ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की बरसी पर स्वर्ण मंदिर में खालिस्तान के समर्थन में नारा लगाना वाकई देश के लिए चिंता का सबब है। कट्टरपंथी सिख संगठनों के साथ ही शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के समर्थकों ने खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाए हैं। साफ है कि सूबे को फिर से धार्मिक उन्माद की आग में झोंकने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। यहां की शांति और सद्भाव को बिगाड़ने का कुचक्र रचा जा रहा है। नि:संदेह यह करतूत पाकिस्तान की है, मगर देश के भीतर भी कई गुट मौजूद हैं जो किसी भी कीमत पर अमन कायम होते देखना पसंद नहीं करते।
खालिस्तान की आग लहकाकर विरोधी पक्ष भारत की एकता और अखंडता पर चोट करना चाहता है। ऐसे कु-पढ़ों के लिए सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ना सबसे आसान काम होता है। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि 80 के दशक में जब खालिस्तान के नाम पर अलग देश बनाने का जो कुचक्र रचा गया था, उसे पटरी पर लाने में काफी मशक्कत की गई थी। इसमें कइयों की जान चली गई थी।
इसी की प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों ने ही हत्या कर दी थी। हालांकि बाद में खालिस्तान का समर्थन या उसके समर्थक में माहौल बनाने की कई बार कोशिश की गई, मगर यह फलसफा परवान नहीं चढ़ सका। साफ तौर पर परिलक्षित होता है कि देश की जो सर्वधर्म सम्भाव का जो दर्शन दिया है, उसकी रक्षा करना परमधर्म है। रह-रह कर देश के गंगा-जमुनी तहजीब को जख्मी करने की साजिश रची जा रही है। यह बात हर किसी के संज्ञान में रहनी चाहिए कि धर्म के नाम पर या भाषा के नाम पर देश के टुकड़े करने की मंशा कभी पूरी नहीं होती है।
राज्य में नई नवेली सरकार के लिए निश्चित तौर पर परीक्षा की घड़ी है। उसे सबसे पहले उन अमन विरोधी तत्वों की पहचान करने और उन्हें समझाने की कोशिश करनी होगी। खासकर इस साजिश में आगे रहने वाले युवाओं को समझाने की दरकार है। ‘खाली माथा, शैतान का घर’ होता है, अत: उन युवाओं को चिह्नित कर उन्हें रोजगार देने की नीति सरकार को बनानी होगी। अलगाव के विचार को तभी समाप्त किया जा सकता है जब ईमानदारी से कोशिश की जाए। उग्र तत्वों को तरीके से समझाने की महती जरूरत है। जब तक उन्हें मुख्यधारा में नहीं लाया जाएगा, तब तक अलगाव की भावना बलवती होती जाएगी। इसे जल्द खत्म करना होगा।







