बीते एक दशक में तीसरी बार बिहार गठबंधन फेरबदल का गवाह बना। यह क्यों हुआ‚ कैसे हुआ‚ इसका विश्लेषण राजनीतिक प्रेक्षक कर रहे हैं। इस गठबंधन बदल के बाद फिर से चुनाव पूर्व गठबंधन को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल‚ सवाल यह है कि जब दो दल संयुक्त रूप से जनता से शासन का जनादेश लेकर आते हैं तो फिर एक दल विपक्ष के साथ मिलकर सरकार कैसे बना सकता हैॽ नैतिक तौर पर तो यह सरासर गलत है।
यही बात व्यक्तिगत तौर पर पाला बदलने वाले विधायकों पर भी लागू होती है। प्रतिनिधियों की आयाराम–गयाराम संस्कृति पर कुछ हद तक दलबदल कानून रोक लगाने में सफल रहा है‚ इसके बावजूद जनादेश की भावना का अक्षरशः पालन नहीं हो पा रहा। कहीं दो तिहाई की आड़़ में तो कहीं सरकार बनाने के लिए न्यूनतम संख्या के लिए विधायकों का इस्तीफा दिलवाकर सदन में बहुमत के आंकड़े़ का जुगाड़़ कर लिया जाता है। महाराष्ट्र में कुछ इसी तरह के सत्ता बदल का मामला सर्वोच्च अदालत में है‚ जिसमें कई बुनियादी प्रश्नों पर निर्णय आने की उम्मीद है। बता दें कि शिवसेना में विधायकों के बहुमत वाला समूह पार्टी के खिलाफ जाकर विपक्षी दल भाजपा के साथ सरकार बना ले गया। महाराष्ट्र में भाजपा–शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिला‚ मगर मुख्यमंत्री को लेकर बात नहीं बनी। जिसके बाद भाजपा ने विपक्षी राकांपा के एक प्रमुख नेता को साध कर सरकार बनाने का असफल प्रयास किया। इसके बाद शिवसेना ने विरोधी कांग्रेस–राकांपा के साथ मिलकर सरकार बना ली। खैर सत्ता के इस ‘म्यूजिकल चेयर’ खेल में जनादेश की भावना के सम्मान की परिभाषा का मूल प्रश्न बरकार है। नैतिकता का तकाजा तो यही है कि चुनाव पूर्व गठबंधन से बनी सरकार ना चल पाए तो पुनः जनता के बीच जाना चाहिए। इसमें एक पेच पांच साल के भीतर चुनाव का है‚ जिसमें बड़़ी रकम खर्च होती है। इसलिए माननीयों द्वारा पाला बदलने पर अगला चुनाव नहीं लड़़ने पर रोक पर विचार किया जा सकता है। इससे इतर बड़़ा सवाल दलों के लोकतांत्रिकरण का भी है‚ जहां एक परिवार–एक व्यक्ति पार्टी को हांक रहे हैं। जाहिर है दलों के लोकतांत्रिकरण का विषय गंभीर विमर्श का विषय है। हां‚ इतना जरूर है कि उपरोक्त सवालों को संवैधानिक दायरे में लाना आसान नहीं। खासकर जनादेश की परिभाषा को। क्योंकि ये नियम से ज्यादा नैतिकता का मामला है।
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