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पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड 93% वोटिंग के बाद शत-प्रतिशत मतदान अब दूर नहीं ……………

UB India News by UB India News
April 26, 2026
in प्रदेश, संपादकीय
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बिहार में दुसरे और अंतिम चरण के 20 जिलों की 122 सीटों पर मतदान जारी  , सुबह 9 बजे तक 14.55 फीसदी हुआ मतदान……………..
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पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में ‘अभूतपूर्व’ मतदान-प्रतिशत को खूब सराहा जा रहा है। तमिलनाडु में जहां 84.6 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया, वहीं बंगाल के पहले चरण में यह आंकड़ा 91.78 फीसदी दर्ज किया गया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी विशेष तौर पर पश्चिम बंगाल के पहले चरण की वोटिंग का स्वागत किया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राज्य में चुनावी हिंसा न होने पर संतोष जताया।

निस्संदेह, ये आंकड़े पिछले चुनावों की तुलना में अधिक दिख रहे हैं, लेकिन ये कई कारकों का नतीजा हैं। सबसे पहली वजह तो मतदाताओं का किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) है। पश्चिम बंगाल में इस कारण तकरीबन 12 प्रतिशत मृत, फर्जी या संदिग्ध मतदाताओं के नाम कट गए हैं। इससे स्वाभाविक ही मतदाताओं की कुल संख्या में कमी आई, जिसके कारण मतदान-प्रतिशत में बढ़ोतरी दिख रही है। पुराने आंकड़ों पर विश्लेषण करें, तो यहां पहले चरण में पूर्व की भांति 82-83 प्रतिशत मतदान हुआ है। इस राज्य में 2021 के विधानसभा चुनाव में 82.3 प्रतिशत, 2016 में 83.02 प्रतिशत और 2011 में 84.7 फीसदी से अधिक वोटिंग हो चुकी है।

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तमिलनाडु की कहानी भी इससे अलग नहीं है। यहां भी एसआईआर की प्रक्रिया में करीब 74 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता-सूची से बाहर किए गए। इस लिहाज से यहां भी पूर्ववत वोटिंग हुई है, क्योंकि इस राज्य में भी 2021 के विधानसभा चुनाव में 73.6 प्रतिशत, 2016 में 74.8 प्रतिशत और 2011 में 78.01 प्रतिशत मतदाताओं के मताधिकार करने का इतिहास रहा है। हां, सुरक्षा एक बड़ा मसला जरूर है। मतदान में यदि खून-खराबा न हो, तो लोगों में भरोसा बनता है। मुझे याद है, पहले बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी मतदान के दिन पथराव आम बात थी। कहीं-कहीं तो बम भी फटते थे। किंतु निर्वाचन आयोग ने सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान देना शुरू किया, विशेषकर दिल्ली से सुरक्षा बल मंगवाए जाने लगे। ‘बाहरी’ जवानों में पक्षपात की आशंका नहीं रहती। नतीजतन, शांति-व्यवस्था बनने लगी और मतदाता मतदान-केंद्रों पर पहुंचने लगे। महिलाएं की संख्या तो विशेष तौर पर बढ़नी शुरू हुई, क्योंकि इस तरह की हिंसा की पहली शिकार महिलाएं ही होती हैं। हालांकि, मुमकिन यह भी है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता-विरोधी रुझान के कारण भी मतदान-प्रतिशत बढ़ा हो।

जाहिर है, अब 90 प्रतिशत से अधिक मतदान भी संभव है। पश्चिम बंगाल या पूर्वोत्तर के राज्यों में काफी समय से अधिक वोटिंग हो रही है। अब दूसरे राज्यों में भी मतदान-प्रतिशत बढ़ने लगा है। इसकी एक बड़ी वजह है, मतदाताओं में अपने अधिकारों को लेकर आ रही जागरूकता। साल 2010 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पद संभालने के साथ मैंने मतदाता-जागरूकता को लेकर विशेष प्रयास शुरू किए थे और एक खास कार्यक्रम की शुरुआत की, जिसका नाम है- सुव्यवस्थित मतदाता शिक्षा व निर्वाचक सहभागिता, यानी स्वीप (एसवीईईपी)। इसकी टैगलाइन ही है- सशक्त लोकतंत्र के लिए व्यापक भागीदारी। वर्ष 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में इसी कार्यक्रम के कारण रिकॉर्ड मतदान हुआ था। इसके बाद से हमने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूरे देश में मतदाता-शिक्षा पर जोर दिया जाने लगा। मीडिया में तो कई जगह इसे ‘पार्टिसिपेशन रिवॉल्यूशन’, यानी सहभागिता क्रांति की संज्ञा दी जाने लगी थी।

