एक समान पैदा किया है। कोई भेदभाव नहीं किया। पंडितों ने जाति-वर्ण का विभेद पैदा किया है। उनका यह बयान में कोई आपत्तिजनक बात तो नहीं है, लेकिन देश की संवैधानिक व्यवस्था ने जातियों को अहमियत दी है। इसलिए इसे खारिज करना आसान काम नहीं। अब अंदेशा इस बात का है कि कहीं ये बयान नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के लिए मुंहमांगा मुद्दा न बन जाए।

क्या हो सकता है मोहन भागवत के बयान का असर
मोहन भागवत का बयान उस व्यवस्था को कैसे खारिज करेगा, जिसमें जातियों को आधार बना कर आजादी के बाद से आरक्षण की व्यवस्था की गयी है ? गोरखा या सिख रेजीमेंट जैसी व्यवस्था भारतीय पलटन में है। समाज का पूरा ताना-बाना जाति पर ही आधारित है। और तो और, बिहार सरकार जाति आधारित गणना करा रही है, ताकि समाज के लोगों को आबादी के अनुपात में उनका हक सुनिश्चित किया जा सके। ऐसे में भागवत का बयान भले ही साफ मन से दिया गया हो और उसमें उच्च कोटि की विचारधारा का दर्शन हो रहा हो, लेकिन उस पर अमल करना टेढ़ी खीर है। भागवत के बयान की सबसे बड़ी बात पंडितों (आम बोलचाल में ब्राह्मण के लिए प्रयुक्त) के अहं को चोट पहुंचाने वाली साबित हो सकती है। ब्राह्मण वैसे ही आज सबके निशाने पर हैं। दलित और पिछड़ों की राजनीति करने वाले तो वैसे भी ब्राह्मणों पर हमेशा तरह-तरह के दोष मढ़ते रहते हैं।

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आरक्षण पर दिए बयान से 2015 में बीजेपी को हुआ था नुकसान
याद करें, बिहार विधानसभा का 2015 में हुआ चुनाव। लालू यादव की पार्टी आरजेडी और नीतीश कुमार के दल जेडीयू साथ-साथ चुनाव लड़ रहे थे। सीधे कहें तो आज जैसी जुगलबंदी दोनों दलों में है, वैसा ही तालमेल दोनों में उस वक्त भी था। मोहन भागवत बिहार के दौरे पर आये तो आरक्षण को लेकर बयान दिया। उन्होंने कहा कि आरक्षण की अब समीक्षा का वक्त आ गया है। उनके इस बयान के बारे में तब लालू प्रसाद यादव ने यह कह कर प्रचारित किया कि बीजेपी आरक्षण को खत्म करना चाहती है। इसका परिणाम सबने देखा। बीजेपी को काफी नुकसान हुआ और आरजेडी-जेडीयू ने बयान को भुना कर अपनी सरकार बना ली। इस बार 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के तकरीबन सवा साल पहले भागवत के इस बयान का क्या असर होता है, देखने वाली बात होगी।

जाति गणना कराने वालों के हाथ आ गया है हथियार
बिहार की बात करें तो इस बयान के बाद अनुमान यही लगाया जा रहा है कि भागवत ने जाति की गणना कराने वाली आरजेडी-जेडीयू की सरकार को फिर से बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल होने वाला एक हथियार थमा दिया है। ये इसे इस रूप में फिर प्रचारित करेंगी कि जाति खत्म कर मोहन भागवत आरक्षण का हक मारना चाहते हैं। जो दल जाति आधारित गणना को बड़ा मुद्दा बना कर इस पर अमल कर रहे हैं, वे तो निश्चित ही इसे भुनाने का प्रयास करेंगे। सपाट शब्दों में कहें तो भागवत ने बैठे-बिठाए विपक्ष को एक चुनावी मुद्दा थमा दिया है। बीजेपी को मुसलमानों की नाराजगी से कोई खास फर्क तो नहीं पड़ने वाला। इसलिए कि मुसलमानों का वोट बीजीपी को विरले ही मिलता है। एक ईश्वर और उसकी बनायी दुनिया में रहने वाले सब एक की अधारणा भागवत के साफ मन की बात जरूर है, लेकिन इससे न मुसलमान इत्तेफाक रखेंगे और न जातियों में बंटा समाज इसे पचा पायेगा। पंडितों पर इस विभाजन की तोहमत भी उन्हें जरूर नाराज करेगी, जो बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक माने जाते हैं। इसलिए अनुमान तो यही लगता है कि बीजेपी के लिए भागवत ने अपने बयान से एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। जाति-धर्म की बातें पंडितों की देन या कारनामा बता कर भागवत ने उन्हें भी बीजेपी के खिलाफ उकसाने का काम किया है।

समाज से संविधान तक है जाति का बोलबाला
जातियों के खांचे में सिर्फ समाज ही नहीं बंटा है, बल्कि देश को सुचारू ढंग से चलाने के लिए बने संविधान में भी जाति का जिक्र है। जाति के आधार पर नौकरियों और चुनाव क्षेत्रों में आरक्षण की सीमा निर्धारित है। लगभग हर प्रदेश में जाति गणना की मांग भी होती रही है। पहले दो राज्यों ने जाति गणना करायी भी है। अब तो बिहार सरकार भी जातियों की गणना करा रही है। इसके लिए सरकार बड़ी रकम खर्च कर रही है। इसकी उपयोगिता का प्रारूप भी बिहार सरकार ने बना रखा है। ऐसे में जाति की अधारणा खत्म करने का मोहन भागवत का विचार पवित्र भाव का होते हुए भी राजनीतिक रूप से बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

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