आम आदमी पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका है कि उसके कुछ सांसद केवल पार्टी ही नहीं छोड़ रहे, बल्कि भाजपा में शामिल हो रहे हैं। आम आदमी पार्टी में हुई यह बड़ी टूट चौंकाने के साथ ही चिंता भी बढ़ा रही है। चिंता उस वैकल्पिक राजनीति को लेकर है, जिसने कभी इस देश के एक बड़े वर्ग में नई उम्मीदों को जन्म दिया था। एक समय आम आदमी पार्टी के कर्णधारों में शामिल रहे राघव चड्ढा के नेतृत्व में राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य भारतीय संविधान के प्रावधानों का उपयोग करते हुए भाजपा में विलय कर रहे हैं। कम से कम दो सांसदों स्वाति मालीवाल और राघव चड्ढा को लेकर यह आशंका पहले से थी कि ये ज्यादा समय तक आम आदमी पार्टी के साथ नहीं रह पाएंगे, लेकिन इनके साथ पांच अन्य सांसदों की बगावत बहुत मायने रखती है। पहली नजर में यह संकेत है कि दिल्ली की सत्ता से वह बाहर हो चुकी और पंजाब में भी पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है। आप अपने आला नेताओं को भी साथ रखने में नाकाम हो रही है।
हालांकि, अरविंद केजरीवाल के अभियान ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ और अन्ना हजारे के अनशन के बाद बनी राजनीतिक पार्टी शुरू से ही टूट-फूट का शिकार रही है। पार्टी के बड़े-बड़े संस्थापक-सलाहकार इसे छोड़कर चले गए। यहां नाम गिनाने की जरूरत नहीं, पर अनेक संस्थापक अपमान या उपेक्षा की वजह से इस पार्टी से बेदखल हुए हैं। पार्टी संचालन के तौर-तरीकों को लेकर भी शिकायतें होती रही हैं। इसका एक अन्य पहलू यह भी है कि पार्टी के ज्यादातर नेता राजनीति में नए हैं या उन्हें राजनीति नहीं आती है, इसलिए इस पार्टी में अनबन होने की शिकायतें अक्सर बाहर आती रहती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोगों को जोड़कर बनी इस पार्टी की यह मजबूरी भी है। हालांकि, यह मजबूरी तब मजबूती में बदल जाती है, जब मिलकर काम करने का लचीलापन दिखाया जाता है। आक्रामक मुद्रा में राजनीति करके चुनाव जीतना तो आसान है, पर जीतने के बाद मिली सत्ता को शालीनता से सहेजना कठिन है। इस सबसे कठिन मोर्चे पर आम आदमी पार्टी कुछ ज्यादा कमजोर साबित हुई है। दूसरी बात, लोकतंत्र में राजनीतिक सत्ता कभी एकल नहीं होती है। जैसे भारत में ही अनेक पार्टियां कहीं न कहीं सत्ता में हैं और हर पार्टी को यह हक है कि वह ज्यादा से ज्यादा जगहों पर सत्ता में रहे। यह हक या इच्छा आम आदमी पार्टी में भी है और उसकी बड़ी प्रतिद्वंद्वी पार्टियों में भी है। ऐसा लगता है कि ताकतवर प्रतिद्वंद्वियों से अपनी रक्षा के मोर्चे पर आम आदमी पार्टी खरी नहीं उतर पा रही है।
आम आदमी पार्टी में हुई यह टूट सुनियोजित है। भाजपा में गए सांसदों की सदस्यता भी कायम रहेगी और आम आदमी पार्टी सिवाय शिकायत के ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगी। भाजपा को बड़ा फायदा हुआ है और राज्यसभा में उसके सांसदों की संख्या भी बढ़ गई है। एक असर यह भी होगा कि ज्यादातर सांसद पंजाब से हैं और वे पंजाब में भाजपा के आधार विस्तार के लिए काम करेंगे। रातों-रात कोई उलटफेर न हो, तो यह अपनी तरह का पहला मामला होगा, जब राज्यसभा में एक दल के दस में से केवल तीन सांसद रह जाएंगे और सात पाला बदलकर बैठेंगे। राघव चड्ढा का यह कहना देर तक आम आदमी पार्टी के नेताओं का पीछा करेगा, ‘मैं उनकी दोस्ती के लायक नहीं था, क्योंकि मैं उनके अपराध में शामिल नहीं था।’ अब आम आदमी पार्टी को अपनी बढ़ती समस्याओं के समाधान के बारे में गंभीरता से सोचना होगा।