इसी तरह, उसके अगले साल (2011) से हमने 25 जनवरी को ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ मनाने की शुरुआत की। इसके लिए अक्तूबर, नवंबर या दिसंबर में हम उन किशोरों-किशोरियों की पहचान कर लेते हैं, जो 18 साल की आयु में प्रवेश करने वाले होते हैं। इन नामांकित नए मतदाताओं को 25 जनवरी के दिन मतदाता-पहचान पत्र दिया जाता है और उनसे यह शपथ ली जाती है कि वे पाबंदी से हर मतदान-प्रक्रिया में हिस्सा लेंगे और किसी प्रलोभन, लालच या दबाव में नहीं आएंगे। मतदाताओं को जागरूक और शिक्षित करने में यह कितना कारगर साबित हुआ है, इसका एहसास इससे भी होता है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में इसके बारे में विस्तार से बात की थी। उन्होंने कहा था कि जो संस्था पहले सिर्फ डंडे के जोर से चला करती थी, वह अब नागरिक-केंद्रित हो गई है।

वास्तव में, मतदाताओं को जागरूक करने के इस तरह के काम पूरे देश में हो रहे हैं। हमने महिलाओं व नौजवानों को केंद्र में रखकर इनकी शुरुआत की थी और इसका नतीजा यह है कि आज ये दोनों तबके बड़ी तादाद में मतदान-प्रक्रिया में भाग लेते हैं। आंकड़े तो यह भी बता रहे हैं कि करीब 17 राज्यों में महिलाओं का मतदान-प्रतिशत पुरुषों से अधिक हो गया है, जबकि लैंगिक अनुपात में वे अब भी कम है। जाहिर है, स्त्रियां मतदान के मामले में पुरुषों पर बीस साबित हुई हैं।

यही कारण है कि अगले कुछ वर्षों में शत-प्रतिशत मतदान की कल्पना सच होती जान पड़ती है। इसके लिए किसी खास पहल की जरूरत नहीं है, बल्कि जो कार्यक्रम पहले से चल रहे हैं, उन्हीं को योजना के अनुरूप आगे बढ़ाने की दरकार है। बिहार, उत्तर प्रदेश और मुंबई व बेंगलुरु के शहरी इलाकों में पहले कम मतदान हुआ करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। मुझे याद है, मतदाताओं को जागरूक करने के लिए हमने अनोखी तरकीब भी निकाली थी, जैसे- दिल्ली में हमने ‘पप्पू कान्ट वोट’ अभियान चलाया था, जिससे 14 प्रतिशत तक मतदान-प्रतिशत बढ़ गया था। बाद में हमने कई जगहों पर ऐसा किया। पश्चिम बंगाल में ‘आनंद बाबू’ नामक किरदार को लेकर अभियान चलाया था, जिसका सुखद नतीजा निकला था।

यहां राजनीतिक दलों की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। जो बड़ी पार्टियां हैं, उनसे अपेक्षा अधिक है। जैसे, एक पार्टी ने ‘पन्ना प्रमुख’ जैसे प्रयाेग किए हैं। चूंकि मतदाता-सूची के एक पन्ने में तीन-चार परिवार ही होते हैं, तो वह पन्ना प्रमुख उन परिवारों को मतदान के लिए प्रेरित करता है। बड़ी पार्टियां संजीदगी से यदि यह करें, तो इसका बड़ा असर पड़ेगा।

कुछ लोग मतदान-प्रक्रिया पर उंगली उठाते हुए दूसरे देशों से सीखने की नसीहत देते हैं। मैं इससे सहमत नहीं हूं। हम खुद पूरी दुनिया में एक ‘मानक’ की तरह देखे जाते हैं। यही कारण है कि हमारा राष्ट्रीय मतदान-प्रतिशत कई देशों से अधिक है। निर्वाचन आयोग इसे और ऊपर ले जाने के लिए संकल्पित है।

विधानसभा चुनावों में 5 वो मौके, जब रिकॉर्ड वोटिंग हुई

विधानसभा चुनावों में “रिकॉर्ड वोटिंग” अक्सर एक संकेत होता है—या तो जनता में गुस्सा है, या बदलाव की तीव्र इच्छा या फिर कोई बड़ा राजनीतिक मोड़. दिलचस्प बात ये है कि कई बार भारी मतदान ने सत्ता पलट दी तो कुछ मामलों में उसी सरकार को और मजबूत कर दिया. ऐसे ही पांच मामलों पर नजर दौड़ाते हैं जबकि विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड वोटिंग हुई.

1. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021

यानि बंगाल में जब पिछली बार विधानसभा चुनाव हुए तो क्या हुआ था. उस समय 80% से ज्यादा वोटिंग हुई. इस ज्यादा वोटिंग ने तब भी वोटिंग का रिकॉर्ड तोड़ा. भारतीय चुनाव आयोग ने तब 82फीसदी टर्नआउट का आंकड़ा बताया. तब भी चुनाव राज्य की सत्ताधारी पार्टी यानि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और नरेंद्र मोदी की बीजेपी के बीच हुआ.
ये चुनाव काफी कांटे का था. जब भारी वोटिंग हुई तो लोगों ने कहा कि ज्यादा वोटिंग एंटी एंकेंबेसी फैक्टर की वजह हो सकती है लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो पता लगा कि ये ज्यादा वोटिंग तृणमूल के खिलाफ थी. उसने और ज्यादा जोरदार तरीके से सत्ता को बरकरार रखा. इसने ये संदेश दिया कि ज्यादा वोटिंग हमेशा एंटी-एंकंबेंसी नहीं होती—कभी-कभी यह मौजूदा सरकार के पक्ष में भी लामबंदी होती है.

2. बिहार विधानसभा चुनाव 2015

ये वर्ष 2015 की बात है जबकि बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए. तब टोटल वोट टर्नआउट 57 फीसदी रहा. उस चुनावों में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड ने लालू प्रसाद यादव के साथ महागठबंधन के साथ गठबंधन किया था. उनका मुकाबला बीजेपी से था. मुकाबला जबरदस्त बताया जा रहा था. परिणाम आया तो पता लगा कि महागठबंधन ने भारी जीत हासिल की है. भारतीय जनता पार्टी को करारी हार हासिल हुई. उस चुनाव में ज्यादा मतदान ने सामाजिक समीकरणों को सक्रिय किया और सत्ता बदल दी.

3. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017

उस चुनाव में यूपी विधानसभा के लिए 61 फीसदी रिकॉर्ड वोट पड़े. भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और विकास बड़ा मुद्दा था. भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक तरीके से जीत हासिल की. तब अखिलेश यादव सत्ता में थे. उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा. उस साल रिकॉर्ड वोटों ने सत्ता बदलाव के लिए जनादेश दिया. इस चुनाव के बाद योगी यूपी के मुख्यमंत्री बने.

4. त्रिपुरा विधानसभा चुनाव 2018

इस चुनावों में 89% के करीब रिकॉर्ड मतदान हुआ. ये वोटिंग उस समय भारत में सबसे ज्यादा वोटिंग में एक मानी गई. त्रिपुरा में 25 सालों से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानि सीपीआई (एम) का शासन जारी था. जोरदार वोटिंग ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया. वहां बीजेपी ने जबरदस्त जीत के साथ सरकार बनाई. यानि चुनाव में रिकॉर्ड वोटिंग ने वामपंथी किला गिरा दिया. संदेश ये भी है कि जब वोटिंग बहुत ज्यादा होती है, तो यह “साइलेंट वेव” का संकेत हो सकता है.
5. दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015
दिल्ली विधानसभा चुनावों में 67% मतदान हुआ. भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के बाद नई राजनीति का उभार हो रहा था. अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस आंदोलन से पैदा हुई. इस पार्टी को जनता के खूब वोट मिले. आम आदमी पार्टी की 70 में 67 सीटों पर जीत हुई. यानि दिल्ली में ज्यादा वोटिंग ने
अरविंद केजरीवाल की ऐतिहासिक वापसी सुनिश्चित कर दी. यहां पर जाहिर होता है कि रिकॉर्ड वोटिंग का मतलब हमेशा एक जैसा नहीं होता, लेकिन कुछ पैटर्न साफ दिखते हैं.
यानि ये जाहिर है कि हर बार चुनावों में जब ज्यादा वोट पड़ते हैं तो वो सत्ता बदलने के लिए भी होते हैं. कई बार सत्ताधारी पार्टी को और मजबूती देने के लिए भी.

