आजकल अपने देश में संविधान की दुहाई देने का रिवाज चल पड़ा है। इस मामले में आल इंडिया मजलिस–ए–इत्तेहादुल मुसलमीन यानी एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी का नाम सबसे आगे है। कई अन्य दलों की तरह मजलिस भी एक पारिवारिक पार्टी है और अपने स्थापना काल से ही विवादों में रही है‚ इसकी स्थापना १९२८ में हैदराबाद नवाब महमूद नवाज खान ने की थी। मजलिस के लोग १९४८ तक हैदराबाद को अलग राज्य बनाने की मांग करते रहे।
मजलिस के संस्थापक सदस्यों में हैदराबाद के राजनेता सैयद कासिम रिजवी भी शामिल थे। रिजवी ने अपनी सदारत में रजाकार के नाम से एक हिंसक संगठन बना रखा था। रजाकारों पर उपद्रवी होने का आरोप लगे थे । सन १९४८ में हैदराबाद का भारत में विलय होने के बाद भारत सरकार ने रजाकारों पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकार ने १९५७ में मजलिस पर से प्रतिबंध हटा लिया। इसी दरम्यान कासिम रिजवी पाकिस्तान चला गया और मजलिस को अपने ही खानदान के मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी के हवाले कर दिया। तब से यह पार्टी एक परिवार की बन कर रह गई है। वहाद के बाद सलाहुद्दीन एआईएमआईएम के अध्यक्ष बने और आगे चलकर इनके ही बेटे असदुद्दीन ओवैसी अध्यक्ष बने जो अभी सांसद हैं। इनके अलाव छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी विधायक हैं।
ओवैसी को राजनीति में मुसलमानों का एक तरफा चेहरा माना जाता है। इन्होंने मुसलमानों के हर मामलों जैसे सामाजिक‚ आर्थिक‚ राजनीतिक और धार्मिक मामलों में सुधार और विकास संबंधी कानून को इस्लाम विरोधी बताकर विरोध करने की आदत बना ली है। संविधान में उल्लेखित मौलिक अधिकारों की बात करते हैं‚ पर जब संविधान में उल्लेखित मूल कर्तव्यों का पालन करने का वक्त आता है तो इस्लाम विरोधी का तर्क देकर भागने लगते हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जब संविधान बनाने का मौका आया तो डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति का गठन हुआ था। उस समिति में कानूनविद सैयद मुहम्मद सादुल्लाह भी थे। ये समिति में मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि भी माने गए थे। सादुल्लाह ने समिति की बैठक में प्रस्तावित और पारित किसी प्रावधान का विरोध नहीं किया था। आशय यह है कि संविधान में प्रदत्त अधिकारों में से आर्थिक‚ समता और स्वतंत्रता आदि अधिकारों की दुहाई देकर ओवैसी और उनके खैराती दोस्त सरकार की हर योजनाओं में अपनी हिस्सेदारी पक्की कराने के लिए तमाशा करते रहते हैं। दूसरी ओर सरकार जब सामाजिक–धार्मिक और देशभक्ति के मामले में समरसता और मूल अधिकारों के पालन संबंधी कोई कदम उठाती है तो उसे इस्लाम पर खतरा बता कर संविधान का विरोध करने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर संविधान के अनुच्छेद ५१ (क) पर गौर करें‚ यहां उल्लेख है कि सभी लोग संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों‚ संस्थाओं‚ राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का पालन करें। मगर ये इन सब बातों खासकर राष्ट्रध्वज को सम्मान देने से परहेज करते हैं।
इसी तरह एक प्रावधान यह है कि भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें। जो धर्म‚ भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो‚ ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो ्त्रिरयों के सम्मान के विरुद्ध है। मौजूदा सरकार ने महिलाओं के हालात के सुधर के मामले में जो कदम उठाए हैं‚ उनमें से कई मामलों का धर्म के आधार पर विरोध हुआ है। इसी तरह संविधान में मूल कर्तव्यों की मणिमाला में यह निर्देश है कि अपने देश की सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझें और उसका परिरक्षण करें। इसी तरह देश के हर नागरिक का दायित्व है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण‚ मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे और सार्वजानिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे। आम तौर पर देखा जा रहा है कि वर्ग विशेष के लोग संविधान की व्याख्या करते समय अपने धर्म विशेष का उल्लेख कर अव्यावहारिक परंपराओं को जारी रखने का समर्थन करते हैं‚ जबकि सरकार सदियों से जारी सामाजिक जकड़न को दूर करना चाहती है। तीन तलाक की प्रक्रिया में सुधार के लिए सरकार के फैसले का विरोध सबको याद है। इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश में निजी क्षेत्र के गैर मान्यता प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों के हालात का जायजा लेने का विरोध होने लगा है।
वर्षों पहले संविधान की उद्देशिका में दर्ज शब्दावली को लेकर भी अल्पसंख्यक समाज के नेताओं ने बवाल मचा रखा था। अंततः सरकार ने संविधान की उद्देशिका में समाजवादी‚ धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्द को ४२ वें संविधान संशोधन १९७६ के जरिये जोड़ दिया गया। तब सरकार के इस निर्णय को दूरगामी परिणाम वाला कह कर प्रचारित किया गया था। विशेष परिस्थितियों का तर्क देकर तत्कालीन सरकार ने धारा ३७० के तहत जम्मू–कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था। सरकार की नियत साफ होने के बावजूद खैराती नेताओं ने केंद्र सरकार से मिलने वाली अनुदान राशि का गैर वाजिब फायदा उठाया। दूसरी तरफ जम्मू–कश्मीर में लाखों कश्मीरी पंडितों का उत्पीडन हुआ। यहां तक कि इन्हें निर्वासन के लिए मजबूर होना पडा। तीसरी ओर विदेशी ताकतों की मदद से यहां आतंकवादियों ने अपना जाल बिछा कर तहस–नहस का खेल किया।
इस उजड़े चमन में बहार लाने के लिए केंद्र सरकार ने ठोस कदम उठाया और धारा ३७० को रद्द कर जम्मू–कश्मीर ही नहीं बल्कि देश में भी एकता और अखंडता का संदेश दिया। हालांकि सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय को भी खैराती नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने की कोशिश की पर वे असफल रहे। साफ है कि एक बड़ा वर्ग अपनी राजनीतिक दुकानदारी चमकाने के लिए बड़ी चतुराई से संविधान की दुहाई देकर लाभ उठाता है। सरकार जब कालांतर में योजनाओं में आई विसंगतियों को दूर करने के लिए उपाय करती है तो खैराती जमात का रुख संविधान के प्रति बेवफाई का हो जाता है। हकीकत को नकार कर यह जमात खुद को पीडि़त की तरह पेश करता है ताकि उसकी सियासी दुकानदारी चलती रहे।







