सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर कराने की वैधता के खिलाफ दायर याचिकाओं पर फैसला सुना दिया है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि एसआईआर कराना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। साथ ही ये भी कहा कि देश में मुक्त और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए सांविधानिक अनिवार्यता की शर्त को भी एसआईआर पूरा करता है। आइए जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा और इस फैसले की बड़ी बातें कौन-कौन सी हैं।
संविधान की कसौटी पर खरी उतरी एसआईआर प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर कराना पूरी तरह से वैध है और यह आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324, लोक प्रतिनिधित्व कानून 1950 में चुनाव आयोग को एसआईआर कराने की शक्ति दी गई है। ऐसे में ये नहीं कह सकते कि चुनाव आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों के बाहर जाकर एसआईआर कराया।
क्या मतदाता सूची के लिए नागरिकता की भी जांच कर सकता है आयोग?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के पास शक्ति है कि वे मतदाता सूची के उद्देश्य के लिए नागरिकता की भी जांच कर सकता है। हालांकि ये अधिकार सिर्फ मतदाता सूची संशोधन तक सीमित है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 16 के तहत चुनाव आयोग को यह अधिकार दिया गया है।
मतदाता सूची से नाम हटाने की ये है शर्त
अदालत ने ये भी साफ किया कि अगर आयोग को लगता है कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने की वैधानिक शर्तें पूरी नहीं करता है तो आयोग उस व्यक्ति को सक्षम प्राधिकारी के पास भेज सकता है। मतदाता सूची से कोई भी नाम हटाना सक्षम प्राधिकारी द्वारा किए गए फैसले पर निर्भर होगा।
मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के लिए एसआईआर जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक अहम बात कही। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की तकनीकी व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका आधार मतदाता सूची की शुद्धता, सटीकता और विश्वसनीयता भी है। कोर्ट ने माना कि एसआईआर का उद्देश्य इसी आधारभूत अखंडता को सुरक्षित करना है और यह मुक्त और निष्पक्ष चुनाव कराने की सांविधानिक अनिवार्यता को भी मजबूत करता है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग ने बताया है कि बीते चार दशक से अधिक समय बाद गहन पुनरीक्षण की जरूरत है क्योंकि इस दौरान बड़े पैमाने पर बदलाव हुए हैं, तेज शहरीकरण और पलायन से मतदाता सूची में दोहराव/त्रुटियों की संभावना है। यह मतदाता सूची की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी है।
याचिकाकर्ताओं ने किन बातों पर जताई थी आपत्ति
एसआईआर के खिलाफ याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि एसआईआर पूर्व की सूचियों में शामिल लोगों की नागरिकता की पूर्वधारणा को नकार देता है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि एसआईआर प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत चुनाव आयोग को मिले अधिकारों के तहत नहीं आती है। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि यह शर्त गरीब, प्रवासी और हाशिए पर रहने वाले लोगों को मतदान अधिकार से वंचित कर सकती है, क्योंकि उनके पास पुराने रिकॉर्ड से जुड़ा दस्तावेजी प्रमाण मिलना मुश्किल है।
चुनाव आयोग की दलील- मतदाता सूची की शुद्धता के लिए एसआईआर जरूरी
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि SIR नागरिकता निर्धारण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने का अभ्यास है, ताकि केवल पात्र नागरिक ही सूची में रहें। आयोग ने कहा कि यह NRC जैसी कठोर जांच नहीं है। आयोग ने यह भी कहा कि यह कार्य चुनाव अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है, पुलिस द्वारा नहीं।
विपक्ष का चेहरा बेनकाब, कांग्रेस का दुष्प्रचार जारी…………..
भारतीय जनता पार्टी ने बुधवार को राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उनके आरोपों की पोल खोल दी है। यह प्रतिक्रिया उस समय आई जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा कराए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को वैध और संवैधानिक करार दिया। पार्टी सांसद और प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि अदालत के फैसले के बाद विपक्ष पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। कांग्रेस का चेहरा भी सामने आ गया है। इस फैसले के बाद राहुल गांधी को चुनावों में हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ने की आदत छोड़ देनी चाहिए।
कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मतदाता सूची का यह विशेष पुनरीक्षण स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक आवश्यकता को मजबूत करता है। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग को इस तरह की प्रक्रिया चलाने का अधिकार है।
भाजपा ने कांग्रेस पर बोला हमला
फैसले के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी बेनकाब हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को कानूनी और संवैधानिक घोषित कर दिया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी शुरू से ही इस प्रक्रिया का विरोध कर रहे थे क्योंकि कांग्रेस अवैध मतदाताओं के साथ खड़ी थी। भाजपा ने दावा किया कि अदालत के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि चुनाव आयोग की कार्रवाई पूरी तरह संवैधानिक दायरे में है और कांग्रेस दुष्प्रचार फैला रही है।
भाजपा नेता कोहली क्या बोले?
वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता नलिन कोहली ने कहा कि चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखने के लिए इस तरह की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया चलाता है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है और चुनाव आयोग इसी संवैधानिक जिम्मेदारी को निभा रहा है।
नलिन कोहली ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के तहत भारत में चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी गई है। मतदाता सूची को सही रखना और चुनावों को निष्पक्ष बनाना उसकी संवैधानिक भूमिका है। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल चुनाव आयोग पर हमला करना बंद करेंगे और लोकतंत्र पर अनावश्यक सवाल नहीं उठाएंगे।
योगेंद्र यादव ने दिया बड़ा बयान
सामाजिक कार्यकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि असली खबर यह नहीं है कि अदालत ने SIR को संवैधानिक माना है, बल्कि यह है कि अब देश में यह तय करने का अधिकार कि कौन वोट देगा और कौन नहीं, सत्तारूढ़ भाजपा के हाथों में चला जाएगा।
उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि संविधान का वह हिस्सा, जिसे लोकतंत्र का अंतिम मजबूत स्तंभ माना जाता था, आज कमजोर पड़ता दिखाई दिया है। योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि इस फैसले के बाद चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर चिंताएं और बढ़ेंगी।
टीएमसी ने क्या दी प्रतिक्रिया?
वहीं, टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करती है, क्योंकि अदालत का फैसला ही कानून होता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि तृणमूल कांग्रेस ने कभी SIR प्रक्रिया को अवैध नहीं कहा, बल्कि उसके कथित दुरुपयोग पर सवाल उठाए थे।
सौगत रॉय ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया सही तरीके से नहीं कराई गई, जिसके चलते करीब 27 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद उनकी पार्टी का रुख नहीं बदलेगा और वह मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाती रहेगी।.…….