लोकसभा चुनावों में ऐसे 3 मौके

– वर्ष 2019 में लोकसभा चुनावों में रिकॉर्डतोड़ 67.40 फीसदी वोट पड़े. जिसके चलिए केंद्र बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए 353 सीटें जीतीं. खुद बीजेपी ने 303 सीटें पाईं. नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बने. वोट ज्यादा पड़े और बीजेपी की सीटें और ज्यादा हो गईं.
– वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में 66.44 फीसदी वोट पड़े, जो एक रिकॉर्ड था. इसके जरिए बीजेपी ने 282 सीटें जीतकर क्लियर मेजोरिटी हासिल की और एनडीए (336) के साथ मिलकर सरकार बनाई. नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने. ये वोट बदलाव के लिए पड़े. केंद्र में कांंग्रेस सरकार का सफाया हो गया.
– 1984 के चुनावों में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस की जबरदस्त जीत हुई. कुल मिलकर 64.1 फीसदी वोट पड़े. कांग्रेस ने रिकॉर्ड 414 सीटें जीतीं. इस बार कांग्रेस को जनता ने कहीं ज्यादा ताकत देकर बहुमत से जिताया.
तो क्या कहती है ज्यादा वोटिंग
भारत के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड वोटिंग के रिजल्ट मिलेजुले रहे हैं – कभी सत्ताधारी पार्टी मजबूत हुई तो कभी सत्ता बदली. मतलब ये है कि हाई वोटिंग का ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है, क्योंकि यह असंतोष या उत्साह दोनों से जुड़ा हो सकता है. हालांकि इस बार बंगाल की ज्यादा वोटिंग की वजह एसआईआर, वोटिंग लिस्ट से नाम कटने का भय, राज्य सरकार के खिलाफ असंतोष आदि बताया जा रहा है.
– लोकसभा – 2014 (66.4%) और 2019 (67.4%) में बीजेपी की भारी जीत हुई, जबकि 1984 (64%) में कांग्रेस ने सफाया ही कर दिया था. 1977 और 2014 जैसे मामलों में सत्ता परिवर्तन भी हुआ.
विधानसभा – विधानसभा चुनावों में इस बार सभी राज्यों यानि पुदुच्चेरी (89.9%), असम और बंगाल में रिकॉर्ड टर्नआउट सामने आया है, इनके रिजल्ट आने हैं. ऐसे मामलों में 2025 में बिहार (66.9%) में एनडीए जीता, 2023 मध्य प्रदेश (76%) में बीजेपी की जबरदस्त जीत हुई.
कम वोटिंग में क्या हुआ
भारत के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कम वोटिंग वाले मामलों में भी सरकारें कभी बदलीं, कभी नहीं. कोई निश्चित पैटर्न नहीं दिखा. लिहाजा कम टर्नआउट सत्ताधारी पार्टी के पक्ष या विपक्ष दोनों में जा सकता है.
लोकसभा
1971: सबसे कम वोटिंग (41.33%, 1967 से 5.7% गिरावट हुई). फिर भी कांग्रेस (इंदिरा गांधी) सत्ता में बनी रही.
1980: 56.9% वोटिंग, जनता पार्टी हारी, कांग्रेस (इंदिरा) वापस आई, सरकार बदली.
1989: वोटिंग घटी, वी.पी. सिंह सरकार बनी यानि सत्ता में बदलाव हुआ.
1991: फिर घटी, कांग्रेस सत्ता में लौटी.
कुल मिलाकर, पिछले 12 लोकसभा चुनावों में 5 बार वोटिंग घटी, जिनमें 4 बार सरकार बदली लेकिन 1 बार सत्ताधारी पार्टी बनी रही.
विधानसभा
कम टर्नआउट वाले राज्य चुनावों में भी मिश्रित परिणाम देखने को मिले.
कई मामलों में सत्ताधारी पार्टी हारी, जैसे 2018-19 के कुछ राज्यों में 50-55% टर्नआउट पर सत्ता बदल गई, लेकिन 2000 पहले दो दशकों में कुछ चुनावों में कम वोटिंग के बावजूद सत्ताधारी जीती. विश्लेषण बताते हैं कि विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे ज्यादा मायने रखते हैं.
कम वोटिंग अक्सर सत्ताधारी के खिलाफ असंतोष का संकेत मानी जाती है. लेकिन अपवाद भी है. लिहाजा गारंटी कुछ नहीं है.

