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असम के चाणक्य: कांग्रेस की पाठशाला, भाजपा की प्रयोगशाला……………….

UB India News by UB India News
May 6, 2026
in खास खबर
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असम के चाणक्य: कांग्रेस की पाठशाला, भाजपा की प्रयोगशाला……………….
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असम विधानसभा चुनाव के नतीजों का सीधा श्रेय कांग्रेस के पूर्व नेता और दो बार के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को जाता है। अपने नेतृत्व के खास अंदाज और राजनीतिक सूझबूझ के दम पर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को लगातार तीसरी बार जीत दिलाई। इस जीत के साथ सरमा अब एक राष्ट्रीय स्तर के नेता और प्रभावशाली चुनावी रणनीतिकार के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं।

सरमा की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता यह रही कि उन्होंने असम के बहुसंख्यक समाज को यह विश्वास दिलाया कि बांग्लादेश से होने वाले अवैध प्रवासन जैसी पुरानी और जटिल समस्या का समाधान केवल भाजपा ही कर सकती है। वहीं, कांग्रेस ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। इसी कारण भाजपा ने 2021 के अपने 75 सीटों के आंकड़े को पार करते हुए लगभग 44.51 प्रतिशत वोट हासिल किए। सरमा ने यह सुनिश्चित किया कि जरूरतमंदों तक सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पहुंचे। उन्होंने खुद को एक सख्त और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया। साथ ही, वह मोदी सरकार के वादों को जमीन पर उतारने में सक्षम रहे। हालांकि, उनके विरोधी उन पर असम में बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए प्रयुक्त शब्द ‘मियां’ के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का आरोप लगाते रहे। पर, कांग्रेस यह समझने में नाकाम रही कि असम की बहुसंख्यक आबादी लगातार हो रहे प्रवासन को लेकर चिंतित थी। सरमा ने 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य में हिंदू वोटों को मजबूती से अपने पक्ष में संगठित किया। इसके साथ ही, 2023 के परिसीमन ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया। एक कुशल रणनीतिकार के रूप में सरमा ने समय-समय पर अपने राजनीतिक समीकरण बदले। इसके अलावा, बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ), जो 2021 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘महाजोत’ का हिस्सा था, एनडीए के साथ आ गया।

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कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद का चेहरा गौरव गोगोई, जो खुद अपनी सीट नहीं बचा सके और 23,000 मतों से हार गए, पर राहुल गांधी ने अधिक भरोसा जताया। नतीजतन, पार्टी के कई वरिष्ठ नेता खुद को नजरअंदाज महसूस करने लगे और पार्टी में नाराजगी बढ़ने लगी। कई जगहों पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला, जिसने गठबंधन की रणनीति पर सवाल खड़े किए।

2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने आठ दलों के गठबंधन ‘महाजोत’ का नेतृत्व किया था, जिसने 43.68 प्रतिशत वोट हासिल कर 50 सीटें जीती थीं। इनमें से कांग्रेस ने 29.67 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 29 सीटें अपने नाम की थीं। 2021 में विपक्षी गठबंधन की ताकत दो अहम पार्टियों-बीपीएफ और बदरूद्दीन अजमल की अगुवाई वाली ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ)-से भी बढ़ी थी। पर इस बार तस्वीर बदल गई। बीपीएफ अब एनडीए के साथ है, जबकि एआईयूडीएफ अकेले मैदान में उतरी, क्योंकि कांग्रेस ने उसके साथ गठबंधन करने से साफ इन्कार कर दिया। नतीजों में भी यह असर साफ दिखा।

चुनाव में हिमंत बिस्व सरमा भाजपा की लगातार तीसरी जीत के प्रमुख नायक बनकर उभरे हैं। सरमा के लिए यह सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि उनकी उस राजनीतिक कार्यशैली की स्वीकार्यता है, जिसे उन्होंने अपने संगठनात्मक नियंत्रण, वैचारिक परिवर्तन और सत्ता की गहरी समझ के आधार पर गढ़ा है। यह जनादेश न सिर्फ मुख्यमंत्री के रूप में 57 वर्षीय हिमंत बिस्व सरमा के लगातार दूसरे कार्यकाल की शुरुआत करेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर उनके दावे को और मजबूत करेगा

2015 में कांग्रेस छोड़ भाजपा से जुड़े
करीब दो दशक तक कांग्रेस में रहे सरमा का वर्ष 2015 में भाजपा का दामन थामना राजनीतिक किंवदंती बन चुका है। भाजपा में शामिल होने के बाद, उन्होंने जल्द ही खुद को पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार के रूप में स्थापित कर लिया। यहां तक कि 2016 में भी, जब वे सरकार का चेहरा नहीं थे, तब भी परदे के पीछे से राज्य में भाजपा सरकार बनाने में उनके असर को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया।

