अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूट चुका है और लगातार पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है। होर्मुज में वाणिज्यिक हमलों पर ईरान द्वारा हमले किए जाने से नाराज होकर अमेरिका ने हमले किए थे और अब अमेरिका ने ईरान को चेतावनी जारी कर दी है कि अगर होर्मुज पर अब जहाजों पर हमले हुए तो अच्छा नहीं होगा।
अमेरिका ने ईरान को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि ईरान वाणिज्यिक जहाजों के लिए होर्मुज को खोले और जहाजों पर हमले बंद करे। अमेरिका ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर ईरान ने ऐसा नहीं किया तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। यह चेतावनी ऐसे समय दी गई है, जब अमेरिका और ईरान एक दूसरे पर हवाई हमले कर रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान एक सार्वजनिक बयान जारी करे कि होर्मुज जलडमरूमध्य सभी जहाजों के लिए खुला है और अब जहाजों पर हमले नहीं होंगे। साथ ही जहाजों पर कोई शुल्क भी नहीं लगाया जाएगा। अमेरिका ने साफ कहा कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो ये ईरान के लिए अच्छा नहीं होगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका पर अंतरिम युद्धविराम समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया है। उन्होंने एक्स पर लिखा, ईरान ने अब तक अपना वादा निभाया है, जबकि अमेरिका ने समझौते का उल्लंघन किया। अराघची ने कहा कि ये अमेरिका द्वारा किए जाने वाले उल्लंघनों और गलतियों की पुनरावृत्ति है।
ईरान के साथ शुरुआती समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले, राष्ट्रपति ट्रंप और उनके सहयोगियों ने अपनी रणनीति बताई थी। वह यह थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य को आवाजाही के लिए खोल दिया जाएगा, और अमेरिका तेल के निर्यात पर लगी रोक हटा देगा, ताकि ईरान अरबों डॉलर का तेल बेच सके। ट्रंप का मानना था कि वर्षों की पाबंदियों के बाद, ईरान को तेजी से भारी कमाई और पश्चिमी देशों के बैंकों में डॉलर तक आसानी से पहुंच मिलने लगेगी। पर, शायद ऐसा नहीं है।
समझौते के एक महीने से भी कम समय में, होर्मुज से गुजर रहे तीन जहाजों पर ईरान की तरफ से हमले हुए। इसके बाद ट्रंप ने उस छूट को रद्द कर दिया, जिसके तहत ईरान तेल बेच सकता था। अमेरिका ने दो रातों में ईरान के 170 से अधिक सैन्य ठिकानों पर बमबारी की। और, अब स्थायी समझौते पर बातचीत का कोई कार्यक्रम नहीं है, जिस पर दोनों पक्षों ने 60 दिनों में बातचीत पर सहमति जताई थी। बमबारी और शुरुआती समझौते के नाकाम होने के बाद, अगर ट्रंप और उनके सहयोगियों के पास अब कोई ‘प्लान सी’ है, तो उन्होंने इसके बारे में कुछ नहीं बताया है। इसके बजाय, ऐसा लगता है कि वे तेल पर पाबंदियों और बमबारी की कार्रवाई की ओर लौट रहे हैं, जिन्हें ट्रंप विनाशकारी बताते हैं, और जिनसे अब तक सिर्फ मौजूदा उलझन ही पैदा हुई है।
बुधवार को उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा, ‘बात बिल्कुल साफ है। अगर वे जहाजों पर गोलीबारी करते हैं, तो हम उन्हें बुरी तरह से तबाह कर देंगे।’ दूसरे शब्दों में कहें, तो लालच की नीति छोड़ दी गई है और सख्ती का तरीका फिर से अपनाया जा रहा है। लेकिन, ट्रंप प्रशासन ने अभी तक यह नहीं बताया है कि उसे क्यों लगता है कि आर्थिक युद्ध और बमबारी का यह मिला-जुला तरीका इस बार अलग नतीजा देगा। अनुभवी राजनयिक रिचर्ड एन हास ने कहा, ‘अमेरिका एक तरह से रणनीतिक गतिरोध में फंस गया है। दुविधा यह है कि वह जितना ज्यादा हमला करता है, ईरान भी खाड़ी क्षेत्र के तेल और ऊर्जा से जुड़े ढांचे पर उतने ही हमले करने लगता है। वहीं, अमेरिका अभी तक यह नहीं समझ पाया है कि इन ठिकानों की सुरक्षा कैसे की जाए।’