पश्चिम बंगाल में पहले फेज की 152 सीटों पर 93% वोटिंग

पश्चिम बंगाल में पहले फेज की 152 सीटों पर 93% वोटिंग हुई है। अगर यही पैटर्न दूसरे और आखिरी फेज की 142 सीटों पर रहा, तो यह बंगाल में अब तक का सबसे ज्यादा वोटर टर्नआउट होगा। 2021 विधानसभा चुनाव में 82% वोट पड़े थे।

आजादी के बाद पश्चिम बंगाल में कुल 17 विधानसभा चुनाव हुए हैं और 4 बार सत्ता परिवर्तन हुआ है। इनमें 3 चुनावों में जब वोटिंग 4.5% से ज्यादा घटी या बढ़ी है, तो सत्ता बदल गई। चौथी बार 2011 में जब ममता ने लेफ्ट के 34 साल के शासन को खत्म किया, तब 2.4% वोटिंग बढ़ी थी।

पहले जानते हैं कि इस बार बंगाल में रिकॉर्ड वोटिंग क्यों हो रही है?

वजह-1: SIR में 91 लाख नाम कटे, लेकिन वोट देने वाले उतने ही

  • चुनाव से पहले SIR के जरिए करीब 91 लाख वोटर्स के नाम हटाए गए हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल में रजिस्टर्ड वोटर्स की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई है, यानी 11.8% की कमी।
  • कोलकाता की सीनियर जर्नलिस्ट शिखा मुखर्जी बताती हैं कि मतदान-प्रतिशत के बढ़ने की एक वजह SIR हो सकती है।
  • एक लॉजिक ये भी दिया जा रहा है कि वोट देने वालों की संख्या उतनी ही, लेकिन कुल वोटर्स की संख्या घट गई है। इसलिए वोटर टर्नआउट ज्यादा आ रहा है।
  • मान लीजिए कि किसी विधानसभा में 100 वोटर्स थे, जिनमें से 70 ही वोट डालते थे। यानी वोटर टर्नआउट 70% हुआ।
  • लेकिन SIR के बाद 12 मृत या डुप्लीकेट वोटर्स का नाम कट गया। इसके बाद कुल 88 वोटर्स बचे, लेकिन अब भी 70 वोटर ही वोट डाल रहे हैं। यानी वोटर टर्नआउट 79.5% हुआ।
  • VoteVibe के फाउंडर और इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी का आकलन है कि 2021 में जितनी संख्या में मतदाताओं ने वोटिंग की थी, उतनी ही संख्या इस बार होने के लिए कम से कम 86% वोटर टर्नआउट होना जरूरी है, जो रिकॉर्ड है।
  • कुल 16 जिलों में चुनाव हुए, जिसमें से 13 में 90% से ज्यादा वोटिंग हुई। बाकी जगहों पर भी 2021 के मुकाबले वोटिंग परसेंट 7-10% तक बढ़ा है। मुर्शिदाबाद और मालदा में SIR में सबसे ज्यादा नाम कटे थे। यहां भी 90% से ज्यादा वोटिंग हुई।
  • सेफोलॉजिस्ट जय मृग के मुताबिक, SIR की वजह से वोटर्स को लग रहा है कि अगर वोट नहीं दिया तो नाम कट जाएगा। एक तरह लोगों को अपने अस्तित्व का डर बैठ गया है।
  • पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रभाकरमणि तिवारी मानते हैं कि लोगों ने SIR का विरोध करने के लिए इस बार ज्यादा वोट डाला है।