2021 में पहली बार बने मुख्यमंत्री
वर्ष 2021 में, सर्बानंद सोनोवाल के स्थान पर हिमंत बिस्व सरमा को पहली बार राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि जीत सोनोवाल के नेतृत्व में ही मिली थी। इस निर्णय को पार्टी में सरमा के योगदान की स्वीकारोक्ति के साथ ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, विशेष रूप से अमित शाह के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी के संकेत के रूप में देखा गया।

समस्या का समाधान करने वाले नेता की छवि
पार्टी के अंदरूनी हलकों में हिमंत बिस्व सरमा को समस्याओं का समाधान करने वाला नेता बताया जाता है। उन्हें ऐसा नेता माना जाता है, जो बिना हिचकिचाहट काम पूरा करता है, बातचीत करके रास्ता निकालता है और निर्णयों को त्वरित रूप से लागू करता है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा में शुरुआती समय से ही अमित शाह को इस चतुर राजनेता के प्रति खास लगाव विकसित हो गया था। एक बार, अपने नॉर्थ ब्लॉक कार्यालय में सरमा से मुलाकात के बाद, शाह ने उनसे मिलने आए अन्य भाजपा नेता से कहा, इस लड़के की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह किसी भी बात के लिए ‘न’ नहीं कहता, बल्कि काम को पूरा करने का कोई न कोई रास्ता खोज ही लेता है।

पूर्वोत्तर में भाजपा के रणनीतिक विस्तार में भूमिका
पूर्वोत्तर में गठबंधन बनाने, नाजुक गठबंधनों को संभालने, और यहां तक कि राजनीतिक समीकरणों को फिर से बैठाने में सरमा की भूमिका ने उन्हें भाजपा के विस्तारवादी प्रोजेक्ट के लिए बेहद जरूरी बना दिया है। असम से लेकर मणिपुर और उससे भी आगे तक, सरमा पार्टी की उन कोशिशों के केंद्र में रहे हैं, जिनका मकसद ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे इलाके को एक मजबूत चुनावी आधार में बदलना है।

योगी की श्रेणी में रखते हैं पार्टी कार्यकर्ता
भाजपा में आने के बाद हिमंत बिस्व सरमा ने हिंदुत्व के मुखर समर्थन, खासकर बांग्लादेशी मूल के मुसलमानों और अवैध घुसपैठ जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाया। इससे उन्हें पार्टी के कोर वोट बैंक के करीब आने में मदद मिली। इस नई स्थिति ने उन्हें कांग्रेस के अतीत और संघ परिवार की उम्मीदों के बीच की खाई को पाटने में भी मदद की। अब कार्यकर्ता उन्हें योगी आदित्यनाथ की ही श्रेणी में देखने लगे हैं।

सत्ता पर मजबूत पकड़
प्रशासनिक तौर पर सरमा अपने सक्रिय और खुद कमान संभालने वाले अंदाज के लिए जाने जाते हैं। आलोचक जहां इसे सत्ता का केंद्रीकरण बताते हैं, वहीं समर्थक इसे तेज फैसले लेने की क्षमता बताते हैं। उनके कार्यकाल में आक्रामक पुलिसिंग और विपक्ष की ओर से भाई-भतीजावाद के आरोप भी लगे,  पर इससे उनकी लोकप्रियता पर खास असर नहीं पड़ा। वर्ष 2022 के महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट के दौरान असम में बागी विधायकों को ठहराने की भूमिका हो या पूर्वोत्तर में भाजपा का विस्तार-सरमा का प्रभाव लगातार विस्तार लेता गया। असम में नई चुनावी जीत के साथ हिमंत का कद भाजपा में और बढ़ना तय है। यह जीत उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में पहुंचा सकती है।

सहज और जनसुलभ नेता
सरमा ने एक सहज व जनसुलभ नेता और सबका भला चाहने वाले ‘मामा’ की छवि के रूप में खुद को स्थापित किया है, जो कल्याणकारी योजनाओं, रोजगार और सीधे संवाद पर जोर देता है। कल्याणकारी राजनीति और आक्रामक वैचारिक रुख की यही दोहरी छवि हिमंत के कार्यकाल की बड़ी पहचान बन गई। मतदाताओं के एक बड़े तबके को यह बात खूब रास आई है।

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