मामला चाहे राज्यसभा चुनाव का रहा हो या फिर एमएलसी चुनाव का या फिर अविश्वास या विश्वास प्रस्ताव के समय अक्सर राजनीतिक गलियारों में राजद के विधायकों का सत्ताधारी दल से संपर्क की बात आती है। अविश्वास प्रस्ताव में चेतन आनंद, प्रहलाद यादव, नीलम देवी या फिर राज्यसभा चुनाव के दौरान राजद के फैसल रहमान या फिर कांग्रेस के तीन विधायकों ने भी अनुपस्थित रह कर इस चर्चा को सच का मुहर लगाया है। एक बार फिर यह चर्चा बीजेपी एमएलसी जीवन कुमार ने उठा कर विपक्ष की राजनीति में भूचाल ला दिया है। तो क्या ताश के पत्ते की तरह बिखर जाएगा राजद का कुनबा? चलिए जानते हैं बीजेपी के कौन हैं टारगेट?
फैसल रहमान
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में, आरजेडी नेता फैसल रहमान ने ढाका विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार पवन कुमार जायसवाल को बहुत ही कम अंतर से हराया था। इनके बारे में यह चर्चा है कि ये राजद से इन दिनों नाराज चल रहे हैं और ये राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के भी संपर्क में हैं। इन्होंने अपनी लॉयल्टी एनडीए के प्रति राज्यसभा चुनाव के दौरान दिखाई भी थी। इन्हें उचित समय का इंतजार है।
आसिफ अहमद
फैसल रहमान के साथ रहने वाले आसिफ अहमद के बारे में भी चर्चा है। इन्होंने बिस्फी विधानसभा से बीजेपी के ही हरिभूषण ठाकुर को हराया था।
अनीता देवी
वारसलीगंज की विधायक अनिता महतो (अनीता कुमारी) भी बीजेपी रणनीतिकारों की सॉफ्ट टारगेट में हैं। अनिता महतो की शादी अशोक महतो जैसे अपराधी से हुई है। वे हाल ही में जेल से बाहर आए हैं। इनको लेकर चर्चा तो उसी दिन से शुरू हो गई जब अनीता महतो और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बीच मुलाकात हुई थी।
गोह के विधायक अमरेंद्र कुशवाहा
गोह के विधायक अमरेंद्र कुशवाहा को लेकर भी चर्चा है। हालांकि उनकी तरफ से ऐसा झुकाव नहीं आया है। पर यह माना जा रहा है कि कुशवाहा राजनीति में आए बदलाव के मद्दे नजर अमरेंद्र कुशवाहा की राजनीति में भी बदलाव आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
टूट रही पार्टियां बढ़ा रहीं है राजद का संकट: अश्क
बिहार विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद से ही राजद विधायकों के एनडीए के संपर्क में रहने और पाला बदल की अटकलें लगाई जाती रही है। कभी चिराग पासवान तो कभी रामकृपाल यादव ऐसी अटकलों को हवा देते रहे हैं। इसका ट्रेलर राज्यसभा चुनाव में दिख भी चुका है। यह चर्चा फिर से शुरू हुई है।
इस बार इस पर भरोसे की स्पष्ट वजह भी है। बंगाल में 15 साल से सत्ता पर काबिज टीएमसी जिस तरह ताश के पत्तों की तरह बिखरी है या महाराष्ट्र उद्धव ठाकरे की शिवसेना में टूट के संकेत मिल रहे हैं, उससे राजद के बारे में चल रही चर्चा को बल मिल रहा है। बिहार में एनडीए को किसी विपक्षी पार्टी को तोड़ने की जरूरत नहीं। अब तो क्षेत्रीय दलों के टूटने की हवा ही चल पड़ी है। आम आदमी पार्टी के दो राज्यसभा सांसदों के भाजपा में जाने के बाद टीएमसी का टूटना और अब महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) में बिखराव के संकेत से साफ है कि राजद में भी टूट हो जाए तो आश्चर्य नहीं।