वजह-2: टीएमसी और बीजेपी ने महिलाओं से वादे कर लामबंद किया

  • ममता बनर्जी ने मौजूदा लक्ष्मीर भंडार योजना की राशि 500 रुपए बढ़ाने का वादा किया है, जिसका 2.4 करोड़ महिलाओं को फायदा मिलेगा। अभी सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1000 रुपए और SC/ST महिलाओं को 1200 रुपए मासिक मिल रहे हैं। महिला सुरक्षा बढ़ाने के लिए पुलिस पिंक बूथ और पैट्रोल टीम का भी वादा किया है।
  • वहीं बीजेपी ने ऐलान किया है कि सत्ता में आते ही वे महिलाओं को हर महीने 3 हजार रुपए की मदद देंगे। सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण देने का वादा किया है।
  • दरअसल, पिछले कुछ चुनावों से महिला वोटर्स एक फैक्टर बन चुकी हैं। महिलाओं में ट्रेंड बन चुका है कि जो उनके लिए स्कीम्स लाएगा या उनकी बात करेगा, वे उसे ही मजबूती से वोट करेंगी।
  • नवंबर 2023 से नवंबर 2025 तक 15 राज्यों में चुनाव हुए हैं। इनमें से 11 राज्यों में महिलाओं को पैसे देने वाली कैश स्कीम लागू की गई या वादा किया गया। इन 11 में से 10 राज्यों में योजना कारगर रही। स्ट्राइक रेट 90% रहा।

वजह-3: चुनाव के लिए 2.4 लाख जवानों की तैनाती

  • आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा, यानी ACLED ने पिछले 16 चुनावों का एनालिसिस करके पश्चिम बंगाल को सबसे ज्यादा हिंसक राज्य बताया।
  • 2021 में 278 हिंसक घटनाएं रिपोर्ट हुई थीं, जिनमें से 108 मामलों में TMC और 87 मामलों में बीजेपी ने हमला किया था।
  • इन्हीं के मद्देनजर इस बार केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की 2450 कंपनियों, यानी 2.4 लाख से ज्यादा जवानों को तैनात किया गया है। करीब हर 150 वोटर्स पर एक सुरक्षा कर्मी।
  • कोलकाता के सीनियर जर्नलिस्ट सुमन भट्टाचार्य बताते हैं कि इस बार पहले की तरह ज्यादा वॉयलेंस नहीं हुआ है। इसके चलते भी वोटर टर्नआउट बढ़ा है।
2.4 लाख जवानों के साथ दर्जनों बख्तरबंद गाड़ियां और ट्रक भी तैनात किए गए हैं।
2.4 लाख जवानों के साथ दर्जनों बख्तरबंद गाड़ियां और ट्रक भी तैनात किए गए हैं।

वजह-4: ममता को लेकर एंटी-इनकमबेंसी या प्रो-इनकमबेंसी फैक्टर

  • 2011 के बाद लगातार 15 सालों से टीएमसी सत्ता पर काबिज है और ममता बनर्जी सीएम हैं।
  • इतने लंबे शासन में बेरोजगारी, अपराध और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठने लगते हैं। इनसे निपटने के लिए टीएमसी ने 74 विधायकों के टिकट काट दिए और 15 विधायकों की सीट बदल दी।
  • Axis My India के डायरेक्टर प्रदीप गुप्ता मानते हैं कि किसी भी सरकार के लिए तीन कार्यकाल, यानी 15 साल बहुत होते हैं। खासकर डिजिटल के दौर में। लाखों युवा वोटर्स ने टीएमसी के अलावा किसी दूसरी पार्टी की सरकार नहीं देखी है। ऐसे में हो सकता है कि वो बदलाव के लिए ज्यादा तादाद में बाहर निकल रहे हों।
  • हालांकि VoteVibe के सर्वे के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में अब भी 41.6% वोटर्स ममता बनर्जी को सीएम बनाना चाहते हैं।

वजह-5: प्रवासी मजदूरों की वापसी

  • बंगाल के 21 लाख से ज्यादा वोटर दूसरे राज्यों में काम करते हैं। SIR की वजह से उनमें वोटर लिस्ट से नाम हटने का डर बढ़ गया है।
  • बंगाल के मुस्लिम प्रवासी मजदूरों को अवैध बांग्लादेशी करार किए जाने का भी डर है। नवंबर 2024 से अप्रैल 2025 के बीच दिल्ली से 700 और राजस्थान से 1,000 मजदूरों के डिपोर्टेशन के बाद यह डर और बढ़ गया।
  • इसलिए ज्यादा संख्या में मजदूर अपने घर लौटे, जिससे वोटिंग परसेंट बढ़ा।

वजह-6: पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन

  • बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस दोनों ने ही इस चुनाव को आर-पार की लड़ाई की तरह लड़ा रही है।
  • बीजेपी के लिए खुद पीएम नरेंद्र मोदी और ग्रहमंत्री अमित शाह बंगाल चुनाव के लिए एक्टिव हैं। अमित शाह तो 27 अप्रैल तक बंगाल में ही हैं और बूथ लेवल पर कोऑर्डिनेशन कर रहे हैं।
  • ऐसे ही तृणमूल कांग्रेस से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने मोर्चा खोला हुआ है।

इतनी ज्यादा वोटिंग से बीजेपी या ममता किसे फायदा होगा?

