जब महंगाई और मंदी एक साथ आ जाए तो उसे स्टैगफ्लेशन कहते हैं. यानी वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ भी रहे हैं लेकिन लोगों के पास इतना सामर्थ्य नहीं है कि वो कुछ खरीद पाएं. दाम बढ़ने से इन्फ्लेशन ऊपर जाता है और खरीद-बिक्री बंद होने से आर्थिक गतिविधियों पर ब्रेक लगता है. ऐसी स्थिति मंदी और महंगाई दोनों का मिश्रण बनकर सामने आती है और इससे निपटना किसी भी केंद्रीय बैंक या सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है.
मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का डाटा दिखा रहा है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण तेल सप्लाई को जो नुकसान पहुंचा है वह इस स्टैगफ्लेशन का कारण बन सकता है.
मौजूदा हालात में सबसे बड़ा दबाव ऊर्जा कीमतों से आ रहा है. तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा के खर्च सब बढ़ जाते हैं. यह एक क्लासिक चेन रिएक्शन है, जहां ऑयल प्राइस बढ़ते ही महंगाई ऊपर जाती है और साथ ही खर्च कम होने से मांग घटती है, जिससे ग्रोथ पर असर पड़ता है.
ग्लोबल डेटा दे रहा शुरुआती संकेत
इस हफ्ते आने वाले PMI डेटा को इस संकट का पहला बड़ा संकेत माना जा रहा है. शुरुआती अनुमान बता रहे हैं कि यूरोप की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जैसे जर्मनी, फ्रांस और यूके में आर्थिक गतिविधियां कमजोर पड़ सकती हैं, जबकि अमेरिका अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है. अगर ऐसा होता है, तो यह साफ संकेत होगा कि दुनिया स्टैगफ्लेशन जैसे दौर में प्रवेश कर रही है.
आईएमएफ की चेतावनी, असर ‘पहले ही तय’
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने साफ कहा है कि इस संकट का असर पहले ही अर्थव्यवस्था में शामिल हो चुका है. उनके मुताबिक, भले ही युद्ध जल्दी खत्म हो जाए, लेकिन इसका आर्थिक झटका लंबे समय तक बना रहेगा. उन्होंने इसे “स्थायी अनिश्चितता” का दौर बताया, जहां पॉलिसी बनाना और भी मुश्किल हो जाएगा.
केंद्रीय बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती
इस समय सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्रीय बैंक क्या करें. अगर वे ग्रोथ को बचाने के लिए ब्याज दरें घटाते हैं, तो महंगाई और बढ़ सकती है. वहीं, अगर महंगाई काबू करने के लिए दरें बढ़ाई जाती हैं, तो आर्थिक गतिविधियां और धीमी हो सकती हैं. यही दुविधा इस पूरे संकट को और जटिल बना रही है.
1970 जैसा संकट फिर लौट सकता है?
स्टैगफ्लेशन आखिरी बार बड़े स्तर पर 1970 के दशक में देखा गया था, जब तेल संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया था. अब एक बार फिर वही हालात बनते नजर आ रहे हैं. ग्लोबल एजेंसियां और अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि यह खतरा अब केवल थ्योरी नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे हकीकत बनता जा रहा है.
आगे किन संकेतों पर रहेगी नजर
आने वाले समय में तीन चीजें सबसे ज्यादा अहम होंगी, जिनसे साफ होगा कि हालात कितने बिगड़ सकते हैं. पहला, PMI डेटा जो बताएगा कि बिजनेस एक्टिविटी कितनी धीमी हो रही है. दूसरा, महंगाई के आंकड़े जो ऊर्जा कीमतों के असर को दिखाएंगे. तीसरा, उपभोक्ताओं का व्यवहार, यानी लोग खर्च कर रहे हैं या बचत बढ़ा रहे हैं. अगर ये तीनों संकेत एक ही दिशा में गए, तो वैश्विक मंदी और स्टैगफ्लेशन का खतरा और बढ़ जाएगा.
कुल मिलाकर तस्वीर क्या कहती है
भले ही आने वाले दिनों में जियोपॉलिटिकल तनाव कम हो जाए, लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दुनिया जल्दी पुराने ट्रैक पर नहीं लौटेगी. धीमी ग्रोथ, ऊंची महंगाई और अनिश्चितता का यह मिश्रण आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है.







