पिछले कुछ दिनों से दुनियाभर के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर आ रही रिपोर्टों, स्टोरियों और स्तंभों में एक अलग दुनिया दिख रही है। अमेरिका के कई हिस्सों के लोग तकनीक, बाजार और राज्य की व्यवस्था से परे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, लेकिन बाजार के खिलाड़ी इस प्रतिरोध को ‘हिलबिली अपराइजिंग’ कहकर मजाक उड़ाते दिख रहे हैं। क्या इन विशेषताओं के झरोखों में 18वीं-19वीं सदी का वह इतिहास नहीं दिख रहा, जिसने एक तरफ दुनिया को औद्योगिक क्रांति और उपनिवेशवाद दिया था, वहीं दूसरी तरफ ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ से लेकर ‘दास कैपिटल’ के जरिये एक ऐसा वर्ग खड़ा कर दिया था, जिसने नई व्यवस्था और नए इतिहास को जन्म दिया? क्या इतिहास अब स्वयं को दोहराने की ओर बढ़ रहा है? या उससे भी अधिक जटिल समय से हमारा सामना होने वाला है?
पिछले दिनों प्यू रिसर्च सेंटर का एक सर्वे आया, जिसमें मुख्य रूप से पांच बातें अधिक प्रभावित करने वाली लगीं। पहली, 24 देशों में किए गए सर्वे में अमेरिकी सबसे अधिक निराशावादी दिखे। उनका मानना है कि ‘एआई’ के प्रभाव सकारात्मक के मुकाबले नकारात्मक अधिक होंगे। दूसरी, अमेरिका में ‘एआई’ पर बहस अब केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रह गई, बल्कि एक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दा बन चुकी है। तीसरी, अमेरिकियों का कहना है कि ‘एआई’ पहले ‘व्हाइट कॉलर’ नौकरियां खत्म करेगा, फिर ‘ब्लू कॉलर’ नौकरियों को। चौथी, यदि इसके कारण दौलत कुछ कंपनियों के हाथ में सिमट गई और बाकी लोग बेरोजगार हुए, तो लोकतंत्र टिक नहीं पाएगा। पांचवीं, ‘एआई’ लोगों को और भी अकेला बना देगा। इससे ‘ट्रांसह्यूमनिज्म’ का खतरा भी है, क्योंकि इसके जरिये इन्सान अपनी जैविक सीमाओं से आगे निकल सकता है। सवाल यह है कि अमेरिकियों का यह डर क्या जायज है? शेष दुनिया उतनी चिंतित क्यों नहीं, जितना कि अमेरिका?
प्रश्न यह कि क्या इस तरह की चुनौतियों का निक्षेपण करने के लिए आज कोई देश, कोई नेता अथवा सरकार है, जो दैवीय राजत्व से नीचे उतरकर सामाजिक अनुबंधों के सहारे आगे बढ़ने का साहस करे? क्या राज्य और उनकी सरकारें इस संदर्भ में कोई व्यवस्था बना सकती हैं? शायद नहीं। दरअसल, यह छद्म वैश्वीकरण और छद्म उदारवाद का दौर है, जिसे हम बनावटीपन के साथ नवविश्ववाद और नवउदारवाद का नाम दे सकते हैं। यहां विशुद्ध (प्योर) कुछ भी नहीं है, सब हाइब्रिड है। सर्वत्र कौन जीतेगा या कौन हारेगा, की विषाक्तता भरी राजनीति का प्रभाव है, जो समृद्ध साझे अनुभवों, विरासतों और हितों से बहुत दूर खड़ी है। फिर तो जो प्रतिस्पर्धा, संघर्ष या युद्ध दिख रहे हैं, उनकी अगुआई ड्रोन, रासायनिक या जैविक हमले ही करेंगे और इन सबके पीछे खड़ी हो सकती है एआई जैसी अदृश्य शक्ति। क्या तब भी हम सोच सकते हैं कि दुनिया किसी नियम आधारित व्यवस्था से चलेगी? या उस व्यक्ति, देश अथवा बाजार की इकाई से, जिसके पास ताकत नहीं, बल्कि एआई होगा?