  • इंडियन पॉलिटिक्स एंड पॉलिसी जर्नल में 2025 में पब्लिश हुए एक रिसर्च पेपर के मुताबिक, मतदान में भारी बढ़ोतरी अक्सर कॉम्पिटिटिव इफेक्ट, यानी कांटे की टक्कर की ओर इशारा करती है।
  • जब वोटर मौजूदा सरकार या नेता के कामकाज से बहुत ज्यादा असंतुष्ट होते हैं, तो वे उन्हें हटाने के मकसद से बड़ी संख्या में बाहर निकलते हैं।
  • इलेक्शन एनालिस्ट प्रो. संजय कुमार के मुताबिक, 2020 तक देश में करीब 332 विधानसभा चुनाव हुए हैं। इनमें से 188 चुनावों में मतदान-प्रतिशत बढ़ा, जिनमें 89 सरकारें दोबारा चुनी गईं। वहीं 144 बार मतदान-प्रतिशत घटा है, जिनमें 56 सरकारें दोबारा चुनी गईं। साफ तौर पर मतदान-प्रतिशत और चुनावी नतीजों के बीच कोई मजबूत संबंध नहीं है।
  • अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर नीलांजन सरकार मानते हैं कि कभी-कभी हाई टर्नआउट भरोसे का प्रतीक होता है, जहां मतदाता अपने पसंदीदा नेता जैसे- नरेंद्र मोदी या ममता बनर्जी को और मजबूत करने के लिए वोट देने निकलते हैं।

यानी यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि वोटर टर्नआउट बढ़ने से किसे फायदा मिलेगा। पश्चिम बंगाल के पिछले चुनावों के एनालिसिस से भी कोई साफ पैटर्न समझ नहीं आता। आजादी के बाद १७ चुनावों में 9 बार वोटिंग 4.5% से ज्यादा घटी/बढ़ी है। इसमें सिर्फ 3 बार सत्ता परिवर्तन हुआ, बाकी 6 बार मौजूदा सरकार ही बरकरार रही।

SIR के बाद बिहार चुनाव में 10% वोटिंग बढ़ी, BJP को फायदा मिला

  • जून 2025 में बिहार में कुल 7.89 करोड़ वोटर्स थे। फिर SIR शुरू हुआ। अक्टूबर 2025 में जारी फाइनल लिस्ट में वोटर्स की संख्या 6% घटकर 7.42 करोड़ हो गई। इसमें 69.29 लाख नाम कटे गए और 21.53 लाख नए नाम जोड़े गए।
  • दो फेज में वोटिंग के बाद 67% वोटर टर्नआउट रहा। पिछले चुनाव से 10% ज्यादा। 2020 चुनाव में करीब 57% वोटिंग हुई थी।
  • फिर जब नतीजे आए तो NDA को कुल 202 सीटें मिलीं, जबकि महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया। बीजेपी ने 89 और जेडीयू ने 85 सीटें जीतीं। वहीं आरजेडी को 25 और कांग्रेस को महज 6 सीटें मिलीं।
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आंदोलन, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य पर कुछ गंभीर प्रश्न…….

जंतर-मंतर पर इंटरनेट बंद, अबतक कितनी FIR, आंदोलन के 34वें दिन आगे क्या?

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मई 2026 में छात्रों ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर आवाज उठाई, जिसके बाद देश के युवाओं में सरकार...

कैसे एक अनशन से संसद चलो मार्च तक पहुंच गया वांगचुक-CJP का आंदोलन……………..

छात्रों और शिक्षा को दलीय राजनीति का औजार बनाना कितना सही है !

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दिल्ली में जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और नीट समेत केंद्रीय परीक्षाओं में गड़बड़ी ठीक करने की मांग करते...

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