ऐसा लगता है कि ईरान को तेल बेचने से फायदा उठाने देने का फैसला ट्रंप के लिए पूरी तरह से उल्टा पड़ गया। अपने पहले कार्यकाल में, और कुछ समय पहले तक, वह सख्त रवैया अपनाने में ज्यादा दिलचस्पी रखते थे। लेकिन, लगता है कि ट्रंप भी ईरान में मौजूद गहरे मतभेदों के बीच फंसे हुए हैं। ये मतभेद इस हफ्ते ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान भी साफ तौर पर दिखाई दिए। मुख्य वार्ताकारों में से एक विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर भी अंतिम संस्कार के जुलूस के दौरान पत्थर फेंका गया और उन पर तुष्टीकरण का आरोप लगाया गया। हमलावरों ने उन्हें बुरा-भला कहा और उनकी मौत की मांग की। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन को भी गुस्साई भीड़ से बचाने के लिए सुरक्षा टीम को आगे आना पड़ा। लेकिन, जब ट्रंप ईरान के बारे में सबके सामने बात करते हैं, तो वह समाज में फैली फूट के बारे में बहुत कम बात करते हैं।
नाटो शिखर सम्मेलन से लौटने के बाद, ट्रंप और उनके सहयोगियों ने अपने अगले कदमों के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम कहा। नाम न बताने की शर्त पर एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि प्रशासन अब भी शांतिपूर्ण समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध है, और उन्हें उम्मीद है कि ‘तकनीकी बातचीत’ जारी रहेगी। लेकिन, इसमें भी विरोधाभास है, क्योंकि तेहरान और वाशिंगटन के बीच मतभेद ‘तकनीकी’ नहीं हैं, बल्कि वे राजनीतिक हैं, और निचले स्तर के वार्ताकारों के पास उन्हें हल करने का अधिकार नहीं होगा।
एक उदाहरण परमाणु कार्यक्रम के भविष्य से जुड़ा है। जून में हुए संघर्ष विराम समझौते में सभी अहम मुद्दों पर स्थिति साफ नहीं है, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या ईरान अपने परमाणु ईंधन के भंडार पर अपना नियंत्रण बनाए रखेगा। बराक ओबामा के कार्यकाल में 2015 के एक समझौते के तहत, ईरान ने अपने तब के भंडार का 97 प्रतिशत हिस्सा सौंप दिया था। ट्रंप इस बात को लेकर बहुत संवेदनशील हैं कि उन्हें ओबामा से कम हासिल हो सकता है। लेकिन, पहला राजनीतिक संघर्ष इस सवाल पर हो सकता है कि जलडमरूमध्य पर किसका नियंत्रण होगा। इस मामले में प्रशासन को उस समझौता ज्ञापन में अस्पष्ट भाषा वाले पैराग्राफ की कीमत चुकानी पड़ रही है, जिस पर ट्रंप ने वर्साय में हस्ताक्षर किए थे। यह इसका बेहतरीन उदाहरण है कि जब दस्तावेज में मतभेदों को स्पष्ट करने के बजाय उन्हें अस्पष्ट छोड़ दिया जाता है और बाद में उनकी अलग-अलग तरह से व्याख्या की जाती है, तो क्या होता है।
समझौते के पैराग्राफ पांच में लिखा है-‘इस एमओयू पर हस्ताक्षर होने के बाद, ईरान अपनी पूरी कोशिश करके वाणिज्यिक जहाजों के लिए फारस की खाड़ी से ओमान सागर तक और ओमान सागर से फारस की खाड़ी तक सुरक्षित आवाजाही का इंतजाम करेगा, जिसके लिए सिर्फ 60 दिनों तक कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।’ ट्रंप और उनके सहयोगियों को लगा कि यही जहाजों की आवाजाही शुरू करने का मुख्य तरीका है और इससे ईरानियों पर जिम्मेदारी आ जाएगी। ईरानियों ने इसे तेल ले जाने वाले अहम रास्ते पर नियंत्रण करने के मौके के तौर पर देखा और जोर दिया कि जहाज उनके तट के सबसे करीब वाले रास्ते से गुजरें। आखिरकार, ईरान ने संकेत दिया है कि वह इस जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए शुल्क लेने की योजना बना रहा है। जब अमेरिकी नौसेना ने ओमान के पास एक अलग रास्ते से जहाजों को सुरक्षित ले जाना शुरू किया, तो ईरान ने कुछ जहाजों पर गोलीबारी की। अब, लॉयड्स ऑफ लंदन के अनुसार, इस जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बहुत कम हो गई है। इसी बात से ट्रंप परेशान हुए और उन्होंने घोषणा कर दी कि यह समझौता ‘खत्म’ हो गया है।
ट्रंप के सहयोगियों का कहना है कि वह समझौते का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह समझौता कामकाज के आधार पर है और ईरान के काम इस कसौटी पर खरे नहीं उतरे। इन सब बातों से ट्रंप फिर उसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां वह अप्रैल में थे, जब उन्हें पता चला था कि सैन्य ताकत से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। ईरान में कई लोग किसी भी कूटनीतिक समाधान को अगले इस्राइली-अमेरिकी हमले तक का समय काटने का माध्यम ही मानते हैं।







