तृणमूल कांग्रेस का टूटना बदलती भारतीय राजनीति का एक ऐसा संकेत है, जिससे तमाम राजनेता सबक ले सकते हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणामों को अभी चालीस दिन ही पूरे हुए हैं और यह बात अब शीशे की तरह साफ है कि तृणमूल कांग्रेस का स्वर्णिम दौर लद गया है। एक हारी हुई पार्टी को एकजुट रखने के जैसे प्रयास तृणमूल कांग्रेस कर सकती थी, उनका नितांत अभाव दिखा है। तृणमूल कांग्रेस के आला नेताओं ने साबित कर दिया कि उनमें जुड़ने-जोड़ने का हुनर कम है। वैसे, राज्य स्तर पर विधानसभा में भी पार्टी बंट चुकी है, लेकिन उसका कोई स्पष्ट स्वरूप सामने नहीं आया है, जबकि पार्टी से अलग हुए 20 सांसदों की स्थिति स्पष्ट है। इन्होंने एक नए अल्प-चर्चित दल के नाम का सहारा लिया है। यह अलग तरह का दलबदल अपने आप में बहस का मुद्दा है। आम तौर पर राजनीतिक दल अपने चुनाव अभियान से सांसद तैयार करते हैं, पर यहां तो एक दल को एकमुश्त 20 सांसद हासिल हो गए हैं। यह कानूनन सही हुआ है या गलत, इस पर जरूरी बहस शुरू हो गई है और होनी भी चाहिए।
कुछ संकेत बहुत स्पष्ट हैं और जिनसे अनेक सवाल खड़े होते हैं। ममता बनर्जी ने खून-पसीने से बनाई अपनी पार्टी को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर क्यों नहीं लगाया? अगर वह मिल-बैठकर बात करतीं, तो संभव है, उनकी पार्टी सलामत रहती। ऐसा लगता है कि वह पूरी तरह से भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी पर निर्भर हो गईं। वंशवादी दलों के साथ यही समस्या है, इनमें दलीय लोकतंत्र का विशेष महत्व नहीं बचता है। वंशवाद ऐसी कमजोरी साबित हुआ है कि ममता बनर्जी ने न केवल राज्य में, बल्कि अपनी पार्टी में भी बहुमत गंवा दिया है। यह कहने में हर्ज नहीं कि तृणमूल अंदर से मजबूत नहीं थी और केवल सत्ता के रसायन ने उसे जोड़े रखा था। सत्ता का रसायन जैसे ही खत्म हुआ, पार्टी बिखर गई। कौन भूल सकता है कि राज्य में लगभग दुश्मनी की राजनीति हुई है? इसी का नतीजा है कि सूबे के बड़े-बड़े बड़बोले नेता शर्मसार से हैं और अपने बचाव के लिए किसी मजबूत छतरी की तलाश में हैं। यह सबक बड़ा है, जिसे शायर बशीर बद्र ने कुछ ऐसे बयान किया था- दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।
बंगाल में यह नए किस्म की राजनीतिक संस्कृति है, जिसमें टूटने का सलीका खास है। कुछ ही सप्ताह पहले आम आदमी पार्टी के सात सांसद समूह बनाकर भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में, सवाल उठता है कि तृणमूल से अलग हुए सांसद भाजपा में क्यों शामिल नहीं हुए? यहां फिर एक बार जमीनी प्रतिद्वंद्विता वाली बात सामने आती है। तृणमूल के नेताओं-कार्यकर्ताओं ने बीते 15 वर्ष में जिस तरह दुर्व्यवहार किया है, उस वजह से भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता तत्काल मेल-मिलाप के पक्ष में नहीं हैं। यहां राजनीतिक संस्कृति का अंतर आड़े आ रहा है और इस अंतर को सकारात्मक रूप से पाटना ममता बनर्जी की नई राजनीति की प्राथमिकता होनी चाहिए। हालांकि, युवा सांसद अभिषेक बनर्जी अपनी सियासत को जिस अदावत तक उतार लाए हैं, वहां से तृणमूल की स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता की ओर वापसी आसान नहीं होगी। अब रही बात एनडीए की, तो उसकी लोकसभा सीटों की संख्या 294 से बढ़कर 314 होने वाली है, पर वह अभी भी दो-तिहाई बहुमत से 46 सीट पीछे है। यहां फिर इसी सबक को याद करना होगा कि लोकतंत्र में ज्यादा से ज्यादा लोगों-दलों का यकीन जीतना ही सबसे सही रणनीति है।







