भाजपा नेता संजय मयूख तीसरी बार MLC बनेंगे या फिर बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव लड़ेंगे? परम्परा के मुताबिक, भाजपा किसी नेता को दो बार ही विधान परिषद में भेजती है। हालांकि इसका अपवाद भी हैं। भाजपा ने सुशील कुमार मोदी, गंगा प्रसाद और मंगल पांडेय को तीन बार विधान पार्षद बनाया था। सुशील कुमार मोदी बिहार उप मुख्यमंत्री थे। गंगा प्रसाद बाद में राज्यपाल के पद पर पहुंचे। मंगल पांडेय नीतीश सरकार में मंत्री रहे। यानी भाजपा कुछ चुनिंदा नेताओं के लिए ‘दो बार के नियम’ में ढील देती रही है। इस लिहाज से संजय मयूख का भी कद कम नहीं है। उन्हें अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे दिग्गजों का करीबी माना जाता है। इसलिए अगर वे तीसरी बार विधान पार्षद बनते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं।
संजय मयूख के लिए एक और विकल्प
लेकिन भाजपा की कार्ययोजना में संजय मयूख के लिए एक और विकल्प मौजूद है। नितिन नवीन के इस्तीफा देने के कारण बांकीपुर विधानसभा सीट अभी रिक्त है। संभावना है इस सीट पर जुलाई या अगस्त 2026 में उपचुनाव हो। नितिन नवीन इस सीट से लगातार चार बार विधायक रहे। वे कायस्थ जाति से हैं। माना जाता है कि जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा इस सीट पर किसी कायस्थ उम्मीदवार को ही मौका देगी। संजय मयूख भी कायस्थ जाति से हैं। बांकीपुर में इस बार कायस्थ जाति के ही किसी उम्मीदवार को टिकट मिलेगा, इसकी एक बड़ी वजह भी है।
कुम्हरार में कायस्थ का टिकट कटा, अब बांकीपुर में जोखिम नहीं ले सकती भाजपा
कुम्हरार में कायस्थ जाति का टिकट कटा तो उसने पार्टी हित में इसे भुला दिया। लेकिन अगर बांकीपुर में भी ऐसा ही होगा तो भाजपा अपने समर्पित वोटरों को खो सकती है। कुम्हरार सीट से पहले कायस्थ जाति के अरुण कुमार सिन्हा विधायक थे। वे तीन बार चुनाव जीत चुके थे। 2025 में सीटिंग विधायक रहते हुए भी उनका टिकट काट कर वैश्य समुदाय के संजय कुमार गुप्ता को उम्मीदवार बनाया गया। जब अरुण कुमार सिन्हा का टिकट कटा था, तब कायस्थ जाति में बहुत नाराजगी पैदा हुई थी।
हालांकि चुनाव में उन्होंने वोट भाजपा को ही दिया था। अब भाजपा बांकीपुर में यह गलती नहीं दोहराना चाहेगी। अगर कायस्थ समुदाय नाराज हो गया तो भाजपा पटना साहिब लोकसभा सीट और तीन विधानसभा सीट ( बांकीपुर, कुम्हरार और पटना साहिब) से हाथ धो सकती है। पटना महानगर में सबसे अधिक आबादी कायस्थ जाति की ही है।
संजय मयूख भी नितिन नवीन की तरह जमीन से जुड़े नेता
संजय मयूख भी नितिन नवीन की तरह कर्मठ, मेहनती, मिलनसार और जमीन से जुड़े नेता हैं। एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में राजनीति शुरू की। फिर अपनी मेहनत से सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़े। शत्रुघ्न सिन्हा फैंस एसोसिएशन से चर्चा में आये। 1990 में भाजपा के सदस्य बने। शुरुआती दिनों में पार्टी की प्रेस रिलीज, अखबारों के दफ्तर में पहुंचाए।
पांच साल मेहनत की तो 1995 में प्रदेश उपाध्यक्ष बने। फिर प्रदेश मीडिया प्रभारी बने। बिना किसी महत्वाकांक्षा के 18 साल तक अनवरत पार्टी का कम किया। 2013 में उनकी मेहनत को मान्यता मिली। भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय सह मीडिया प्रभारी का पद सौंपा।
संजय मयूख को राष्ट्रीय नेताओं का आशीर्वाद
2013 में जब संजय मयूख राष्ट्रीय सह मीडिया प्रभारी बने तो उसी समय राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का प्रभाव बढ़ना शुरू हो गया था। 2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। अमित शाह, संजय मयूख के काम से प्रभावित हुए। इसके बाद संजय मयूख अमित शाह के गुड बुक में आ गये।
अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे बड़े नेताओं का आशीर्वाद मिला तो 2016 में संजय मयूख बिहार विधान परिषद के लिए चुने गये। 2022 में भाजपा ने उन्हें फिर परिषद में भेजा।
उपचुनाव में टिकट के लिए कई और कायस्थ नेता दावेदार
अब भाजपा पर निर्भर है कि वह संजय मयूख को विधान परिषद में भेजती है या फिर विधानसभा उपचुनाव में उम्मीदवार बनाती है। वे दोनों चुनावों के लिए एक योग्य प्रत्याशी हैं। अगर भाजपा संजय मयूख को विधान परिषद में भेजती है तो उसके पास विधानसभा उप चुनाव के लिए कायस्थ जाति के कुछ और नेताओं का विकल्प मौजूद है।
इनमें प्रमुख हैं रणवीर नंदन (बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के अध्यक्ष), डॉ. अजय आलोक (भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता) और ऋतुराज सिन्हा (बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव पद पर रहे)। बांकीपुर विधानसभा सीट उपचुनाव के लिए ये तीन कायस्थ नेता भी दावेदार माने जाते हैं।