वैसे नियम आधारित व्यवस्था को तो हम गाजा, कीव और तेहरान के कब्रिस्तानों में दफन होते हुए देख ही चुके हैं। इसलिए, उससे कोई उम्मीद रखना बेकार है। अब चिंता यह है कि नई व्यवस्था और ताकत में मनुष्य कहां खड़ा होगा, क्योंकि लोगों के मस्तिष्कों में अब यह सवाल तैरने लगा है कि जब नौकरियों को बड़े पैमाने पर ‘एआई’ खा रहा होगा, जब दुनिया भर के डाटा सेंटर लोगों के हिस्से का पानी पी रहे होंगे और फिर जो भ्रम फैलाया जा रहा होगा, वह पहले किसे तोड़ेगा? समाज को या राज्य को अथवा मनुष्य को? पता नहीं, परंतु शिकार मनुष्यता ही होगी, यह तय है। जो भी हो, दुनिया वैश्वीकरण के उस झूठे इश्तिहार के सहारे चलेगी, जो 1990 के दशक में दिमागों के साथ खेल रहा था या फिर उस भ्रम के साथ, जहां कुछ देश संरक्षणवाद और राष्ट्रवाद के नाम पर अधिनायकवाद को बढ़ाते हुए वैश्विक टकरावों को हवा दे रहे होंगे?
लोग भावी बदलावों के बीच अपने लिए एक भरोसा चाहते हैं। परंतु, यह भरोसा दिलाएगा कौन? बाजार, राजनीति या तकनीक? बाजार का चरित्र पहले से ही अदृश्य शक्तियों के हाथ में है, उससे उम्मीद करना बेमानी होगी। अब तो राजनीति का चरित्र भी बाजार तय करने लगा है। और रही बात तकनीक की, तो वह भी बाजार के हाथ में जा चुकी है। तब बचा कौन? एक बात और, ‘एआई’ बहुत तेजी से बदल रहा है, इसलिए इसे पकड़ पाना मुश्किल है। राजनीति इसके मुकाबले फिसड्डी है।
अमेरिका में यह देखने में आया है कि जितने समय में कांग्रेस (अमेरिकी संसद) एक सुनवाई करती है, उतने समय में नया ‘एआई’ मॉडल आ जाता है। ध्यान रहे कि वर्ष 2030 तक अत्याधुनिक एआई मॉडल विकसित करने के लिए आवश्यक विशाल डाटा सेंटर केवल वर्जीनिया या कैलिफोर्निया तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अमेरिका के अधिकांश क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सर्वर फार्म के रूप में स्थापित हो चुके होंगे। जैसे-सिलिकॉन हार्टलैंड यानी मिशिगन, विस्कॉन्सिन और ओहियो तथा इससे भी आगे बढ़कर दक्षिणी राज्यों, विशेषकर लुसियाना, मिसीसिपी और टेक्सास तक।
अमेजन, गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और ओरेकल जैसी कंपनियां मिलकर लगभग 750 अरब डॉलर का निवेश कर रही हैं, जबकि अन्य कंपनियां भी अरबों डॉलर लगा रही हैं। एक अनुमान के अनुसार, 2026 से 2030 के बीच दुनियाभर में एआई डाटा सेंटरों पर लगभग तीस खरब डॉलर खर्च होने वाले हैं। इन सेंटरों में खपत होने वाली बिजली करीब 12 गीगावाट के स्तर से इस दशक के अंत में पांच गुना हो जाएगी। तब तो अमेरिकियों का डरना स्वाभाविक है। वे जनरेटरों और कूलिंग सिस्टम के गूंजते शोर और इनकी ओर मुड़ती पानी की धाराओं से डर रहे हैं।
फिलहाल, इस समय में जो चिंताएं उभरती दिख रही हैं, वे निराधार तो नहीं हैं। विचार कीजिए कि जब एक नेता किसी दूसरे संप्रभु देश के चुने राष्ट्रपति को इसलिए उठा ले जा सकता है, क्योंकि उसे उस देश का तेल चाहिए। वही नेता एक अन्य देश पर इसलिए हमला कर दे, क्योंकि उसका दोस्त ऐसा चाहता है। छोटे देश जमींदोज कर दिए जाएं और दुनिया तमाशा देखती रहे। यह क्या है? सदी के सबसे खतरनाक कदमों की दस्तक या कुछ और, जो यह बताती है कि सनक, अधिनायकत्व और पोस्ट ट्रुथ के दशकों में शांति के सिरे पूरी तरह बिखर चुके हैं और उन्हें जोड़ने वाला वैश्विक नेतृत्व नदारद है। फिर एआई का असली उपयोगकर्ता कौन होगा और उसका मकसद क्या होगा? यह बात तो डराएगी ही। जो भी हो, यह व्यवस्था, बाजार और तकनीक की ‘ट्रिनिटी’ पर निर्भर करेगी।







