एक जमाना था जब मिट्ठू मियां सीताराम बोलते थे और उनकी इस अदा पर लोग लहालोट हो जाते थे। फिर जय श्रीराम का उद्घोष होने लगा और रामजी अकेले अपने धनुष के साथ रह गए। सीता मैया पता नहीं पृष्ठभूमि में गइ या फिर वन को चली गइ। पर वे रामजी के साथ सिंहासन पर फिर बैठी नजर नहीं आइ। अब मामाजी जय श्री हरि का जाप करने लगे हैं। मामाजी सिर्फ कंस ही नहीं थे और मामाजी सिर्फ शकुनि ही नहीं थे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान भी मामाजी हैं। नहीं जी नहीं‚ कोई उन्हें मामू बना नहीं रहा है। वे स्वेच्छा से बने मामू हैं। स्वेच्छा से लोग अक्सर चाचा‚ ताऊ‚ अंकल बनना ही पंसद करते हैं‚ मामू बनना कोई पसंद नहीं करता‚ लेकिन शिवराजजी मामू ही बने। खैर‚ यह उनकी अपनी इच्छा है और इच्छा से बना रिश्ता है। हम तो बात कर रहे हैं उनके श्री हरि के जाप की। इधर जब से हिंदी को सरकारी भाषा बनाने पर फिर से जोर दिया जाने लगा है‚ तब से लोग मेडिकल की पढाई हिंदी में ही कराने को ललक उठे हैं। इसी ललक के चलते शिवराजजी ने डॉक्टर लोगों को सलाह दे दी कि वे दवा की पर्ची बनाते हुए उस पर आरएक्स की बजाय जय श्री हरि लिखें। वे चाहते तो जय श्रीराम लिखने की सलाह भी दे सकते थे। पर उन्होंने यह सलाह न देकर जय श्री हरि लिखने की सलाह दी। क्योंॽ पता नहीं जी!
लेकिन जी‚ यह दवा की पर्ची पर लिखा श्री हरि पढेगा कौनॽ क्योंकि दवा की पर्ची पर लिखा डाक्टर का हस्तलेख तो हो सकता है खुद डॉक्टर भी न पढ पाए। यह हुनर तो ऊपर वाले ने सिर्फ कैमिस्ट को ही बख्शा है। हस्तलेख तो न जाने कितनों का खराब होता है‚ वे लोगों के मजाक का विषय भी बनते हैं। लेकिन जानबूझकर अपना हस्तलेख सिर्फ डॉक्टर ही खराब करते हैं‚ ऐसा माना जाता है। ऐसे में श्री हरि लिखने से भी क्या फायदा होगा! इससे तो मौखिक राम–राम अच्छी। अलबत्ता‚ एक जमाना था जी‚ जब ओम लिखने का बडा प्रचलन था। यहां तक कि लोग अपने परीक्षा के पर्चे की शुरुआत भी ओम लिखकर करते थे। छात्र अपनी कॉपियों में काम की शुरुआत ओम लिखकर करते थे। शिक्षकों को भी इससे कोई खास परेशानी नहीं होती थी। लेकिन जब जय श्रीराम का जमाना आया तो सीताराम की तरह ही ओम से शुरुआत करना भी प्रचलन से बाहर हो गया। लेकिन अब शिवराजजी न तो डॉक्टर की पर्ची की शुरुआत ओम से करवाना चाहते हैं‚ न सीताराम की तरफ वापस लौटना चाहते हैं और न ही जय श्रीराम पर टिके रहना चाहते हैं। वे तो जय श्रीहरि से एक नई शुरुआत करना चाहते हैं। बस समस्या यही है कि डॉक्टर के लिखे को पढेगा कौन!





